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धरना-प्रदर्शन का अधिकार… संविधान सभा में क्यों हुई थी इसकी सीमाओं पर बहस?​

शांतिपूर्ण धरना, प्रदर्शन और सभाओं के जरिए विरोध प्रदर्शित करने के अधिकार को संरक्षण देते समय संविधानसभा में उनके औचित्य और सीमाओं पर भी चर्चा हुई थी. मूल अधिकारों की बहस में एक ओर नव स्वतंत्र देश में विरोध के नाम पर हिंसा की आशंका से सदस्य सचेत थे. दूसरी ओर इस बात को लेकर […]

शांतिपूर्ण धरना, प्रदर्शन और सभाओं के जरिए विरोध प्रदर्शित करने के अधिकार को संरक्षण देते समय संविधानसभा में उनके औचित्य और सीमाओं पर भी चर्चा हुई थी. मूल अधिकारों की बहस में एक ओर नव स्वतंत्र देश में विरोध के नाम पर हिंसा की आशंका से सदस्य सचेत थे. दूसरी ओर इस बात को लेकर फिक्रमंद थे कि शांति व्यवस्था और सुगम प्रशासन के नाम पर राज्य में ऐसी शक्तियां निहित न हो जायें,जिससे असहमति की अभिव्यक्ति ही मुमकिन न रह जाए. हालांकि डॉक्टर आंबेडकर आजाद भारत में अन्य संवैधानिक उपायों की उपलब्धता के कारण विरोध के इन तरीकों के परित्याग के पक्षधर थे. इस विषय में 25 नवंबर 1949 का उनका भाषण आज भी दोहराया जाता है, जिसमें उन्होंने कहा था कि जब संवैधानिक रास्ते उपलब्ध नहीं थे, तब असंवैधानिक तरीकों के लिए कुछ औचित्य हो सकता था. लेकिन जब संविधानसम्मत रास्ते खुले हों, तब ऐसे तरीकों को उचित नहीं ठहराया जा सकता.”

कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन के मद्देनजर आवागमन और सुरक्षा से जुड़े तमाम प्रतिबंधों के बीच आज दिल्ली कसमसा गई. इसी मौके पर पढ़िए धरनाविरोध प्रदर्शन और असहमति व्यक्त करने के सवालों से जुड़ी संविधानसभा की कार्यवाही के कुछ अंश.

आजादी के आंदोलन का हथियार, आजाद भारत की चुनौती

धरना, प्रदर्शन, असहयोग और सत्याग्रह जैसे अहिंसक उपाय ब्रिटिश शासन के विरोध में भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के पर्याय थे. महात्मा गांधी ने सत्याग्रह को केवल विरोध का तरीका नहीं, बल्कि अन्याय के सामने अहिंसक प्रतिरोध और आत्मबलिदान का साधन बनाया. अंग्रेजी हुकूमत के समय भारतीयों के पास अपनी सरकार चुनने और अनुकूल नीतियों की मांग के मंच और उपाय नहीं थे. इन्हें हासिल करने के लिए कानून तोड़कर सरकार को चुनौती देने का रास्ता चुना गया. लेकिन आजादी के बाद की स्थिति भिन्न थी. देश में संविधान, निर्वाचित संसद, सरकार, न्यायपालिका और चुनाव की व्यवस्था स्थापित होनी थी.

प्रश्न था कि जब नागरिकों को अपने अधिकारों के लिए संवैधानिक रास्ते उपलब्ध हों, तब क्या सविनय अवज्ञा और सत्याग्रह की जरूरत रह जाएगी? दूसरा सवाल था कि अधिकार सम्पन्न सरकार अगर कर्तव्य विमुख हो नागरिक अधिकारों की अनदेखी करे तो क्या जनता सिर्फ अगले चुनाव का इंतजार करे?

भारतीय संविधान.

अधिकार सिर्फ कागज पर नहीं चाहिए

1 दिसंबर 1948 को मूल अधिकारों से जुड़ी बहस के दौरान दामोदर स्वरूप सेठ ने अधिकारों पर अंकुश को अनुचित बताया था. सेठ और के. टी. शाह ने इस आशय के संशोधन पेश किए जिसमें अधिकारों पर प्रस्तावित प्रतिबंधों के औचित्य पर सवाल थे. उनकी आपत्ति थी कि एक ओर नागरिकों को अधिकार दिए जाएं और दूसरी ओर उन पर व्यापक प्रतिबंध लगा दिए जाएं, तो अधिकारों की वास्तविक उपयोगिता कमजोर हो सकती है.

