आजकल देश में जगहजगह अलगअलग वजहों से धरनाप्रदर्शन आम है. काकरोच जनता पार्टी और सम्पूर्ण विपक्ष के आंदोलनों ने इसे न केवल हवा दे दी है बल्कि धरनाप्रदर्शन बहस के केंद्र में आ गए हैं. अब तो अंग्रेजों से लेकर मुगलों तक के जमाने में विरोध प्रदर्शनों का इतिहास खंगाला जाने लगा है. इतिहास की किताबों के हवाले से लोग इन मुद्दों का जवाब तलाशने की कोशिश कर रहे हैं.

आइए, इसी बहाने यहां भी समझते हैं की मुगलों के दौर में विरोध प्रदर्शनों का स्वरूप क्या था? विरोध के लिए आम लोग कौन से तरीके अपनाते थे?
आज जैसा नहीं था विरोध का स्वरूप
मुगल दौर में भी विरोध होता था. लोग शिकायत करते थे, कर वसूली का प्रतिरोध करते थे, गांव छोड़ते थे और कभीकभी हथियार भी उठाते थे. स्थानीय शासक और समुदाय मुगल अधिकारियों या केंद्र की सत्ता को चुनौती देते थे. लेकिन उस समय विरोध का रूप आज के प्रदर्शन जैसा नहीं था. वह अपने समय की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों से बना था.
मुंबई में प्रदर्शन की तस्वीर.
मुगल कालीन विरोध को उसके समय के संदर्भ में ही समझना होगा. उस दौर में आम लोगों के पास आज जैसे चुनाव, राजनीतिक दल या सार्वजनिक सभा के अधिकार नहीं थे. सत्ता का बड़ा हिस्सा बादशाह, उसके अधिकारियों, स्थानीय शासकों और जमींदारों के हाथ में था. विरोध अक्सर तब तेज होता था जब लोगों पर कर का बोझ बढ़ता, स्थानीय अधिकारी ज्यादती करते या किसी समुदाय के अधिकारों पर दबाव पड़ता. इतिहासकार सतीश चंद्र की पुस्तक मध्यकालीन भारत: सल्तनत से मुगल काल तक में मुगल शासन, प्रशासन और क्षेत्रीय शक्तियों के संघर्षों की चर्चा मिलती है.
कर न देना और गांव छोड़ना आम था
मुगल राज्य की आय का बड़ा स्रोत जमीन से मिलने वाला राजस्व था. किसान फसल उगाते थे और उसका एक हिस्सा कर के रूप में देते थे. जब फसल खराब होती या वसूली बहुत कठोर होती, तो किसानों और गांवों पर दबाव बढ़ जाता था. ऐसे हालात में कुछ किसान कर देने से इनकार कर देते थे. कुछ लोग गांव छोड़कर दूसरे इलाके में चले जाते थे. इससे खेती और राजस्व, दोनों पर असर पड़ता था. गांव छोड़ना हमेशा खुला विद्रोह नहीं था. फिर भी यह शासन के लिए एक तरह का विरोध बनता था.
यदि किसान खेत छोड़ देते, तो अधिकारी राजस्व वसूल नहीं कर पाते. इससे सीधेतौर पर बादशाह का खजाना घट जाता था.स्थानीय जमींदार भी कभीकभी किसानों के पक्ष में खड़े होते थे, या अपने क्षेत्र पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए शाही अधिकारियों का विरोध करते थे. हबीब का अध्ययन दिखाता है कि ग्रामीण समाज में राजस्व और सत्ता के सवाल आपस में जुड़े हुए थे.
जहांगीर.
याचिकाओं के माध्यम से दरबार तक पहुंचाते थे दर्द
उस जमाने में हर विरोध हथियारों से नहीं किया जाता था. लोग बादशाह या उच्च अधिकारियों तक अपनी शिकायत पहुंचाने की कोशिश भी करते थे. वे फरियाद, अर्जी या प्रतिनिधियों के माध्यम से शिकायत कर सकते थे. दरबार में न्याय की उम्मीद करना भी शासन की राजनीतिक व्यवस्था का हिस्सा था. इसलिए किसी अधिकारी की ज्यादती की शिकायत ऊपर तक पहुंचाना विरोध का एक तरीका था.
ऐसी शिकायतें हमेशा सफल होती थीं, ऐसा नहीं कहा जा सकता. दरबार तक पहुंच, धन और प्रभाव की जरूरत पड़ सकती थी. फिर भी याचिका का रास्ता बताता है कि विरोध केवल विद्रोह या युद्ध तक सीमित नहीं था. प्रशासन से न्याय मांगना भी लोगों के लिए एक उपाय था.
