
राजा ने अपने महल के सबसे बुद्धिमान मंत्रियों को एक ऐसी समस्या सुलझाने का आदेश दिया, जिसका उत्तर किसी के पास नहीं था। तभी एक गरीब माली आगे आया और बोला, “महाराज, यदि आप मुझे सात दिन दें, तो मैं आपको इसका उत्तर दे सकता हूँ।”
दरबार में बैठे लोग हँस पड़े। लेकिन सात दिन बाद जो हुआ, उसने राजा के घमंड से लेकर पूरे राज्य की सोच तक बदल दी।
कहानी
बहुत समय पहले सूर्यगढ़ नाम का एक विशाल राज्य था। वहाँ वीरेंद्र सिंह नाम का राजा शासन करता था। उसका राज्य धनसंपत्ति और सुंदर बगीचों के लिए प्रसिद्ध था। महल के चारों ओर रंगबिरंगे फूल खिलते थे और दूरदूर से लोग उन बगीचों को देखने आते थे।
राजा को अपने वैभव पर बहुत घमंड था। वह मानता था कि उसके राज्य में उससे अधिक बुद्धिमान कोई नहीं है।
उसी महल के एक छोटे से बगीचे में केशव नाम का बूढ़ा माली काम करता था। उसकी उम्र लगभग साठ वर्ष थी। उसके कपड़े साधारण थे, जूते पुराने थे और वह बहुत कम बोलता था। लेकिन पेड़पौधों की प्रकृति को वह इतनी अच्छी तरह समझता था कि सूखते हुए पौधे को देखकर ही बता देता था कि उसे किस चीज की कमी है।
एक वर्ष राज्य में वर्षा बहुत कम हुई। नदियों का पानी घटने लगा, कुएँ सूखने लगे और खेतों में दरारें पड़ गईं। राजा ने अपने मंत्रियों को बुलाकर आदेश दिया, “किसी भी कीमत पर राज्य में पानी की समस्या का समाधान खोजो। यदि अगले महीने तक पानी की व्यवस्था नहीं हुई, तो हमारी प्रजा भूखों मरने लगेगी।”
पहला मंत्री बोला, “महाराज, हमें पड़ोसी राज्य से पानी खरीदना चाहिए।”
दूसरे ने कहा, “हमें नए कुएँ खुदवाने चाहिए।”
तीसरे मंत्री ने सुझाव दिया, “राज्य के सभी तालाबों का पानी केवल खेती के लिए सुरक्षित कर दिया जाए।”
राजा ने सभी सुझाव सुने, लेकिन कोई भी ऐसा नहीं था जो पूरे राज्य की समस्या हल कर सके। पड़ोसी राज्य स्वयं सूखे से जूझ रहा था, नए कुएँ खोदने में बहुत समय लगता और तालाबों में पानी बचा ही कितना था?
तभी दरबार के बाहर खड़ा केशव आगे आया।
उसने हाथ जोड़कर कहा, “महाराज, यदि आप अनुमति दें, तो मैं राज्य के पुराने जलमार्गों को देखने जाना चाहता हूँ।”
दरबार में बैठे मंत्री ठहाका लगाकर हँस पड़े।
एक मंत्री ने कहा, “महाराज, अब राज्य की समस्याएँ माली सुलझाएँगे?”
दूसरा बोला, “जिसे अपने जीवन में महल के बाहर की दुनिया देखने का अवसर नहीं मिला, वह राज्य की व्यवस्था क्या समझेगा?”
