Kanshi Ram Death Anniversary: उत्तर प्रदेश में 2007 में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने वाली बसपा फिलहाल हाशिए पर है. 2012 से पार्टी की हार का सिलसिला थम नहीं रहा है. कांशीराम ने बामसेफ, डीएस4 और फिर बसपा के जरिए जो मजबूत संगठन तैयार किया वह पस्त नज़र आ रहा है. पार्टी पर मायावती की पकड़ निर्विवाद है. लेकिन उसका आधार सिमटता जा रहा है. 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तेज दस्तक के बीच बसपा की चर्चा उसकी चुनावी तैयारियों से ज्यादा मायावती के अपने भाई के परिवार से राजनीतिक उत्तराधिकारी चयन को लेकर रोज बदलते फैसलों की है.

फर्श से अर्श पर पहुंची बसपा फिलहाल लोकसभा और उत्तर प्रदेश विधानसभा में शून्य पर है. बसपा संस्थापक कांशीराम की पुण्यतिथि के मौके पर पार्टी के सफ़र और मौजूदा हालत पर एक नज़र.
बहुजन समाज को सत्ता में हिस्सेदारी का दिया भरोसा
कांशीराम को बहुजन समाज में यह भरोसा पैदा करने का यश प्राप्त है कि सत्ता में हिस्सेदारी तुम्हारा अधिकार है. उन्होंने शुरुआत सरकारी कर्मचारियों के बीच बामसेफ के जरिए की. फिर डीएस4 को मजबूत किया. इस जमीनी तैयारी का अगला पड़ाव बहुजन समाज पार्टी थी. 1984 में पार्टी के गठन का कांशीराम का मकसद इसे चुनावी मशीन नहीं बल्कि सामाजिक परिवर्तन का औजार बनाना था. उनका लक्ष्य था दलित, आदिवासी, पिछड़े और अल्पसंख्यक समाज को जोड़कर ऐसी राजनीतिक ताकत में बदलना, जो सत्ता में अपनी हिस्सेदारी तय कर समाज की वंचितोंअति पिछड़ों के प्रति अपनी सोच बदले.
बसपा संस्थापक कांशीराम.
कांशीराम ने इस राजनीतिक ताकत को अकेले बसपा के बूते हासिल करने का इंतजार नहीं किया. शुरुआत साझीदारी से की. उसके लिए सहयोगी की राजनीतिक विचारधारा और भिन्न सामाजिक आधार से परहेज नहीं किया. मकसद बसपा का विस्तार था. सत्ता जरूरी थी. अकेले मुमकिन नहीं थी.
भाजपा को साथ लेकर अपनी शिष्या मायावती को 1995, 1997 और 2003 तीन बार गठबंधन सरकारों का उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री बनवा दिया. दूसरी तरफ रामलहर में हिंदू समाज पर पकड़ मजबूत करती भाजपा को कमजोर करने के लिए मुलायम सिंह से हाथ मिलाया. नारा उछलामिले मुलायमकांशीराम हवा में उड़ गए श्रीराम. 6 दिसंबर 1992 को बाबरी ध्वंस हुआ. लेकिन सपा बसपा गठबंधन ने भाजपा को 1993 के चुनाव में सत्ता से दूर कर दिया.
2007 तक तरक्की का सफ़र
बसपा का सर्वोत्कृष्ट प्रदर्शन 2007 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में था, जिसमें 206 सीटें हासिल करके उसने पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई. इस जीत की पटकथा कांशीराम ने लिखी थी. हालांकि 9 अक्टूबर 2006 को निधन होने के कारण इस बड़ी उपलब्धि के साक्षी होने का सौभाग्य उन्हें नहीं मिल सका. 1993 से 2007 के बीच के उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव बसपा की तरक्की के लिए याद किये जाते हैं.
कांशीराम और मायावती.
1993 में सपा के साथ गठबन्धन में बसपा 164 सीटों पर लड़ी. 67 पर जीत दर्ज की. वोट प्रतिशत 28.32 था. 1996 में कांग्रेस के साथ गठबन्धन था. पार्टी ने चुनाव मैदान में 296 उम्मीदवार उतारे. लेकिन सीटें पिछली बार की तरह 67 ही मिलीं. प्राप्त मतों में मामूली गिरावट हुई. यह 27.73 प्रतिशत था. 2002 में मतों में चार प्रतिशत से अधिक गिरावट अर्थात 23.19 प्रतिशत मत प्राप्त करने के बाद भी पार्टी की सीटें बढ़कर 98 हो गईं. 2007 में पार्टी का प्रदर्शन धमाकेदार था. वोट प्रतिशत 30.43 पर पहुंच गया और 206 सीटें जीतकर बसपा ने अपने दम पर सरकार बना ली.
