ब्रिटिश हुकूमत के दौरान देसी राजाओं के शौक और ठाठ निराले थे. यूरोप और लंदन की यात्राओं में वे जो कुछ देखते उसे अपनी रियासतों में नकल की कोशिश करते. बेहिसाब खर्च करते. कभी यह खर्च इतना बढ़ जाता कि रियासत दिवालिया होने की हालत में पहुंच जाती. तब ब्रिटिश रेजिडेंट इसमें हस्तक्षेप करते थे. महाराजा सर किशन सिंह बहादुर के दौर में रेजिडेंट की पहल पर भरतपुर रियासत की शान घुड़सवार रेजिमेंट तोड़ दी गई. महाराजा को गहरा धक्का लगा. बीमार हो गए और जल्द ही उनका निधन हो गया. पढ़िए उनसे जुड़े कुछ दिलचस्प किस्से.

भरतपुर रियासत के राजा खुद को रामचंद्र जी का वंशज मानते थे. महाराजा सर किशन सिंह को रियासत के भीतर उन्नीस तोपों की और बाहर सत्रह तोपों की सलामी दी जाती थी. आजादी के वक्त रियासत की सालाना आमदनी साढ़े सैंतीस लाख रुपए थी. महाराजा अपने मंत्रियों, दरबारियों और सैनिकों की पोशाकों को लेकर काफी शौकीन थे. घोड़ों, बैंड के साथ ही महंगी सजावट और उसका प्रदर्शन उनके मिजाज का हिस्सा था. इस अंधाधुंध खर्च के बीच महराजा रियासत में सार्वजनिक हित के उपायों के विषय में सोच ही नहीं पाते थे. मातहत डरते-डरते कुछ कहते भी तो पैसे की किल्लत के चलते कुछ मुमकिन नहीं हो पाता था.
बकिंघम जैसे खर्च भरतपुर में!
लंदन की यात्रा में महाराजा ने बकिंघम पैलेस में पहरा करते-बदलते सैनिकों और उनकी वर्दियों को देखा. अपने महल में भी उन्होंने ऐसे ही इंतजाम का फैसला किया. अंग्रेज हाकिमों से गुफ्तगू के बाद महाराजा ने अपने अंगरक्षकों के लिए फेल्प्स और रैंकेन कंपनियों के ऐसी ही वर्दियां सिलने का ऑर्डर दिया. इन कम्पनियों ने उनसे उस जमाने में लाखों की रकम हासिल की. फ्रांस, जर्मनी और अन्य यूरोपीय देशों की यात्रा में महाराजा को वहां के सैनिकों की वर्दियां लुभाने लगीं. तुरंत ही वे अपने सैनिकों की वर्दी बदलवा देते थे.
बकिंघम पैलेस.
रिक्शेवालों की वर्दियों पर सोने-चांदी का काम
इन वर्दियों पर खर्च का ये आलम था कि महाराजा किशन सिंह के सजे – धजे रिक्शे खींचने वाले छह सेवकों की वर्दियों पर सोने – चांदी के तारों से कारचोबी और जरी का काम कराया गया. शिमला की मशहूर फेल्प्स एंड कम्पनी ने इसके लिए पचास हजार की रकम वसूली.
गर्मियों में शिमला में इन रिक्शों पर सैर कर महाराजा खूब खुश होते थे. उन्हें अच्छे घोड़ों का भी गहरा शौक था. पसंद आ जाने पर घोड़े की कीमत मायने नहीं रखती थी. इन घोड़ों के लिए बढ़िया चमड़े की जीन और उन पर कीमती धातुओं – रत्नों की सजावट कराई जाती थी. रंग – बिरंगी भड़कीली वर्दी में घुड़सवार अंगरक्षक और बैंड बाजों के जुलूस बीच महाराजा की सवारी के ठाठ निराले होते थे. रियासत की तीन चौथाई आमदनी ओमहाराजा के इन्हीं शौकों में खर्च हो जाती थी.