चिंता थी कि कहीं ऐसा न हो कि विदेशी शासन की तरह भारतीय शासन में भी नागरिक स्वतंत्रता पर नियंत्रण की प्रवृत्ति बनी रहे. संविधानसभा के सामने एक ओर नवस्वतंत्र देश में अशांति और हिंसा की आशंका थी, तो दूसरी ओर यह जोखिम भी था कि सार्वजनिक व्यवस्था के नाम पर सरकार विरोध की आवाज को दबाने की शक्ति न प्राप्त कर ले. दामोदर स्वरूप सेठ के संशोधनों पर चर्चा के समय यह साफ कहा गया कि मौलिक अधिकारों को केवल कागज पर दर्ज करना काफी नहीं है. उन्हें प्रभावी संरक्षण दिया जाए. उन पर प्रतिबंध का आशय यह नहीं होना चाहिए कि व्यावहारिक रूप में उनकी उपयोगिता ही समाप्त हो जाए.

डॉ. भीमराव आंबेडकर.

शांतिपूर्ण विपक्ष, लोकतंत्र की जरूरत

इसी विषय की दूसरे दिन की बहस में सरदार भोपाल सिंह माण ने कहा था कि शांतिपूर्ण और देशद्रोह से रहित विपक्ष को पूरा अवसर मिलना चाहिए. विपक्ष किसी भी लोकतांत्रिक सरकार का अनिवार्य अंग है. उनका आशय था कि विधिसम्मत और शांतिपूर्ण विरोध के दमन से लोकतंत्र कमजोर होगा. सेठ गोविंद दास चाहते थे कि नागरिकों को दिए जा रहे अधिकारों पर कम प्रतिबंध रहें. लेकिन तत्कालीन परिस्थितियों और नवजात भारतीय सरकार की स्थिति को देखते हुए कुछ प्रतिबंधों को उन्होंने भी जरूरी माना.

शांतिपूर्ण और बिना हथियार सभा करने के अधिकार पर बोलते हुए सेठ ने अहिंसा की विरासत को याद किया था. उनका कहना था कि भारत ने अहिंसा के सिद्धांत को स्वीकार करके स्वतंत्रता प्राप्त की है. इसलिए लोगों को बिना हथियार कहीं एकत्र होने का अधिकार मिलना चाहिए. इस बहस के दो पहलू थे. एक ओर सदस्यों को सरकार को सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की शक्ति देने की चिंता थी. दूसरी ओर उनका यह आग्रह कि वैध और शांतिपूर्ण विपक्ष को पर्याप्त स्थान दिया जाना चाहिए. संविधानसभा ने अंततः शांतिपूर्ण सभा को मौलिक अधिकार के रूप में स्वीकार किया. हालांकि इस अधिकार को सार्वजनिक व्यवस्था के हित में उचित प्रतिबंधों के अधीन रखा गया.

नई दिल्ली में हुए कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन की तस्वीर. फोटो: पीटीआई

रंगा ने सत्याग्रह को अधिकारों की रक्षा का आधार बताया

9 दिसंबर 1948 की बहस में प्रोफेसर एन. जी. रंगा ने अहम सवाल उठाया. पूछा कि अगर किसी संगठित राजनीतिक शक्ति या सरकार द्वारा नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन किया जाए और न्यायालय के आदेशों की भी अवहेलना हो, तो उन अधिकारों की रक्षा कौन करेगा? खुद ही जवाब देते हुए रंगा ने महात्मा गांधी के सत्याग्रह को ऐसी परिस्थिति में महत्वपूर्ण साधन बताया. उनके अनुसार सत्याग्रह अहिंसक होना चाहिए और उसमें आत्मबलिदान का भाव होना चाहिए.

शर्त है कि सत्याग्रही अहिंसक रहे और दूसरों को हिंसा के लिए न उकसाए. एच. वी. कामथ ने रंगा से सवाल किया था कि क्या सत्याग्रह का अधिकार भी मौलिक अधिकार है? रंगा का जवाब था कि सत्याग्रह मौलिक अधिकारों के लिए बुनियादी महत्व रखता है. लेकिन इसे संविधान में अलग से मौलिक अधिकार के रूप में दर्ज करना जरूरी नहीं है. इसकी वास्तविक शक्ति लोगों की त्याग और आत्मबलिदान की क्षमता में है. रंगा की दलील इस सोच को चुनौती देती थी कि संविधान में उल्लेख और न्यायालय जाने का रास्ता खुले होने मात्र से नागरिकों के अधिकार हर परिस्थिति में सुरक्षित हो जाएंगे. अगर संस्थाएं ही अधिकारों की रक्षा करने में विफल हों, तो अहिंसक जनप्रतिरोध की भूमिका पर विचार करना पड़ेगा. इस तरह रंगा ने सत्याग्रह को महज औपनिवेशिक अतीत की विरासत नहीं, बल्कि आजाद भारत में भी अधिकारों की रक्षा के लिए एक नैतिक शक्ति के रूप में देखा.