2012 से हार का सिलसिला
प्रभाव 2012 में शुरू हुआ. पार्टी सत्ता से बाहर हुई. सीटें 80 बचीं. लेकिन 25.91 प्रतिशत वोट के साथ उसका सामाजिक आधार तब भी मजबूत था. 2014 के लोकसभा चुनाव और निराशाजनक साबित हुए. पार्टी 503 सीटों पर लड़ी. वोट 19.77 प्रतिशत थे. लेकिन सीट एक भी नहीं हासिल हुई. पार्टी को अगला झटका 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में लगा. 2012 की तुलना में लगभग तीन प्रतिशत वोटों में और 61 सीटों की कमी हुई. इस चुनाव में वोट प्रतिशत 22.24 था और सीटें 19 रह गईं. सिलसिलेवार हार से परेशान मायावती ने 2019 में निजी खुन्नस को किनारे रखते हुए मिजाज के खिलाफ एक बड़ा राजनीतिक फैसला किया.
बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती
यह फैसला मुलायम सिंह यादव और उनके परिवार से 25 साल पुरानी बैर को भूलते हुए लोकसभा चुनाव में सपा से गठबंधन का था. बसपा को उत्तर प्रदेश की दस लोकसभा सीटों पर कामयाबी मिली. वोट प्रतिशत 19.43 था. मायावती को वापसी का भ्रम हुआ. सपा से गठबंधन तोड़ दिया. 2022 में अकेले विधानसभा चुनाव लड़ते हुए बसपा का वोट प्रतिशत गिरकर 12.88 प्रतिशत रह गया. 403 सीटों पर लड़कर वह सिर्फ एक सीट—रसड़ा—जीत सकी. सिर्फ18 सीटों पर पार्टी दूसरे स्थान पर रही. 290 पर जमानत गंवाई. 2024 के लोकसभा चुनाव में गिरावट और तेज रही. उत्तर प्रदेश में पार्टी का वोट लगभग 9.4 प्रतिशत रह गया और सीट शून्य थी.
भुला दी कांशीराम की सीख
इकलौते विधायक उमाशंकर सिंह के निधन के कारण उत्तर प्रदेश विधानसभा में अब बसपा का कोई प्रतिनिधि नहीं हैं. विधानपरिषद में भी यही स्थिति है. लोकसभा में वह शून्य पर पहले से है. राज्यसभा में रामजी गौतम के नवंबर में रिटायर होने के बाद वहां भी पार्टी का कोई प्रतिनिधित्व नहीं रह जाएगा. फर्श से अर्श पर पहुंची बसपा शून्य पर क्यों है ? कांशीराम ने बसपा को जिस सामाजिक इंजीनियरिंग और संगठनात्मक अनुशासन से खड़ा किया , उसमें व्यक्ति से बड़ा संगठन था. संगठन से बड़ा आंदोलन. डीएस4 का नारा—ठाकुर, ब्राह्मण, बनिया छोड़, बाकी सब हैं डीएस4—सिर्फ चुनावी नारा नहीं था. वह सत्तासमीकरण बदलने की घोषणा थी. लेकिन कांशीराम के सक्रिय राजनीतिक जीवन और फिर निधन के बाद बसपा ऐसे संगठन में बदलती गई, जिसके केंद्र में सिर्फ और सिर्फ मायावती हैं.
मायावती, आकाश, दीपिका और ईशान.
सिर्फ और सिर्फ मायावती
कांशीराम के साथ काम करने वाले पुराने साथियों का जल्दी ही बसपा से अलगाव हुआ. अधिकतर की मायावती ने छुट्टी की. कुछ खुद ही अलग हो गए. 1995, 1997 और 2003 में उत्तर प्रदेश में हुए बड़े पैमाने के दलबदल और टूटफूट ने भी बसपा को कमजोर किया. बाद के वर्षों में स्वामी प्रसाद मौर्य, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, लालजी वर्मा, रामअचल राजभर जैसे अनेक पुराने और प्रभावशाली चेहरे भी पार्टी से बाहर हुए. हर बार कारण अलग रहा होगा, लेकिन तस्वीर एक ही बनी—बसपा में मायावती के बाद कौन? यह सवाल जितना बड़ा होता गया, उत्तर उतना ही छोटा होता गया.