पेड़ पर जा बैठते महाराजा!
भरतपुर अपने सुंदर महलों और फव्वारों के लिए भी मशहूर रहा है. महाराजा बीच हाल में बैठते थे. भीषण गर्मी के बीच चारों तरफ से चलने वाले फव्वारे बरसात का अहसास देते और पूरा महल ठंडा बना रहता. पटियाला और कपूरथला रियासत में लंबे समय तक मिनिस्टर रहे दीवान जरमनी दास ने देश की अन्य रियासतों में खासा वक्त गुजारा और वहां के राजाओं के नजदीकी संपर्क में रहे.
अपनी किताब महाराजा में उन्होंने लिखा, “महल के चारों तरफ ऊंचे – ऊंचे पेड़ थे. जिनकी छांव में बीच का हॉल धूप से बचा रहता. महाराजा तोते की तरह किसी पेड़ पर जा बैठते थे. खूब ऊंचाई पर दो पेड़ों के बीच पलंग का झूला भी उन्होंने बनवा रखा था. उस पलंग पर लेटे महराजा पेड़ों के शिखर से भी ऊंचे जाती फव्वारों की फुहारों को देखा करते थे.
भरतपुर के महाराजा सर किशन सिंह बहादुर.
देर रात की दावतों में राग-रंग
महाराजा के शौकों की फेहरिस्त लंबी थी. महल की छत अर्ध चंद्राकार घेरे में लाल पत्थर की दो सौ कुर्सियां मेजें सजी थीं. देर रात की यहां होने वाली दावतों को आकाश से झांकता चांद या फिर नक्काशीदार शमादान में जलती मोमबत्तियां रोशनी देती थीं. इन दावतों में कीमती शराब पेश की जाती. मशहूर तवायफें नाचतीं. साल में छः दरबार के मौकों पर मुसाहिबों को तय रंग की पोशाक में शामिल होना पड़ता था. औरतों के लिए भी यही दस्तूर था. राह चलते लोग भी इसकी नकल की कोशिश करते थे. लेकिन महल – दरबार की रौनक से अलग रियासत और रियाया की हालत बदहाल थी. सड़कें सालों से मरम्मत को तरस रहीं थीं. सफाई – पढ़ाई – इलाज – अदालत सहित बुनियादी जरूरतों से जुड़े हर मसले पर पैसे की किल्लत का रोना था.
घुड़सवार रेजिमेंट टूटने का सदमा नहीं हुआ बर्दाश्त
महाराजा के शौक इतने महंगे थे कि रियासत की आमदनी कम पड़ जाती थी. घुड़सवार अंगरक्षकों के अलावा महाराजा ने एक घुड़सवार सेना भी कायम की थी, जो खास मौकों पर शानदार वर्दी,चमचमाते भालों और सोने – चांदी के कामदार बूट पहन महाराजा को सलामी देती थी. रियासत की आमदनी नाकाफी होने पर कर्ज लेना शुरू हुआ.
हालत जब दिवालिया होने तक पहुंची तो ब्रिटिश रेजिडेंट ने हस्तक्षेप किया. रेजिडेंट उन्हें अक्सर फिजूलखर्ची से बचने की नसीहत देता था. महाराजा सुनने को तैयार नहीं थे. वे कहते कि महाराजा ग्वालियर, मैसूर , जोधपुर और जयपुर के पास भी तो शाही घुड़सवार सेना है , उन्हें क्यों नहीं रोकते ? रेजिडेंट उन्हें याद दिलाता कि उन राजाओं की माली हैसियत काफी बेहतर है. महाराजा सर किशन सिंह फिर भी मानने को तैयार नहीं थे. उनके न चाहने पर भी रेजिडेंट ने भरतपुर की घुड़सवार रेजिमेंट खत्म कर दी. महाराज को गहरा धक्का लगा. बीमार हुए और फिर जल्दी ही उनका निधन हो गया.





