व्यापार की दुनिया में अक्सर उन्हीं लोगों का बोलबाला माना जाता है जो बड़ीबड़ी डिग्रियां लेकर आते हैं या जिनके पास पुश्तैनी पैसा होता है. लेकिन, जब कोई इंसान अपनी मेहनत और लगन से हजारों करोड़ का साम्राज्य खड़ा कर दे, तो वह कहानी हर किसी के लिए एक मिसाल बन जाती है. ये कहानी ललिता ज्वेलरी के मालिक किरण कुमार की है. एक ऐसा बच्चा जिसे बचपन में ही स्कूल छोड़ना पड़ा, जिसके पास किसी शादी में जाने के लिए ढंग के कपड़े तक नहीं होते थे, आज वह 11,250 करोड़ रुपये के वैल्यूएशन वाली कंपनी का मालिक है.

उनकी कंपनी ‘ललिता ज्वेलरी मार्ट’ शेयर बाजार में अपना आईपीओ लेकर आ रही है. इस आईपीओ का प्राइस बैंड 190 से 201 रुपये प्रति शेयर तय किया गया है. येआईपीओ कुल ₹1,700 करोड़ का है. इसमें ₹1,200 करोड़ के नए शेयर जारी किए जाएंगे, जबकि ₹500 करोड़ का ऑफर फॉर सेल होगा. OFS के तहत कंपनी के प्रमोटर और फाउंडर किरण कुमार जैन अपनी हिस्सेदारी बेचेंगे. कंपनी आईपीओ से मिलने वाली नई कैपिटल में से ₹1,033.2 करोड़ का इस्तेमाल दक्षिण भारत में 10 नए स्टोर खोलने के लिए करेगी.
गरीबी का वह दौर जब पहनने को नहीं थे कपड़े
किरण कुमार का जन्म आंध्र प्रदेश के नेल्लोर में एक बड़े और आर्थिक रूप से कमजोर परिवार में हुआ था. वह अपने मातापिता की आठवीं संतान थे. उनके पिता सर्राफा बाजार में कई ज्वेलर्स के यहां एकाउंटेंट का काम करते थे, लेकिन उससे होने वाली कमाई से इतने बड़े परिवार का खर्च चलाना बेहद मुश्किल था. गरीबी का साया उनके जीवन पर इस कदर हावी था कि किरण को किसी करीबी की शादी में जाने के लिए अपने दोस्त की टीशर्ट तक उधार लेनी पड़ी थी. घर की माली हालत खराब होने के कारण उन्हें पांचवीं कक्षा के बाद ही अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी. महज 12 साल की छोटी सी उम्र में किरण ने नेल्लोर के आभूषण बाजार में काम करना शुरू कर दिया, ताकि परिवार की कुछ मदद हो सके.
मां की चार चूड़ियों ने रखी बिजनेस की नींव
बाजार में काम करते हुए किरण ने एक बहुत अहम बात नोटिस की. उन्होंने देखा कि नेल्लोर में जो गहने बनाए जा रहे हैं, वे चेन्नई और हैदराबाद जैसे बड़े शहरों के बाजारों में सप्लाई किए जाते हैं. उनके मन में विचार आया कि अगर वह खुद अपना माल सीधे चेन्नई जाकर बेचें, तो उन्हें ज्यादा मुनाफा हो सकता है. लेकिन सबसे बड़ी परेशानी यह थी कि बिजनेस शुरू करने के लिए उनके पास एक भी रुपया नहीं था. ऐसे मुश्किल वक्त में उनकी मां उनके साथ खड़ी हुईं. उनकी मां के पास अपना जो थोड़ा बहुत सोना था, उसमें से उन्होंने चार चूड़ियां किरण को दे दीं. इन चूड़ियों का वजन लगभग 48 ग्राम था. किरण ने इन चूड़ियों को एक सुनार के पास ले जाकर उनसे छह बालियां बनवाईं और खरीदार की तलाश में सीधे चेन्नई का रुख किया.
चेन्नई के टी नगर में उनकी मुलाकात ‘ललिता ज्वेलरी’ के तत्कालीन मालिक एम. एस. कंदासामी पिल्लई से हुई. जब किरण वहां पहुंचे, तब रात हो चुकी थी और दुकान बंद होने वाली थी. पिल्लई ने किरण के लाए गहनों की क्वालिटी जांची और उन्हें शुरुआत में 100 ग्राम का पहला ऑर्डर दे दिया. काम अच्छा था, इसलिए जल्द ही यह ऑर्डर बढ़कर 200 ग्राम हो गया. इसके बाद किरण सरकारी बसों में धक्के खाते हुए नेल्लोर से चेन्नई के बीच व्यापार करने लगे. उनकी मेहनत रंग लाई और धीरेधीरे उनका थोक कारोबार इतना बड़ा हो गया कि वे कनाडा, लंदन, सिंगापुर और दुबई जैसे अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक अपने गहने भेजने लगे.