10 अक्टूबर के प्रदर्शन की तस्वीर. फोटो: पीटीआई

आंबेडकर ने क्यों कहा अराजकता का व्याकरण?

संविधानसभा में डॉ. आंबेडकर का 25 नवंबर 1949 का ऐतिहासिक समापन भाषण इस बहस का दूसरा निर्णायक पक्ष प्रस्तुत करता है. उन्होंने कहा कि सामाजिक और आर्थिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए संवैधानिक तरीकों पर दृढ़ रहना चाहिए. उनका जोर था कि सविनय अवज्ञा, असहयोग और सत्याग्रह के तरीकों को छोड़ देना चाहिए. उनके शब्द हैं,” यदि हमें लोकतंत्र को केवल औपचारिक रूप में ही नहीं, बल्कि वास्तविक रूप में भी बनाए रखना है, तो हमें क्या करना चाहिए? मेरी राय में, सबसे पहली बात यह है कि हमें अपने सामाजिक और आर्थिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए संवैधानिक तरीकों पर दृढ़ रहना चाहिए. इसका अर्थ है कि हमें क्रांति के हिंसक तरीकों को छोड़ देना चाहिए. इसका अर्थ है कि हमें सविनय अवज्ञा, असहयोग और सत्याग्रह के तरीकों को छोड़ देना चाहिए. जब सामाजिक और आर्थिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए संवैधानिक तरीकों का कोई रास्ता नहीं बचा था, तब असंवैधानिक तरीकों को अपनाने का पर्याप्त औचित्य था. लेकिन जब संवैधानिक तरीके उपलब्ध हों, तब इन असंवैधानिक तरीकों को अपनाने का कोई औचित्य नहीं हो सकता. ये तरीके अराजकता का व्याकरण मात्र हैं और जितनी जल्दी इन्हें छोड़ दिया जाए, उतना ही हमारे लिए बेहतर होगा.

असंवैधानिक दबाव लोकतंत्र को करेंगे कमजोर

आंबेडकर को चिंता थी कि अगर स्वतंत्र भारत में राजनीतिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए संवैधानिक उपायों के स्थान पर असंवैधानिक दबाव का रास्ता अपनाया गया, तो लोकतंत्र की बुनियाद कमजोर हो सकती है. उनका मत था कि नागरिकों के अधिकारों की रक्षा, सरकार की जवाबदेही और सामाजिक परिवर्तन का रास्ता संविधान के भीतर से निकलना चाहिए. आंबेडकर की नसीहत की मंशा समझना जरूरी है. उन्होंने उपलब्ध संवैधानिक रास्तों के रहते सविनय अवज्ञा, असहयोग और सत्याग्रह को खारिज किया. लेकिन उनके इस कथन को इस अर्थ में पढ़ना कि हर शांतिपूर्ण धरना, प्रदर्शन या सरकार की आलोचना असंवैधानिक है, संविधान के पाठ और उनके वक्तव्य—दोनों को अधूरा पढ़ना होगा.

संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को शांतिपूर्वक और बिना हथियार सभा करने का अधिकार देता है. यह अधिकार कोई प्रशासनिक रियायत नहीं, बल्कि संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकार है. हालांकि अनुच्छेद 19 के अंतर्गत भारत की संप्रभुता और अखंडता तथा सार्वजनिक व्यवस्था के हित में राज्य इसमें उचित प्रतिबंध लगा सकता है. अर्थ स्पष्ट है . शांतिपूर्ण विरोध और कानून की अवज्ञा को एक ही श्रेणी में नहीं रखा जा सकता. सरकार की नीतियों की आलोचना करना, किसी कानून में संशोधन की मांग करना, शांतिपूर्ण धरना देना, विरोधमार्च निकालना और जनसभा करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का अंग है . दूसरी ओर, हिंसा, धमकी, सार्वजनिक व्यवस्था को गंभीर रूप से भंग करना या वैध कानूनी प्रतिबंधों का उल्लंघन करना अलग प्रश्न हैं, जिनका आकलन परिस्थितियों और लागू कानून के अनुसार राज्य प्रशासन करेगा.

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संपादकीय टीम

खबर मंकी की अनुभवी एडिटोरियल डेस्क। हमारे लेखक और संपादक दिन-रात निष्पक्ष, सटीक और तीव्र समाचार आप तक पहुँचाने के लिए काम करते हैं।

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