बुधवार, 14 अक्टूबर 2026 ब्रेकिंग
उत्तर प्रदेश में 3 महीने में पंचायत चुनाव, हाई कोर्ट के आदेश पर क्या बोले ओम प्रकाश राजभर​ | सिर कटा शव, DNA सबूत और उम्रकैद… भागलपुर के रेणु देवी हत्याकांड में 2 साल बाद आया फैसला​ | ‘UP फतह’ का मास्टर प्लान! चुनाव से पहले मैदान में उतरेंगे PM मोदी, BJP ने बनाई उद्घाटन और रैलियों की रणनीति​
दिल्ली 32°C ☀️ |
728 x 90 Advertisement
विज्ञापन
728 x 90 Advertisement
Viral

2027 की चुनौती…पहले रायबरेली में अखिलेश तो अब अमेठी में बीजेपी की दस्तक; निशाने पर गांधी परिवार​

गांधी परिवार के कहे जाने वाले दो गढ़. सहयोगी सपा और विरोधी भाजपा के दो राजनीतिक आयोजन. दोनों की मुहिम 2027 के उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव. पहले अखिलेश यादव ने रायबरेली में ताकत दिखाई, फिर भाजपा ने अमेठी में सपा के तीन विधायकों के पार्टी में प्रवेश के मौके पर अपने नेताओं, मंत्रियों और […]

गांधी परिवार के कहे जाने वाले दो गढ़. सहयोगी सपा और विरोधी भाजपा के दो राजनीतिक आयोजन. दोनों की मुहिम 2027 के उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव. पहले अखिलेश यादव ने रायबरेली में ताकत दिखाई, फिर भाजपा ने अमेठी में सपा के तीन विधायकों के पार्टी में प्रवेश के मौके पर अपने नेताओं, मंत्रियों और भीड़ का बड़ा जमावड़ा किया.

दोनों क्षेत्रों की राजनीतिक चर्चा के केंद्र में गांधी परिवार है, लेकिन दिलचस्प यह कि इलाके में विधानसभा की जमीन पर कांग्रेस का कोई विधायक नहीं है. भाजपा को इन क्षेत्रों में अपनी राजनीतिक ताकत बढ़ाने की फिक्र है, तो इंडिया गठबंधन में रहने के बाद भी सपा, सहयोगी दल कांग्रेस को विधानसभा चुनाव में कोई रियायत देने को तैयार नहीं है.

2024 की अमेठी की हार का हिसाब चुकता करने की तैयारी

अखिलेश यादव ने 25 सितंबर को रायबरेली से समाजवादी पार्टी के चुनावी अभियान का आगाज किया था. 14 अक्टूबर को भाजपा ने अमेठी में जोरदार शक्ति प्रदर्शन किया. मौका सपा के तीन बागी विधायकों राकेश प्रताप सिंह , अभय सिंह और विनोद चतुर्वेदी को पार्टी में शामिल करने का था. राष्ट्रीय महामंत्री स्मृति ईरानी, प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी और राज्य सरकार के कई मंत्रियों और पार्टी नेताओं की मौजूदगी ने इस आयोजन का राजनीतिक महत्व बढ़ा दिया.

कांग्रेस के लिए भाजपा का संदेश था कि लोकसभा चुनाव में स्मृति ईरानी की हार के बावजूद अमेठी उसके एजेंडे से बाहर नहीं हुआ है. सपा के असंतुष्टों को पाले में करके मनोवैज्ञानिक बढ़त बनाने और भीड़ के जरिए प्रभाव प्रदर्शित करने के लिए भी भाजपा ने पूरा जोर लगाया.

विधानसभा चुनाव में कांग्रेस फिसड्डी

अमेठी और रायबरेली का राजनीतिक महत्व गांधी परिवार से उनके पुराने जुड़ाव के कारण बना रहता है. दोनों क्षेत्रों पर मीडिया की निगाह रहती है. राजनीति के जानकारों की यहां की हलचल में दिलचस्पी रहती है. कांग्रेस के लिए ये क्षेत्र खास मायने रखते हैं, तो भाजपा के लिए गांधी परिवार को चुनौती देने का मंच.

सपा गठबंधन में रहते हुए भी यहां अपनी ताकत और विधानसभा की सीटों पर दावेदारी जताने का अवसर नहीं छोड़ती. लोकसभा चुनाव में सपा इन दोनों सीटों पर उम्मीदवार नहीं उतारती. साल 2024 में भी इस रणनीति ने राहुल गांधी और किशोरी लाल शर्मा की जीत का रास्ता आसान किया, लेकिन विधानसभा चुनाव में सपा कांग्रेस के लिए ऐसी रियायत नहीं करती.