राजा भी मुस्कराया।
“केशव, तुम्हारा काम फूलों की देखभाल करना है। राज्य की चिंता हम पर छोड़ दो।”
केशव ने विनम्रता से उत्तर दिया, “महाराज, मैं राज्य चलाना नहीं जानता। लेकिन धरती को पानी की जरूरत कब और कहाँ होती है, यह कुछ हद तक समझता हूँ। मुझे केवल सात दिन दे दीजिए।”
राजा ने सोचा कि बूढ़े माली को सात दिन देने में कोई नुकसान नहीं है।
उसने अनुमति दे दी।
सात दिनों की खोज
अगली सुबह केशव एक पुराना फावड़ा, रस्सी और मिट्टी रखने के लिए छोटी टोकरी लेकर निकल पड़ा।
वह सबसे पहले उन गाँवों में गया जहाँ पानी की सबसे अधिक कमी थी। उसने किसानों से बात की, सूखे तालाबों को देखा और जमीन की मिट्टी को हाथ में लेकर जाँचा।
पहले दिन उसे कुछ नहीं मिला।
दूसरे दिन उसने गाँव के बाहर एक पुरानी पत्थर की नाली देखी। वह नाली झाड़ियों और मिट्टी से पूरी तरह ढकी हुई थी। गाँव के बुजुर्गों ने बताया कि उनके दादा कहा करते थे कि कभी पहाड़ी से आने वाला वर्षा का पानी इसी नाली से होकर तालाबों तक पहुँचता था।
लेकिन किसी को नहीं पता था कि वह नाली कहाँ से शुरू होती थी और कहाँ समाप्त होती थी।
केशव ने उस रास्ते का पीछा करना शुरू किया।
तीसरे दिन उसे एक सूखा तालाब मिला, जिसकी तलहटी में नमी थी। उसने मिट्टी खोदकर देखी, तो नीचे कुछ गीली मिट्टी दिखाई दी।
उसने स्वयं से कहा, “पानी धरती से गायब नहीं हुआ है। संभव है कि उसका रास्ता बंद हो गया हो।”
चौथे दिन उसने पहाड़ी के पास एक विशाल पत्थर देखा। उसके पीछे मिट्टी और टूटे पेड़ों का ढेर जमा था। पास ही पत्थरों से बनी एक पुरानी सुरंग का मुँह था।
केशव समझ गया कि पहाड़ी से आने वाला पानी इसी रास्ते से बहता होगा। वर्षों पहले हुए भूस्खलन ने उसका मार्ग बंद कर दिया था।
लेकिन अकेले उस मलबे को हटाना असंभव था।
पाँचवें दिन वह गाँव लौटा और लोगों से सहायता माँगी।
कुछ किसानों ने उसका साथ दिया। दूसरे लोग हँसे।
“अगर वहाँ पानी होता, तो हमारे पूर्वज उसे खोज नहीं लेते?” एक किसान ने कहा।
केशव ने शांत स्वर में उत्तर दिया, “हो सकता है उन्होंने खोजा हो। लेकिन प्रकृति के रास्ते बंद भी हो जाते हैं। पुरानी चीजों को केवल पुराना समझकर छोड़ देना बुद्धिमानी नहीं है।”
उसकी बात सुनकर कुछ युवक उसके साथ चल पड़े।
छठे दिन उन्होंने मिलकर पत्थर और मिट्टी हटाई। काम बहुत कठिन था। कई बार लोगों को लगा कि सारी मेहनत बेकार जा रही है। लेकिन केशव ने उन्हें हिम्मत नहीं हारने दी।
सातवें दिन सुबह जब उन्होंने अंतिम बड़ा पत्थर हटाया, तो सुरंग के भीतर से पानी की एक पतली धारा बाहर निकली।
सबकी आँखें चमक उठीं।
कुछ ही देर में पानी का बहाव बढ़ने लगा। वह पुरानी नाली में बहता हुआ सूखे तालाब की ओर जाने लगा।
गाँव के लोग खुशी से चिल्ला उठे।
लेकिन केशव ने उन्हें रोकते हुए कहा, “अभी उत्सव मत मनाइए। हमें इस पानी का रास्ता ठीक करना होगा, ताकि यह व्यर्थ न बहे।”
उसने लोगों के साथ मिलकर नाली की मरम्मत की और तालाब तक पानी पहुँचाने की व्यवस्था बनाई।
राजा के दरबार में बड़ा खुलासा
आठवें दिन केशव महल पहुँचा। उसके कपड़े मिट्टी से भरे थे और चेहरे पर थकान थी।
राजा ने पूछा, “तो माली, तुम्हारी खोज का क्या परिणाम निकला?”