एक फैसला जिसने बदल दी पूरी जिंदगी
किरण के जीवन और बिजनेस का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट 24 फरवरी 1999 को आया. यह वह समय था जब ‘ललिता ज्वेलरी’ के मालिक कंदासामी पिल्लई भारी कर्ज में डूब चुके थे और आर्थिक तंगी से गुजर रहे थे. किरण के पिल्लई के साथ अच्छे व्यापारिक संबंध थे. ऐसे में पुरानी और स्थापित दुकान को बंद होने से बचाने के लिए किरण ने एक बड़ा कदम उठाया. उन्होंने उस बिजनेस को टेकओवर कर लिया और उसकी सारी पुरानी देनदारियां भी चुका दीं. इसके बाद उन्होंने कंपनी के नाम में एक और ‘a’ जोड़कर ‘ललिता ज्वेलरी’ नाम से ब्रांड की शुरुआत की.
ग्राहकों का दिल जीत खडा कर दिया साम्राज्य
दुकान खरीदने के बाद किरण को एक नई चुनौती का सामना करना पड़ा. अब तक उनका सारा अनुभव थोक बाजार का था, लेकिन अब उन्हें सीधे खुदरा बाजार में ग्राहकों से डील करना था. किरण ने बाजार की नस को पकड़ा. उन्होंने महसूस किया कि गहने खरीदते समय मेकिंग चार्ज और वेस्टेज के नाम पर ग्राहकों को बहुत लूटा जाता है और उन्हें गहने की असली कीमत का अंदाजा ही नहीं लग पाता.
उन्होंने पारदर्शी कीमत और बीआईएसहॉलमार्क वाले सोने पर अपना पूरा फोकस रखा. उनकी रणनीति बिल्कुल साफ थी एक ग्राहक से ज्यादा मुनाफा कमाने के बजाय, कम मार्जिन रखकर ज्यादा से ज्यादा ग्राहकों को जोड़ना. उन्होंने मार्केटिंग में भी एक बड़ा दांव खेला. उनके विज्ञापनों में ग्राहकों से खुलेआम कहा जाता था कि वे गहनों की फोटो खींचें, दूसरे शोरूम से कीमत का अंदाजा लें और अगर ललिता ज्वेलरी का दाम सबसे कम लगे, तभी यहां से खरीदारी करें. इस ईमानदारी ने ग्राहकों का भरोसा जीत लिया.
5 राज्यों में 51 शहरों के अंदर 61 शोरूम
किरण कुमार की वह रणनीति आज एक विशाल बिजनेस बन चुकी है. वर्तमान में ललिता ज्वेलरी दक्षिण भारत के पांच राज्यों में 51 शहरों के अंदर 61 शोरूम का संचालन कर रही है. इनमें से आंध्र प्रदेश में 23, तमिलनाडु में 20, तेलंगाना में 10, कर्नाटक में 7 और पुडुचेरी में 1 स्टोर मौजूद है. इसके अलावा तमिलनाडु में उनकी अपनी मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी भी है.
कंपनी की कमाई के आंकड़े किसी को भी हैरान कर सकते हैं. वित्त वर्ष 2024 में कंपनी का रेवेन्यू 16,800.62 करोड़ रुपये था, जो वित्त वर्ष 2025 में 16,907.88 करोड़ रुपये रहा. वहीं वित्त वर्ष 2026 में यह तेजी से उछलकर 25,039.80 करोड़ रुपये हो गया. कंपनी का मुनाफा भी वित्त वर्ष 2024 के 359.83 करोड़ रुपये से बढ़कर वित्त वर्ष 2026 में 1,009.82 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है. कंपनी की कुल संपत्ति भी 5,182.26 करोड़ रुपये से बढ़कर अब 10,945.14 करोड़ रुपये हो गई है.
आईपीओ के दस्तावेजों में शामिल क्रिसिल की एक रिपोर्ट के अनुसार, ललिता ज्वेलरी वित्त वर्ष 2022 से 2024 के बीच ऑपरेटिंग रेवेन्यू ग्रोथ के मामले में दूसरी सबसे तेजी से बढ़ने वाली क्षेत्रीय ज्वेलरी कंपनी रही है.