यहां सीटों का सवाल सीधे जीतने की क्षमता से जुड़ता है. 2022 के विधानसभा चुनाव में रायबरेली संसदीय क्षेत्र की पांच में चार विधानसभा सीटें सपा ने जीतीं थीं. भाजपा को एक पर सफलता मिली थी. अमेठी की पांच में तीन पर भाजपा और दो पर सपा ने जीत दर्ज की थी. इन दस सीटों में अमेठी के अंतर्गत आने वाली इकलौती सीट जगदीशपुर में कांग्रेस दूसरे स्थान पर पहुंच सकी थी. ऊंचाहार से सपा टिकट पर जीते मनोज पांडे और गौरीगंज के राकेश प्रताप सिंह के भाजपा में शामिल हो जाने के बाद फिलहाल भाजपा का पलड़ा भारी है.

अगली चुनौती के लिए भाजपा की तैयारी

साल 2024 के लोकसभा चुनाव में हार के बाद अमेठी में स्मृति ईरानी की राजनीतिक सक्रियता सीमित रही. गांधी परिवार के भरोसेमंद किशोरी लाल शर्मा ने उन्हें पराजित किया था, लेकिन स्मृति को हाल ही में भाजपा का राष्ट्रीय महामंत्री बनाए जाने और दो राज्यों का प्रभार मिलने के बाद अमेठी के भाजपाइयों में उत्साह बढ़ा है. पार्टी का स्थानीय संगठन भी इसे नए अवसर के रूप में देख रहा है. कोशिश लोकसभा की हार के बाद अमेठी पर राजनीतिक पकड़ फिर मजबूत करने की है.

स्मृति ईरानी 2014 से अमेठी में सक्रिय हैं. जीत हो या हार, पार्टी उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपती रही है. उनके जरिए भाजपा नेतृत्व अमेठी को लगातार तरजीह देता रहा है. इस बार भी उनका स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच पहुंचना महज औपचारिकता नहीं था. प्रदेश अध्यक्ष और मंत्रियों की मौजूदगी ने इसे संगठनात्मक शक्ति प्रदर्शन का रूप दिया. भाजपा यह दिखाना चाहती है कि लोकसभा का परिणाम विधानसभा चुनाव की संभावनाओं पर अंतिम मुहर नहीं है.

स्मृति ने फिर साधा राहुल पर निशाना

स्मृति ईरानी ने गौरीगंज, अमेठी के मंच से एक बार फिर वहां से जुड़े रहने का संदेश दिया. उनके स्थानीय निवास को फिर से संवारा जा रहा है. उसे माधव भवन नाम दिया गया है. उन्होंने दोहराया कि भले ही 2024 के नतीजे खिलाफ रहें हो, लेकिन अमेठी उनका घर है और वो यहां के लोगों को कभी नहीं छोड़ेंगी. उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान गौरीगंज और पूरे अमेठी क्षेत्र में कराए गए मेडिकल कॉलेज, पक्के मकान, सड़कों और प्रशासनिक भवनों जैसे कामों की याद दिलाई.

राहुल गांधी पर हमेशा की तरह निशाना साधा और कहा ‘कुछ लोग यहां चुनाव के समय आते हैं, बड़ेबड़े नारे गढ़ते हैं और फिर गायब हो जाते हैं. अमेठी कभी किसी की जागीर नहीं थी और न रहेगी. यह सेवा का क्षेत्र है. जो लोग देश की संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल उठाते हैं और हार का ठीकरा दूसरों पर फोड़ते हैं, आज जनता ने उन्हें और उनके गठबंधन को सपा के तीन विधायकों के भाजपा में शामिल होने से करारा जवाब दिया है’.

कांग्रेस की मुश्किल: सपा भी मुकाबले में

दिलचस्प है कि गांधी परिवार के इन क्षेत्रों में अपनी ताकत दिखाने की पहल भाजपा से पहले कांग्रेस की सहयोगी सपा ने की. अखिलेश यादव ने 25 सितंबर को रायबरेली में बड़ी भीड़ जुटाकर चुनावी अभियान की शुरुआत की. इसे महज संयोग मानना मुश्किल है. रायबरेली राहुल गांधी का निर्वाचन क्षेत्र है. 2024 के लोकसभा चुनाव में उनकी जीत में सपा के संगठन और समर्थकों की भूमिका महत्वपूर्ण रही थी. अखिलेश ने इसी मदद की ओर इशारा किया.

गठबंधन में सीटों की हिस्सेदारी का सवाल है. कांग्रेस की प्रदेश में करीब 150 सीटों की दावेदारी की चर्चा है. ऐसे में रायबरेली से अखिलेश का शक्ति प्रदर्शन सपा की अपनी ताकत का प्रदर्शन भी था. संदेश यह था कि गठबंधन में सीटों का बंटवारा केवल कांग्रेस के कद या उसकी मांग के आधार पर नहीं हो सकता. जमीनी संगठन और जीतने की क्षमता भी कसौटी होंगे. रायबरेली में अखिलेश का गठबंधन को मजबूत बताते हुए जीत की संभावना को सीट निर्धारण में अहम बताना इसी रणनीति का संकेत था.

