ईरान जंग को लेकर अमेरिका में कानूनी पेंच फंसता दिख रहा है. अमेरिका के वॉर पावर्स एक्ट के मुताबिक, राष्ट्रपति को 60 दिनों के अंदर कांग्रेस से युद्ध की मंजूरी लेनी होती है, नहीं तो उसे सैन्य कार्रवाई खत्म करनी पड़ती है संसद की मंजूरी के बिना राष्ट्रपति सिर्फ 60 दिन ही सेना का इस्तेमाल कर सकते हैं. 2 मार्च को ट्रंप ने संसद को ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की जानकारी दी थी, इसलिए जंग जारी रखने के लिए 1 मई ट्रंप प्रशासन को संसद से मंजूरी लेनी थी. हालांकि ट्रंप सरकार ने संसद में मंजूरी के लिए प्रस्ताव पेश करने से मना कर दिया है. इसके पीछे दलील दी है कि अमेरिका, ईरान के साथ युद्ध में नहीं है.

अमेरिकी प्रतिनिधि सभा के स्पीकर माइक जॉनसन ने कहा कि अभी कोई सक्रिय युद्ध नहीं चल रहा है. उनके मुताबिक न बमबारी हो रही है और न ही फायरिंग, बल्कि अमेरिका शांति की कोशिश कर रहा है. जॉनसन ने कहा कि ईरान के साथ हुए सीजफायर की वजह से 60 दिन की डेडलाइन रुक गई है. अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने भी यही बात दोहराई. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि इस पर अंतिम फैसला व्हाइट हाउस ही करेगा.
डेमोक्रेटिक पार्टी के नेताओं का विरोध
हालांकि डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता इस बात से सहमत नहीं हैं कि सीजफायर से समय-सीमा रुक सकती है. सीनेटर टिम केन ने कहा कि कानून में ऐसा कोई नियम नहीं है. अब समय-सीमा खत्म होने वाली है, जिससे कानूनी विवाद हो सकता है. सीनेटर एडम शिफ ने भी कहा कि दो महीने के युद्ध में 13 अमेरिकी सैनिकों की मौत हो चुकी है और अरबों डॉलर खर्च हो गए हैं, इसलिए अब इस युद्ध को खत्म करना चाहिए.
आगे क्या होगा, यह साफ नहीं है. अगर कांग्रेस कोई प्रस्ताव लाती भी है, तो उसे मंजूरी मिलना मुश्किल है और राष्ट्रपति उसे खारिज भी कर सकते हैं. इसलिए यह मामला अब बड़ा कानूनी विवाद बन गया है. कहा जा रहा है कि जंग जारी रखने के लिए प्रशासन ने प्रस्ताव इसलिए भी नहीं पेश किया, क्योंकि प्रस्ताव खारिज होने का डर था.
28 फरवरी को शुरु हुआ था युद्ध
पूरा मामला 28 फरवरी से शुरू हुआ था, जब अमेरिका और इजराइल ने मिलकर ईरान के तेहरान और अन्य शहरों पर हमला किया. अमेरिका ने इसे सैन्य कार्रवाई कहा था. इन हमलों में ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई, कई सैन्य अधिकारी और आम लोग मारे गए.
इसके बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए इजराइल और खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी ठिकानों पर हमले किए. ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट को भी बंद कर दिया, जो दुनिया के तेल सप्लाई का बड़ा रास्ता है. इससे तेल की कीमतें बढ़ गईं और वैश्विक बाजार पर असर पड़ा.