कांशीराम का बहुजन तेजी से मायावती की छाया में सिमट गया. परिवार के भीतर भी यह तलाश प्रहसन में बदल गई. मायावती बहुजन समाज को अपना परिवार बताती हैं. लेकिन उसकी अगुवाई के योग्य वे सिर्फ अपने भाई आनन्द कुमार के तीन बच्चों के बीच पाती हैं. वहां भी चयन में दुविधा का आलम है कि आकाश आनन्द तीन बार बाहर किए गए. चौथी बार वापसी हुई. फिर राष्ट्रीय संयोजक बनाए गए. ईशान आनंद अब पद के बिना संगठन को मजबूत करेंगे. दीपिका आनंद चाहेंगी तो उनके लिए भी दरवाजे खुले हैं.
क्यों बना भाजपा की “बी” टीम का नैरेटिव
कांशीराम के निधन के दो दशक बाद बसपा किस मुकाम पर है? उत्तर प्रदेश विधानसभा के 2027 के चुनाव नजदीक हैं. बसपा इतनी मजबूत नहीं रह गई कि अकेले कोई करिश्मा दिखा सके. विपक्षी इंडिया गठबंधन से पार्टी दूर है. भाजपा के भी साथ नहीं है. लेकिन भाजपा विरोधी दल उसे भाजपा की बी टीम मानते हैं. उनका आरोप है कि गैर भाजपा वोटों का बंटवारा करके वह भाजपा को मदद करती है. बेशक बसपा इसे ख़ारिज करती है. लेकिन उत्तर प्रदेश की बड़ी राजनीतिक ताकत समाजवादी पार्टी कम से कम मुस्लिम वोटरों के मन में यह नैरेटिव कायम करने में कामयाब हो गई है. यह स्थिति क्यों पैदा हुई? वोटरों का एक हिस्सा उस उम्मीदवार की ओर झुकता है जो जीत सके. मुस्लिम वोटर की प्राथमिकता भाजपा को हराना है. 2022 के विधानसभा चुनाव में एक सीट पर जीत और महज 18 पर दूसरे स्थान पर रही बसपा को वोटरों के बीच सत्ता की दावेदार पार्टी का फिर से भरोसा दिलाने में वक्त लग सकता है.
अतीत की पूंजी के भरोसे
मायावती के पास अभी भी एक बड़ा दलित सामाजिक आधार बचा हुआ है. उनके वोट सीटों के नतीजे बदल सकते हैं. लेकिन क्या अपनी जीत के लिए यह काफी हैं? उत्तर प्रदेश की जातीय राजनीति के लिए जीत लायक सोशल इंजीनियरिंग जमीन पर उतरनी चाहिए. इसे मुमकिन करने के लिए प्रेरक और लचीला नेतृत्व जरूरी है. ऐसे कार्यकर्ता चाहिए जो बूथ पर डटे रहें. उनसे निरंतर संवाद चाहिए. साथ ही जनता के बीच निरंतर नेतृत्व की मौजूदगी जरूरी होती है. यही वह जगह है जहां बसपा की सबसे बड़ी कमजोरी दिखाई देती है. जिस पार्टी के नेता कभी गांवगांव जाकर बहुजन समाज को राजनीतिक रूप से संगठित करते थे, उसकी सबसे बड़ी नेता मायावती की सक्रियता बड़ी चुनावी रैलियों तक सीमित रहती है. प्रतिद्वंद्वी भाजपा और सपा का नेतृत्व और कार्यकर्ता लगातार मैदान में दिखाई देता है.
कांग्रेस भी उत्तर प्रदेश में खोई जमीन तलाश रही है. दूसरी तरफ मायावती की सबसे बड़ी पूंजी उनका अतीत है. 2007 की जीत और पूर्ण बहुमत की सरकार. जातीय भागीदारी और दलित अस्मिता की राजनीति. वे वंचितों की रहनुमाई की दावेदारी करती हैं लेकिन उनकी पहचान ऐसे नेता की है , जिससे आम आदमी का संवाद दूर पार्टी के कैडर की मुलाकात आसान नहीं होती. हर अगले चुनाव के नतीजों की अटकलों के लिए उस पार्टी के पिछले प्रदर्शन की पड़ताल होती है. बीच के वक्त की कोशिशों का भी जिक्र होता है. 2027 में वोटरों के बीच जाते समय बसपा के पास शायद ही बताने के लिए कुछ रहे कि विपक्ष में रहते उसने जनहित में क्या और कब संघर्ष किया!