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ब्लू टिक आया, जवाब नहीं.. लेट रिप्लाई में रिलेशनशिप बन गया डिजिटल कोर्ट रूम ?​

रिया ने शाम पांच बजे अपने दोस्त को मैसेज किया. कुछ मिनट बाद ब्लू टिक भी आ गया यानी मैसेज पढ़ लिया गया था. रिया ने फोन रख दिया, लेकिन थोड़ी देर बाद फिर देखा कोई जवाब नहीं. सामने वाला ऑनलाइन आया, कुछ देर रहा और चला गया. जवाब फिर भी नहीं आया. अब रिया […]

रिया ने शाम पांच बजे अपने दोस्त को मैसेज किया. कुछ मिनट बाद ब्लू टिक भी आ गया यानी मैसेज पढ़ लिया गया था. रिया ने फोन रख दिया, लेकिन थोड़ी देर बाद फिर देखा कोई जवाब नहीं. सामने वाला ऑनलाइन आया, कुछ देर रहा और चला गया. जवाब फिर भी नहीं आया. अब रिया के दिमाग में सवाल घूमने लगे—क्या वो मुझसे नाराज है? मैंने कुछ गलत तो नहीं कह दिया? क्या वो जानबूझकर जवाब नहीं दे रहा? यही छोटीसी बात कई बार बेचैनी, शक और रिश्तों में बहस की वजह बन जाती है.

कई बार जवाब के इंतजार में बैठे इंसान को लग सकता है कि सामने वाले के पास मेरे लिए पंद्रह सेकेंड का भी वक्त नहीं. लेकिन जिसने मैसेज पढ़ा उसके भी बिजी होने के अपने तर्क हो सकते हैं. बात अब सिर्फ जवाब देने के एटीकेट्स की नहीं, ब्लू टिक के बाद भी ना मिले जवाब से पैदा होने वाले सवालों की है.

पहले इंतजार में सब्र था, अब स्क्रीन पर जवाब चाहिए

पहले किसी के जवाब का इंतजार अपने आप में एक मीठा एहसास था. चिट्ठी लिखने के बाद उसे पहुंचने में वक्त लगता था, फिर उसे पढ़ने और जवाब लिखकर भेजने में भी कई दिन गुजर जाते थे. इस इंतजार में सब्र था और एक खूबसूरतसी उम्मीद भी. आज फोन की स्क्रीन सब कुछ तुरंत दिखा देती है, मैसेज पहुंच गया, पढ़ लिया गया, सामने वाला ऑनलाइन भी है फिर भी जवाब नहीं आया. यहीं से इंतजार कई बार बेचैनी में बदल जाता है.

ब्लू टिक देखकर क्यों बढ़ती है बेचैनी?

2026 में कम्प्यूटर्स इन ह्यूमन बिहेवियर रिपोर्ट्स जर्नल में जापान के रिसर्चर्स युकी काटो और शोगो काटो की स्टडी इमोशनल रिएक्टिविटी टू डिलेड रिप्लाइज: टेम्पोरल डायनैमिक्स, कॉन्टेक्स्ट, एंड एज डिफरेंसेस पब्लिश हुई, जिसमें 15 से 59 साल की उम्र के 2,367 लोगों को शामिल किया गया. रिसर्च में पाया गया कि मैसेज का जवाब मिलने में जितनी देरी बढ़ती है, नकारात्मक भावनाओं की संभावना भी बढ़ती जाती है. इनमें एंग्जायटी सबसे जल्दी और सबसे ज्यादा महसूस होने वाली प्रतिक्रिया रही. खास बात यह रही कि जब सामने वाला मैसेज पढ़ चुका हो लेकिन जवाब न दे, तो निगेटिव थॉट्स जल्दी आने की संभावना दिखी.

क्या हर लेट रिप्लाई मतलब इग्नोर करना है?

