Aviation Sector: अडानी ग्रुप एविएशन सेक्टर में अपना दबदबा बढ़ाने के लिए एक बड़ा कदम उठाने की तैयारी में है. ग्रुप की योजना अपनी खुद की नई एयरलाइन शुरू करने की है. लेकिन भारत सरकार फिलहाल इस प्रस्ताव पर बहुत फूंकफूंक कर कदम रख रही है. नागरिक उड्डयन मंत्री राम मोहन नायडू ने मंगलवार को एक कार्यक्रम के दौरान साफ किया कि सरकार अडानी ग्रुप को एयरलाइन शुरू करने की इजाजत देने पर विचार तो कर रही है, लेकिन क्रॉसओनरशिप से जुड़े मामलों पर सतर्कता बरती जा रही है.

सरकार भी चाहती है कि देश के एविएशन मार्केट में इंडिगो के साथ एयर इंडिया का एकाधिकार खत्म हो. इसके लिए बाजार में नई एयरलाइंस का आना जरूरी है. लेकिन जब कोई एयरपोर्ट का संचालन करने वाली कंपनी अपनी खुद की एयरलाइन शुरू करना चाहती है, तो वहां हितों के टकराव का बड़ा खतरा पैदा हो जाता है.
अडानी ग्रुप की क्या है खास मांग
अडानी ग्रुप की कंपनी अडानी एयरपोर्ट्स के पास मुंबई एयरपोर्ट की 74 फीसदी हिस्सेदारी है. ग्रुप की एक अन्य फर्म अडानी डिफेंस एयरोस्पेस एविएशन सेक्टर में अपना दायरा बढ़ाने के लिए एयरलाइन बिजनेस में उतरना चाहती है. इसके लिए इसी साल जून के महीने में ग्रुप ने सरकार को एक खास पत्र लिखा था. इस पत्र में मांग की गई थी कि दिल्ली मुंबई एयरपोर्ट के ऑपरेटर को किसी भी एयरलाइन में 10 फीसदी से ज्यादा हिस्सेदारी रखने से रोकने वाले पुराने नियम को हटाया जाए. अडानी एयरपोर्ट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अरुण बंसल ने 4 जून को लिखे इस खत में कहा था कि नई एयरलाइन शुरू करना उनके मौजूदा बिजनेस का एक स्वाभाविक विस्तार है.
हितों का टकराव कैसे बन रहा अड़चन
साल 2006 में जब दिल्ली मुंबई एयरपोर्ट का निजीकरण किया गया था, तब समझौते के अंदर क्रॉसओनरशिप को रोकने वाला ये सख्त नियम जोड़ा गया था. इस नियम में किसी भी तरह के बदलाव के लिए केंद्रीय कैबिनेट की अंतिम मंजूरी जरूरी होगी. कई सरकारी अधिकारियों का मानना है कि इस नियम को हटाने से ऐसा संदेश जा सकता है कि किसी एक खास कंपनी को फायदा पहुंचाया जा रहा है. इससे ये पूरा मामला कड़ी जांच के दायरे में आ सकता है.
मंत्री राम मोहन नायडू ने कहा कि जब कोई एयरपोर्ट ऑपरेटर एयरलाइन चलाना चाहता है, तो हमें उसके होने वाले नुकसान का भी सही से आकलन करना होता है. हमें एक ऐसा सिस्टम तैयार करना होगा जो इन तमाम चिंताओं को दूर कर सके. एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने बताया कि एयरपोर्ट एक तरह से प्राकृतिक मोनोपोली होते हैं, क्योंकि वे किसी भी शहर का इकलौता एंट्री पॉइंट होते हैं. ऐसे में देश के सबसे बड़े एयरपोर्ट्स को चलाने वाली किसी कंपनी को अपनी एयरलाइन शुरू करने की इजाजत देने पर बहुत सोचसमझकर फैसला लेना होगा.
दूसरी एयरलाइंस का कड़ा ऐतराज
भारत की मौजूदा एयरलाइंस अडानी ग्रुप को इस नियम में किसी भी तरह की ढील दिए जाने के सख्त खिलाफ हैं. देश की सबसे बड़ी एयरलाइन इंडिगो के मैनेजिंग डायरेक्टर राहुल भाटिया ने हाल ही में कहा था कि क्रॉसओनरशिप की इजाजत देने से हितों का भारी टकराव पैदा होगा. उनका मानना है कि लंबी अवधि में ये कदम सीधे तौर पर ग्राहकों के लिए बहुत नुकसानदायक साबित हो सकता है.
ध्यान देने वाली बात ये है कि इससे पहले साल 2019 में टाटा ग्रुप ने भी जीएमआर एयरपोर्ट्स में 8,000 करोड़ रुपये के निवेश का प्रस्ताव रखा था. उस समय जीएमआर ग्रुप दिल्ली हैदराबाद एयरपोर्ट का संचालन करता था. लेकिन तब सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के कड़े विरोध के बाद टाटा के उस प्रस्ताव को खारिज कर दिया गया था.
क्षेत्रीय उड़ानों पर सरकार का पूरा फोकस
राम मोहन नायडू ने अपने बयान में जोर देकर कहा कि भारत को और ज्यादा एयरलाइंस की बहुत जरूरत है. उन्होंने उड़ान योजना का जिक्र किया, जिसका मकसद दूरदराज के इलाकों में हवाई सफर को सस्ता बनाना है. ये योजना नए उद्यमियों को क्षेत्रीय एयरलाइन शुरू करने के लिए प्रेरित कर रही है. मंत्री ने कहा कि सरकार चाहती है कि देश में कम से कम पांच ऐसी एयरलाइंस काम करें, जिनमें से हर एक के पास 100 विमान हों.
साल 2017 में लॉन्च हुई उड़ान योजना का लक्ष्य दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते एविएशन मार्केट में आम लोगों तक हवाई सफर पहुंचाना था. इसके दूसरे चरण के लिए सरकार ने बजट को छह गुना बढ़ाकर 28,840 करोड़ रुपये कर दिया है. इसके तहत नए एयरपोर्ट्स का चुनाव ‘चैलेंज मोड’ के जरिए बहुत सख्त मानकों के आधार पर किया जाएगा. इसमें पर्यटन स्थलों से दूरी, रनवे टर्मिनल का इंफ्रास्ट्रक्चर राज्य सरकारों की वित्तीय प्रतिबद्धता जैसे कई अहम फैक्टर्स की जांच की जाएगी.