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Press Freedom Supreme Court: ‘न्यूजरूम बंद हो जाएंगे! पत्रकारों के अधिकारों पर संकट? मीडिया ग्रुप्स डेटा एक्ट के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचा DNPA​

: मीडिया की स्वतंत्रता और पत्रकारिता के अधिकारों को लेकर डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। एसोसिएशन ने डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट और इससे जुड़े कुछ नियमों को चुनौती देते हुए कहा है कि इनके कारण पत्रकारों के लिए खबरों की पड़ताल करना और उन्हें जनता तक पहुंचाना मुश्किल हो […]

: मीडिया की स्वतंत्रता और पत्रकारिता के अधिकारों को लेकर डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। एसोसिएशन ने डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट और इससे जुड़े कुछ नियमों को चुनौती देते हुए कहा है कि इनके कारण पत्रकारों के लिए खबरों की पड़ताल करना और उन्हें जनता तक पहुंचाना मुश्किल हो सकता है। मंगलवार, 27 अक्टूबर को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर उसका पक्ष मांगा। भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल थे। DNPA की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दीवान ने दलीलें पेश कीं।

DNPA ने कानून के किन प्रावधानों को दी चुनौती?

DNPA ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दाखिल की है। इसमें DPDP एक्ट की कई धाराओं और DPDP रूल्स, 2025 के कुछ नियमों को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गई है। याचिका में एक्ट की धारा 7, 17 , 18, 19, 27, 29, 36, 37 और 44 के साथ नियम 16, 17 और 23 को चुनौती दी गई है। एसोसिएशन का कहना है कि इन प्रावधानों का असर सूचना के अधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पड़ सकता है। खासतौर पर खोजी पत्रकारिता के दौरान दस्तावेजों, व्यक्तिगत डेटा और सार्वजनिक हित से जुड़े मामलों की पड़ताल में कानूनी अड़चनें पैदा होने की आशंका है।

‘न्यूजरूम बंद हो जाएंगे’, DNPA ने क्या दलील दी?

DNPA ने अदालत में कहा कि अगर किसी व्यक्ति के डेटा से जुड़ी जानकारी प्रकाशित करने से पहले उसकी अनुमति लेना जरूरी हो जाता है, तो खबरों की रिपोर्टिंग प्रभावित हो सकती है। एसोसिएशन के मुताबिक, पत्रकारिता में कई बार ऐसी जानकारी सामने लानी पड़ती है, जो सार्वजनिक हित से जुड़ी होती है, लेकिन संबंधित व्यक्ति उसे सार्वजनिक नहीं करना चाहता। वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दीवान ने दलील दी कि डेटा प्रोटेक्शन कानून के कुछ प्रावधान पारंपरिक मीडिया के कामकाज को प्रभावित कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि खबरों का नया और महत्वपूर्ण होना पत्रकारिता का मूल आधार है। यदि हर बार डेटा से जुड़े व्यक्ति की मंजूरी लेनी पड़े, तो खबरों की पड़ताल और प्रकाशन की प्रक्रिया बाधित हो सकती है। उन्होंने अदालत से चुनौती दिए गए प्रावधानों पर रोक लगाने की मांग भी की।

पत्रकारों के गोपनीय सूत्रों की सुरक्षा पर भी चिंता

DNPA ने आशंका जताई कि डेटा प्रोटेक्शन कानून का इस्तेमाल पत्रकारों के गोपनीय सूत्रों की पहचान उजागर करने के लिए किया जा सकता है। एसोसिएशन के अनुसार, खोजी पत्रकारिता में कई बार ऐसे स्रोत महत्वपूर्ण जानकारी देते हैं, जिनकी पहचान गोपनीय रखना जरूरी होता है। यदि इन स्रोतों की जानकारी सामने आने का खतरा बढ़ता है, तो लोग संवेदनशील सूचनाएं साझा करने से बच सकते हैं। याचिका में एक्ट की धारा 37 पर भी सवाल उठाए गए हैं। DNPA का कहना है कि इस प्रावधान के तहत केंद्र सरकार को कुछ परिस्थितियों में सार्वजनिक जानकारी तक पहुंच सीमित करने का अधिकार मिल सकता है।

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CJI सूर्यकांत ने कहा अधिकारों के बीच संतुलन जरूरी

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि याचिकाकर्ता इस मामले में विशेषज्ञ हैं और वे सरकार को ऐसे सुझाव दे सकते हैं, जिनसे पत्रकारिता के काम की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि डेटा प्रोटेक्शन कानून के तहत लोगों की निजता और मीडिया की स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है। अदालत ने याचिकाकर्ता से ऐसे उपाय सुझाने को भी कहा, जिनसे कानून के दुरुपयोग की आशंका को दूर किया जा सके।

RTI एक्ट में बदलाव को भी चुनौती

DNPA ने सूचना का अधिकार कानून की धारा 8 में किए गए संशोधन को भी चुनौती दी है। एसोसिएशन का आरोप है कि इस बदलाव के कारण सरकारी अधिकारियों से जुड़ी जानकारी हासिल करने में मुश्किल हो सकती है। याचिका के मुताबिक, सार्वजनिक हित से जुड़े मामलों में भी सूचना देने से इनकार किए जाने की आशंका है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से इस मामले में जवाब मांगा है। अब इस पर अगली सुनवाई 17 नवंबर को होगी।

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संपादकीय टीम

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