डॉ. समीर मल्होत्रा, मैक्स हॉस्पिटल साकेत के मेंटल हेल्थ एंड बिहेवियरल साइंसेज डिपॉर्टमेंट के हेड कहते हैं हो सकता है सामने वाला किसी ज़रूरी काम में बिजी हो या उस समय किसी और से ज़रूरी बात कर रहा हो या मीटिंग में हो.ऐसे में उसके लिए आपका कॉल लेना मुश्किल हो सकता है अपना धीरज बनाए रखना चाहिए. कुछ देर के बाद दोबारा मेसेज करने की कोशिश कर सकते हैं बजाय डायरेक्ट कॉल करने के. अगर किसी के लेट रिप्लाई पर बारबार चिंता, कन्फ्यूज़न या गलतफहमी पैदा हो रही है, तो ऑनलाइन स्टेटस देखकर नतीजा निकालने की बजाय, कुछ समय पश्चात शांत तरीके से बात करना ज्यादा हेल्दी है. देर से मिले जवाब के पीछे व्यस्तता, वर्क प्रेशर, मेंचल स्ट्रेस या पर्सनल कंडीशन हो सकती है.

रिश्तों में कयास लगाने की बजाय डिस्कस करना चाहिए. अपनी बात आरोप की तरह रखने के बजाय यह कहना बेहतर है कि, जब काफी देर तक जवाब नहीं आता तो मुझे चिंता या असमंजस होने लगता है. इससे सामने वाला भी अपना पक्ष रख सकता है.

रीड रिसीट यानि ब्लू टिक ने मुश्किल किया इंतजार?

मनोचिकित्सक डॉ. समीर मल्होत्रा कहते हैं पहले किसी मैसेज का जवाब नहीं मिलता था तो पता नहीं चलता था कि सामने वाले ने संदेश देखा भी है या नहीं. अब Seen, Read और Blue Tick हमें लगातार अपडेट करता है कि मैसेज देखा जा चुका है . जिससे इंतजार का नेचुरल प्रॉसेस कई बार निगरानी और एक्सपेक्टेशन में बदल जाता है मैसेज देख लिया है, फिर जवाब क्यों नहीं दिया? यही सोच बेचैनी बढ़ा सकती है. जरूरी है कि रीड रिसीट को जवाब देने की बाध्यता न समझें. किसी ने मैसेज पढ़ लिया है, इसका मतलब ये नहीं कि वो तभी के तभी जवाब देने की इमोशनल या मेंटल कंडीशन में हो भी,

रिलेशनशिप एक्सपर्ट काउंसलर निशा खन्ना कहती है रीड रिसीट और सीन स्टैम्प अब एक तरह के साइकोलॉजिकल ट्रिगर की तरह काम कर सकते हैं.

रीड रिसीट ने हमारे लिए इंतज़ार करना मुश्किल कर दिया है? अकॉर्डिंग टू अटैचमेंट थ्योरी के अनुसार, रीड रिसीट और सीन स्टैम्प हमारे एक साइकोलॉजिकल ट्रिगर को एक्टिवेट करते हैं. खासतौर पर एंग्जायटी अटैचमेंट स्टाइल के लोग इससे मोस्टली ट्रिगर हो जाते हैं.

बेसिकली, मॉडर्न कंडीशन में हमारा ब्रेन इंस्टेंट ग्रैटिफिकेशन को लूप करता है. जिसमें अगर ब्लू टिक अपीयर होता है और उसके बाद साइलेंस आ जाता है, तो हम यह सोचते हैं कि सामने वाला शायद हमारे साथ विड्रॉल कर रहा है.

एक्चुअली में रीड रिसीट या इंस्टेंट क्लैरिटी आज के डिजिटल हाइपरविजिलेंस वर्ल्ड में इमोशनल इमरजेंसी का काम कर रही है. हम एक डिजिटल हाइपरविजिलेंस वर्ल्ड में हैं, जहां पर हम हर वक्त चाहते हैं कि सामने वाले ने पढ़ा और हमें जवाब दे और फिर वो हमें क्लेरिफाई करे.

