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डबल इनकम, नो किड्स… क्यों बदल रही है मेट्रो कपल्स की सोच और प्लानिंग ?​

सुबह के 8 बजे हैं. दिल्लीNCR की एक सोसाइटी में बाहर पेरेंट्स दौड़ रहे हैं बच्चों का टिफिन बैग लेकर कि बस छूट ना जाए. लेकिन एक घर के अंदर शांति है. न स्कूल बस की जल्दी, न टिफिन पैक करने की भागदौड़, न बच्चे की फीस, कोचिंग और होमवर्क की चिंता. राहुल और रवीना […]

सुबह के 8 बजे हैं. दिल्लीNCR की एक सोसाइटी में बाहर पेरेंट्स दौड़ रहे हैं बच्चों का टिफिन बैग लेकर कि बस छूट ना जाए. लेकिन एक घर के अंदर शांति है. न स्कूल बस की जल्दी, न टिफिन पैक करने की भागदौड़, न बच्चे की फीस, कोचिंग और होमवर्क की चिंता. राहुल और रवीना दोनों ऑफिस जाने की तैयारी कर रहे हैं. कॉफी हाथ में है और नेक्स्ट वेकेशन की प्लानिंग भी चल रही है.

इस कपल की कहानी में एक बात खास है. शादी के पांच साल बाद भी इन्होंने बच्चे की प्लानिंग नहीं की और ना ही आगे कोई इरादा है. यही है DINK यानी डबल इनकम, नो किड्स. मतलब घर में दो कमाने वाले तो हैं लेकिन बच्चे नहीं. ये अब फॉरेन कल्चर या फिल्मी लाइफस्टाइल भर नहीं. दिल्लीNCR, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद और कोलकाता जैसे मेट्रो सिटीज के यंग कपल्स का फैसला है.

कमाई लाखों में तो बच्चे का सवाल क्यों मुश्किल?

हाल ही में गुरुग्राम के एक कपल की कहानी सोशल मीडिया पर वायरल हुई. दोनों ने बताया कि उनकी एनुअल इनकम मिलाकर 36 लाख रुपये है, लेकिन गुरुग्राम में अपनी जरूरत का घर लेना ही महंगा पड़ रहा है. अगर एक अच्छे घर और अपनी जिंदगी का खर्च ही भारी है तो बच्चे के लिए स्पेस और उसकी पढ़ाई का खर्च कैसे उठाएंगे?

हर महीने स्कूल की फीस ही 3540 हजार रुपये एक फाइनेंशियल रिस्पॉन्सिबिलिटी है. बात सिर्फ बच्चा पालने के लिए पैसा होने या ना होने की नहीं है. महानगरों की लाइफस्टाइल को दो लोग मिलकर मेंटेन कर पा रहे हैं. अगर घर में तीसरा मेंबर आया तो खर्च, टाइम, करियर और इन सबका बैलेंस कैसे होगा?

स्कूल की फीस से लेकर कोचिंग तक का गणित

बच्चे की परवरिश का खर्च सिर्फ डायपर, दूध और कपड़ा भर नहीं है. सरकार के आंकड़ों के हिसाब से शहरों में प्राइवेट स्कूल का एवरेज खर्च करीब 26,188 रुपये सालाना प्रीप्राइमरी स्तर पर था, जो हायर सेकेंडरी में लगभग 49,075 रुपये तक पहुंच गया. इसके अलावा शहरों में प्राइवेट कोचिंग पर प्रति स्टूडेंट एवरेज सालाना घरेलू खर्च करीब 3,988 रुपये बताया गया है. हायर सेकेंडरी में ये 9,950 रुपये था.

ये नेशनल एवरेज हैं. बड़े शहरों में प्राइवेट स्कूल, डेकेयर, एक्टिविटीज, ट्रांसपोर्ट और कोचिंग पर इससे कहीं ज्यादा खर्च होता है. यहीं DINK कपल्स का प्वाइंट है दो कमाई करने वाले लोग अगर बच्चे की जिम्मेदारी नहीं लेते तो उनकी आय का बड़ा हिस्सा घर, यात्रा, निवेश, शौक और अपनी जिंदगी पर खर्च हो सकता है.