केशव ने कहा, “महाराज, पानी की समस्या का एक बड़ा कारण हमारे अपने बंद पड़े जलमार्ग हैं। पहाड़ी के पीछे की पुरानी सुरंग खुल गई है। पानी फिर से गाँवों के तालाबों तक पहुँच सकता है।”
राजा तुरंत अपने मंत्रियों के साथ वहाँ पहुँचा।
उसने अपनी आँखों से पानी बहते देखा। सूखे तालाब में पानी जमा होने लगा था। किसानों के चेहरों पर वर्षों बाद आशा दिखाई दे रही थी।
राजा आश्चर्यचकित रह गया।
“केशव, तुम्हें कैसे पता चला कि वहाँ पानी है?”
माली ने उत्तर दिया, “महाराज, मैंने यह नहीं माना कि पानी अवश्य मिलेगा। मैंने केवल उन संकेतों को ध्यान से देखा जिन्हें बाकी लोग बेकार समझकर छोड़ चुके थे।”
राजा ने पूछा, “तुमने इस काम के बदले कितने सोने के सिक्के माँगने का विचार किया है?”
केशव ने सिर झुकाकर कहा, “महाराज, मुझे अपने काम का उचित मेहनताना मिल जाए, तो पर्याप्त है। लेकिन मेरी एक विनती है।”
“कहो।”
“राज्य के पुराने तालाबों और जलमार्गों की देखभाल के लिए लोगों की एक टोली बनाई जाए। यदि हम पानी आने के बाद फिर लापरवाह हो गए, तो अगली पीढ़ी को वही संकट झेलना पड़ेगा।”
राजा कुछ देर तक चुप रहा।
उसने पहली बार महसूस किया कि उसके मंत्री समस्या आने के बाद उसका समाधान खोज रहे थे, जबकि केशव समस्या के पीछे छिपे कारण को समझने की कोशिश कर रहा था।
राजा ने उसी दिन राज्य में पुराने तालाबों, कुओं और जलमार्गों की मरम्मत का आदेश दिया। किसानों और कारीगरों को काम मिला, गाँवों में पानी जमा होने लगा और अगले वर्ष कम वर्षा होने पर भी राज्य पहले की तुलना में बेहतर स्थिति में रहा।
राजा ने केशव को दरबार में सम्मानित किया और उसे जलमार्गों की देखभाल करने वाली टोली का प्रमुख बना दिया।
लेकिन केशव पहले की तरह ही साधारण जीवन जीता रहा। वह सुबह उठकर पौधों को पानी देता और लोगों को धरती की देखभाल करना सिखाता।
एक दिन राजा स्वयं उसके बगीचे में आया।
उसने पूछा, “केशव, तुम्हें कभी इस बात का दुख नहीं हुआ कि लोग तुम्हें गरीब और साधारण समझकर तुम्हारी बात नहीं सुनते थे?”
केशव मुस्कराया और बोला, “महाराज, यदि पौधे को देखकर कोई माली की बुद्धि नहीं पहचानता, तो पौधे को फूल खिलाना बंद नहीं कर देना चाहिए।”
राजा ने उसकी बात सुनी और सिर झुका लिया।
उस दिन उसे समझ आया कि बुद्धिमत्ता का संबंध पद, धन या कपड़ों से नहीं होता। कई बार सबसे बड़ा ज्ञान उस व्यक्ति के पास होता है, जिसकी बात सुनने की किसी को आदत नहीं होती।
और सूर्यगढ़ में उस दिन के बाद एक नया नियम बना—राज्य की किसी भी बड़ी समस्या पर निर्णय लेने से पहले उन लोगों की बात भी सुनी जाएगी, जो उस समस्या को अपने जीवन में सबसे करीब से देखते हैं।
सीख
किसी की बुद्धिमत्ता का निर्णय उसके पद, धन या रूप से मत करो। कई बार समस्या का सबसे सटीक समाधान उसी व्यक्ति के पास होता है, जिसे दुनिया सबसे साधारण समझती है।