रिलेशनशिप बना डिजिटल कोर्ट रूम

रिलेशनशिप एक्सपर्ट काउंसलर निशा खन्ना कहती हैं हम मोस्ट ऑफ़ द टाइम माइंड रीडिंग और प्रोजेक्शन, ये दो चीज़ों पर काम करते हैं. हम सोचना शुरू कर देते हैं कि सामने वाला मुझमें इंटरेस्ट नहीं दे रहा या वो मुझे इग्नोर कर रहा है या मुझसे बात नहीं करना चाहता.
रिश्तों में हम डिजिटल सर्विलांस कर रहे हैं रिलेशनशिप में, हम लास्ट सीन देख रहे हैं, सामने वाले की पोस्ट रीड कर रहे हैं और डॉट्स कनेक्ट कर रहे हैं, वो टिपिकली एक ट्रिगर का काम करता है.

अब पार्टनरशिप एक्चुअली में डिजिटल कोर्ट रूम के रूप में हो गई है, जहाँ पर डिले मैसेज बेसिकली हम अपने आप में ही एक सिनेरियो बना लेते हैं और उसी पर हम यकीन करना शुरू कर देते हैं.

सॉल्यूशन क्या है?

निशा खन्ना कहती हैं बेसिकली सलूशन ये है कि हम इमोशनल फ़िल्टर को एक साइड पर रखें, अपनी टोन, बॉडी लैंग्वेज और अपनी एंग्जायटी पर काम करें और डिजिटल वर्ल्ड से बाहर आकर सामने एकदूसरे से इमोशनल सेफ्टी के बारे में, अपनी बाउंड्रीज के बारे में बात करें, जिससे कपल में रिलेशनशिप मजबूत होता है.

हो सके तो डिजिटल बाउंड्रीज के नियम बनाएं. किस वक्त आप अपने मोबाइल का इस्तेमाल करेंगे और कितना आप अपनी फीलिंग्स को भी ऑनलाइन पोस्ट करेंगे. डॉ. समीर मल्होत्रा कहते हैं कि जवाब न मिलने पर अपनी इंटरप्रिटेशन को फैक्ट मान लेना सबसे बड़ी परेशानी बन सकता है.

टीनएजर्स में परेशानी ज्यादा?

साल 2023 में जर्नल ऑफ क्लिनिकल चाइल्ड एंड अडोलसेंट साइकोलॉजी में छपी स्टडी व्हाय हैवेंट यू टेक्स्टेड मी बैक? अडोलसेंट्स डिजिटल एंट्रैपमेंट, फ्रेंडशिप कॉन्फ्लिक्ट, एंड परसीव्ड जनरल हेल्थ में अमेरिका के एक स्कूल के 714 टीनएजर्स को शामिल किया गया.

रिसर्च में पाया गया कि 76.3% टीनएजर्स ने डिजिटल एंट्रैपमेंट एक्सपीरियंस यानी दोस्तों के मैसेज का जवाब देने और लगातार ऑनलाइन अवेलेबल रहने का प्रेशर फील किया. यही प्रेशर बाद में फ्रेंडशिप कॉन्फ्लिक्ट और खराब सेल्फरिपोर्टेड हेल्थ से जुड़ा पाया गया.

जवाब कितनी देर में आया, या कैसे आया?

तुरंत रिप्लाई को प्यार, परवाह और अहमियत का पैमाना बना लिया है. लेकिन हर इंसान का जवाब देने का तरीका और समय अलग हो सकता है. इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि उसने कितनी देर बाद जवाब दिया? सवाल ये भी है, जब उसने जवाब दिया, तो क्या उसने आपकी बात को समझा, सम्मान दिया और आपको महत्व दिया?

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संपादकीय टीम

खबर मंकी की अनुभवी एडिटोरियल डेस्क। हमारे लेखक और संपादक दिन-रात निष्पक्ष, सटीक और तीव्र समाचार आप तक पहुँचाने के लिए काम करते हैं।

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