अब अमेठी में भाजपा का आयोजन इसी सियासी हलचल के बीच हुआ. एक तरफ अखिलेश ने कांग्रेस को उसके गढ़ में सपा की ताकत याद दिलाई, तो दूसरी तरफ भाजपा ने दलबदल और संगठनात्मक जमावड़े के जरिए अपनी तैयारी दिखाई. दोनों आयोजनों का संदर्भ अलग है, लेकिन दोनों के केंद्र में 2027 की विधानसभा लड़ाई और गांधी परिवार से जुड़े इन क्षेत्रों का राजनीतिक महत्व है.

लोकसभा का करिश्मा, विधानसभा की अलग जमीन

साल 2024 में स्मृति ईरानी की हार ने अमेठी में भाजपा के सामने सवाल खड़े किए थे. गांधी परिवार के पारंपरिक क्षेत्र में पार्टी ने वर्षों की मेहनत के बाद 2019 में जीत दर्ज की थी, लेकिन अगले लोकसभा चुनाव में उसे निराशा हाथ लगी, लेकिन भाजपा फिर से तैयारी में है. स्मृति ईरानी को पार्टी में बड़ी जिम्मेदारी देकर उनकी अहमियत को कायम रखा गया है. अमेठी की गौरीगंज विधानसभा सीट पर सपा के टिकट पर तीन बार से जीत रहे राकेश प्रताप सिंह को पाले में करके स्थानीय स्तर पर नेतृत्व को मजबूत करने की कोशिश की है. स्मृति की सक्रियता ने भी कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाया है.

दूसरी तरफ कांग्रेस के लिए किशोरी लाल शर्मा की जीत के बाद भी चुनौतियां बरकरार हैं. विधानसभा चुनाव में उसे सपा का सहयोग नहीं बल्कि मुकाबला करना होता है. लोकसभा चुनाव में गांधी परिवार के नाम पर मिले समर्थन को पार्टी विधानसभा चुनाव में कायम नहीं रख पाती. सिर्फ 2022 के विधानसभा चुनाव ही नहीं, उसके पूर्व के चुनावों में भी रायबरेली और अमेठी की सीटों पर कांग्रेस को लगातार इस संकट का सामना करना पड़ा है. इसकी एक बड़ी वजह 1989 से प्रदेश की सत्ता से पार्टी का वनवास है. साथ ही राहुल गांधी और परिवार के अन्य सदस्यों की सिर्फ चुनावों के समय इन क्षेत्रों में सक्रियता ने भी पार्टी के आधार और संगठन को कमजोर किया है.

भाजपा के सामने 2027 की चुनौती

उत्तर प्रदेश में लगातार तीसरी बार सरकार की दावेदार भाजपा 2027 के लिए कोई कसर छोड़ना नहीं चाहती. उसका मुख्य मुक़ाबला सपा से है, लेकिन दिल्ली में केंद्र सरकार पर हमलावर राहुल गांधी की अमेठीरायबरेली में बचीखुची राजनीतिक जमीन पर भी भाजपा की नजर है. साल 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 39.67 प्रतिशत वोट के साथ विधानसभा की 312 सीटें जीती थीं. फिर साल 2022 में उसका वोट प्रतिशत बढ़कर 41.29 हो गया, लेकिन सीटें घटकर 255 रह गईं यानी वोट बढ़ने के बावजूद सीटों की संख्या कम हुई.

लोकसभा चुनावों के आंकड़े भी यही अंतर दिखाते हैं. साल 2014 में भाजपा ने उत्तर प्रदेश की 80 में से 71 सीटें जीती थीं और उसका वोट प्रतिशत 42.63 था. साल 2019 में वोट प्रतिशत बढ़कर लगभग 49.6 हुआ, लेकिन सीटें घटकर 62 रह गईं. 2024 में वोट प्रतिशत लगभग 41.4 रहा और पार्टी की सीटें घटकर 33 पर आ गईं.

लोकसभा और विधानसभा चुनावों के मुद्दे अलग होते हैं. फिर भी ये आंकड़े भाजपा के सामने मौजूद चुनौती का एक पहलू उजागर करते हैं. पार्टी ने पिछले कई महीनों से संगठन और सरकार के स्तर पर जमीनी सक्रियता और तेज की है. अमेठी का शक्ति प्रदर्शन इसी व्यापक तैयारी का हिस्सा था. इसके जरिए भाजपा ने सपा को चुनौती दी. विपक्षी खेमे से आए विधायकों को अपने साथ खड़ा किया और गांधी परिवार से जुड़े क्षेत्र में अपनी जोरदार राजनीतिक मौजूदगी फिर दर्ज कराई.

विज्ञापन
728 x 90 Advertisement
शेयर करें:
Author Bio Pic

संपादकीय टीम

खबर मंकी की अनुभवी एडिटोरियल डेस्क। हमारे लेखक और संपादक दिन-रात निष्पक्ष, सटीक और तीव्र समाचार आप तक पहुँचाने के लिए काम करते हैं।

🐒 KHABAR MONKEY