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हवाई टिकटों की ‘डायनेमिक प्राइसिंग’ पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, यात्रियों को मिल सकती है राहत|​

हवाई यात्रा करने वाले आम यात्रियों के लिए अब राहत की एक बड़ी उम्मीद जगी है। त्योहारों, छुट्टियों और आपातकालीन स्थितियों के दौरान विमानन कंपनियों द्वारा वसूले जाने वाले मनमाने किराए के खिलाफ मामला अब देश की सर्वोच्च अदालत, यानी सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। एयरलाइंस द्वारा अपनाई जा रही ‘डायनेमिक प्राइसिंग’ की व्यवस्था […]

हवाई यात्रा करने वाले आम यात्रियों के लिए अब राहत की एक बड़ी उम्मीद जगी है। त्योहारों, छुट्टियों और आपातकालीन स्थितियों के दौरान विमानन कंपनियों द्वारा वसूले जाने वाले मनमाने किराए के खिलाफ मामला अब देश की सर्वोच्च अदालत, यानी सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। एयरलाइंस द्वारा अपनाई जा रही ‘डायनेमिक प्राइसिंग’ की व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए दायर की गई एक जनहित याचिका पर सुनवाई की जा रही है। इस याचिका में आरोप लगाया गया है कि निजी एयरलाइंस बिना किसी पर्याप्त नियमन के एल्गोरिदम आधारित इस तकनीक का इस्तेमाल करके यात्रियों से अत्यधिक किराया वसूल रही हैं, जिससे आम उपभोक्ता का हित सीधा प्रभावित हो रहा है।

सुप्रीम कोर्ट में यह जनहित याचिका एस. लक्ष्मीनारायणन द्वारा दायर की गई है, जो ‘एस. लक्ष्मीनारायणन बनाम भारत संघ’ मामले के रूप में सूचीबद्ध है। याचिका में स्पष्ट किया गया है कि वर्तमान में विमानन कंपनियों के लिए किराए निर्धारण और अतिरिक्त शुल्क वसूलने को लेकर कोई ठोस दिशानिर्देश नहीं हैं। डायनेमिक प्राइसिंग एक ऐसी रणनीति है, जिसके तहत विमानन कंपनियां वास्तविक समय के डेटा और बाजार की मांग के आधार पर टिकटों की कीमतें लगातार बदलती रहती हैं। यदि किसी विशेष मार्ग पर यात्रियों की संख्या बढ़ती है या किसी सीट की मांग अधिक होती है, तो एल्गोरिदम स्वतः ही कीमतें कई गुना बढ़ा देता है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि यह प्रक्रिया पूरी तरह अपारदर्शी है और इसमें उपभोक्ता अधिकारों का ध्यान नहीं रखा गया है।

याचिका में अदालत से कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर हस्तक्षेप की मांग की गई है। इसमें सबसे मुख्य मांग एल्गोरिदम आधारित डायनेमिक प्राइसिंग की निगरानी और नियमन करने की है, ताकि टिकटों के दामों में होने वाली अचानक और भारी बढ़ोतरी को नियंत्रित किया जा सके। साथ ही, एयरलाइंस द्वारा सीट चयन, सामान और प्राथमिकता वाली सेवाओं पर लगाए जाने वाले अतिरिक्त शुल्कों में पारदर्शिता लाने की मांग भी शामिल है। इतना ही नहीं, यात्रियों की शिकायतों के त्वरित समाधान के लिए एक स्वतंत्र ‘विमानन टैरिफ और उपभोक्ता संरक्षण आयोग’ के गठन का सुझाव भी दिया गया है। इसके अलावा, घरेलू उड़ानों में इकोनॉमी क्लास के लिए 25 किलोग्राम मुफ्त चेकइन बैगेज की सुविधा बहाल करने पर भी जोर दिया गया है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में केंद्र सरकार को नई नीति बनाने के निर्देश देता है, तो भारतीय विमानन क्षेत्र में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। इससे न केवल टिकटों की कीमतों में पारदर्शिता आएगी, बल्कि अचानक होने वाली बेतहाशा किराया वृद्धि पर भी अंकुश लग सकेगा। यदि अदालत उपभोक्ता अधिकारों के पक्ष में अपना निर्णय सुनाती है, तो यह देश भर के उन लाखों यात्रियों के लिए एक बड़ी जीत होगी, जो अपनी मजबूरियों के चलते एयरलाइंस के मनमाने शुल्कों का बोझ उठाने को विवश हैं। फिलहाल, पूरे देश की निगाहें सुप्रीम कोर्ट के रुख पर टिकी हैं कि क्या यह नियामक व्यवस्था आम यात्रियों के हितों को सुरक्षित कर पाएगी।

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संपादकीय टीम

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