पैसा ही नहीं, टाइम भी बड़ी वजह

जब दोनों पार्टनर काम करते हैं तो कई जॉब प्रोफाइल लॉन्ग वर्किंग ऑवर्स, ट्रैवल, वर्क प्रेशर और फास्ट चेंजिंग रोल्स वाले होते हैं. तो कपल्स खुद से और समाज से सवाल करते हैं. जब हम अपनी जिंदगी और करियर के लिए ही पर्याप्त समय नहीं निकाल पा रहे, तो बच्चे को क्वालिटी टाइम कैसे देंगे?

रिलेशनशिप एक्सपर्ट काउंसलर निशा खन्ना कहती हैं, आजकल मैरिज को केवल दो लोगों के रिश्ते के तौर पर नहीं, कोलिविंग, कम्युनिटी और कोलैबोरेशन के तीन प्रिंसिपल पर बेस्ड पार्टनरशिप की तरह देखा जा रहा है.

किसी व्यक्ति का बैकग्राउंड, बचपन के अनुभव और परिवार के साथ उसका रिश्ता भी इस फैसले को प्रभावित कर सकता है. अगर किसी ने अपने परिवार में बच्चों की वजह से संघर्ष देखा हो या मातापिता को व्यस्त रहने की वजह से पर्याप्त समय न दे पाने का अनुभव किया हो तो वह खुद बच्चा न करने का फैसला ले सकता है.

हर DINK कपल ‘चाइल्डफ्री’ नहीं है

कुछ कपल्स जानबूझकर हमेशा बच्चे नहीं चाहते. कुछ फिलहाल बच्चा नहीं चाहते, लेकिन भविष्य में फैसला बदल सकते हैं. और कुछ कपल्स शादी और पैरेंटहुड दोनों को बाद के लिए टाल रहे हैं.

भारत का बदलता फैमिली मैप

भारत में बर्थ रेट भी पिछले कुछ डिकेड्स में बदला है. NFHS5 के आंकड़े बताते हैं कि अर्बन भारत में कुल प्रजनन दर करीब 1.6 थी, जबकि रूरल इंडिया में ये 2.1 थी. यानी शहरों में औसतन महिलाओं के बच्चों की संख्या ग्रामीण इलाकों की तुलना में कम है.

DINK में मिल क्या रहा है?

निशा खन्ना के मुताबिक, कुछ कपल्स बच्चों पर होने वाले खर्च के बजाय अपनी हेल्थ, करियर और फ्यूचर में इनवेस्ट करना पसंद करते हैं. ऐसे कपल्स ट्रैवल, रियल एस्टेट, हाईएंड कार या दूसरी इन्वेस्टमेंट पर ज्यादा खर्च कर सकते हैं.

सोशल मीडिया ने भी इस लाइफस्टाइल को नया नाम और नई पहचान दी है. ट्रैवल, कैफे, पेट्स, लग्जरी और फाइनेंशियल फ्रीडम वाली DINK लाइफ की तस्वीरें युवाओं के बीच तेजी से दिखाई देने लगी हैं. लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है. अगर आने वाले समय में लोग परिवार बढ़ाने के बजाय ज्यादा इंडिविजुअलिस्टिक सोचने लगते हैं तो समाज की संरचना बदल सकती है.

फिर भी इसे सीधे अकेलेपन से जोड़ना सही नहीं होगा. मजबूत दोस्ती, रिश्ते और कम्युनिटी किसी भी व्यक्ति के लिए सपोर्ट सिस्टम बन सकते हैं. आखिर DINK सिर्फ नो किड्स का फैसला नहीं है. ये इस बात का भी फैसला है कि जिंदगी में पैसा, करियर, रिश्ते और आजादी के बीच किस चीज को कितनी प्राथमिकता देनी है.

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संपादकीय टीम

खबर मंकी की अनुभवी एडिटोरियल डेस्क। हमारे लेखक और संपादक दिन-रात निष्पक्ष, सटीक और तीव्र समाचार आप तक पहुँचाने के लिए काम करते हैं।

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