जमींदारों और स्थानीय शासक भी करते थे विद्रोह
मुगल साम्राज्य का शासन हर जगह एक जैसा और पूरी तरह सीधा नहीं था. कई इलाकों में स्थानीय शासक और जमींदार अपनी शक्ति रखते थे. जब उन्हें लगा कि शाही अधिकारी उनकी सत्ता या आय में दखल दे रहे हैं, तो वे विरोध करते थे. कुछ ने कर रोक दिया. कुछ ने किलेबंदी की. कुछ ने सैनिक जुटाकर मुगल सेनाओं से लड़ाई की. ऐसे संघर्षों में स्थानीय स्वायत्तता भी दांव पर होती थी. इसलिए हर विद्रोह को केवल मुगलों के खिलाफ जनता का आंदोलन कहना सही नहीं होगा. कभी स्थानीय शासक अपने अधिकार बचाने के लिए लड़ते थे. कभी किसान और ग्रामीण समुदाय उनके साथ जुड़ते थे. सतीश चंद्र की पुस्तक में मुगल सत्ता और क्षेत्रीय शक्तियों के बीच ऐसे तनावों का व्यापक संदर्भ मिलता है.
किसान और समुदायों के सामूहिक विद्रोह
मुगल काल में कुछ विद्रोहों में ग्रामीण समुदायों ने सामूहिक रूप से हिस्सा लिया. मथुरा क्षेत्र में 17वीं शताब्दी के दौरान जाट प्रतिरोध इसका एक प्रमुख उदाहरण है. इस प्रतिरोध में स्थानीय नेतृत्व और ग्रामीण समाज की भूमिका थी. इसमें कई जगह सशस्त्र संघर्ष हुआ. सतनामी विद्रोह भी औरंगज़ेब के शासनकाल का एक उल्लेखनीय विरोध था. 1672 में नारनौल के आसपास सतनामियों और मुगल अधिकारियों के बीच संघर्ष हुआ. यह घटना दिखाती है कि स्थानीय टकराव कभी व्यापक विद्रोह में बदल सकता था. हालांकि, ऐसे प्रसंगों के कारणों और उनके स्वरूप पर इतिहासकार एकमत नहीं हैं. रूपस्वरूप में कई बार भेद मिलता है.
सिख, मराठा और राजपूत प्रतिरोध भी
मुगल शासन के सामने विरोध केवल किसानों या ग्रामीण समूहों से नहीं आया. सिख समुदाय, मराठा शक्ति और कुछ राजपूत शासकों ने भी अलगअलग समय पर मुगल सत्ता का विरोध किया. इन संघर्षों के कारण एक जैसे नहीं थे. इनमें राजनीतिक स्वतंत्रता, स्थानीय अधिकार, उत्तराधिकार, धार्मिकसामुदायिक तनाव और राजस्व जैसे मुद्दे शामिल हो सकते थे.
मराठों ने कई बार छापामार युद्ध और तेज़ सैन्य हमलों की रणनीति अपनाई. शिवाजी और उनके उत्तराधिकारियों के संघर्षों का वर्णन जदुनाथ सरकार की किताब शिवाजी एण्ड हिज टाइम्स में मिलता है. राजपूतों और मुगलों के संबंध भी हमेशा युद्धपूर्ण नहीं थे. कई राजपूत शासक मुगल प्रशासन में शामिल हुए, जबकि कुछ अवसरों पर संघर्ष भी हुआ. इससे पता चलता है कि विरोध और सहयोग, दोनों एक ही राजनीतिक व्यवस्था में मौजूद थे.
विरोध के इन तरीकों की अपनी सीमाएं थीं
मुगल कालीन विरोध को आधुनिक लोकतांत्रिक आंदोलन के बराबर नहीं रखना चाहिए. उस समय आम लोगों को संगठित राजनीतिक दल बनाने या नियमित जनसभाएं करने की वैसी व्यवस्था नहीं थी. विरोध अक्सर स्थानीय होता था. उसका नेतृत्व जमींदार, धार्मिक नेता, स्थानीय सरदार या प्रभावशाली समुदाय कर सकते थे. कई संघर्षों में हिंसा भी होती थी. राज्य की सेना विद्रोह को दबा सकती थी और लोगों को कठोर दंड दिया जा सकता था. इसलिए विरोध के तरीकों में शांतिपूर्ण शिकायत से लेकर कर रोकने, स्थान बदलने और सशस्त्र विद्रोह तक कई रूप शामिल थे. हर घटना का कारण और उसका नेतृत्व अलग था.
इतिहासकारों की पुस्तकों को पढ़ते समय यह भी ध्यान रखना चाहिए कि दरबारी इतिहास अक्सर शासकों और युद्धों पर अधिक ध्यान देते हैं. आम लोगों के रोजमर्रा के विरोध के बारे में जानकारी बिखरी हुई मिलती है.