रतन टाटा के निधन के बाद उनकी विरासत को लेकर एक बड़ा पेंच सामने आया है. टाटा संस के पूर्व चेयरमैन की वसीयत में दर्ज लगभग 10,000 करोड़ रुपये के शेयरों पर एक सवालिया निशान लग गया है. महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर के 2 सितंबर के एक फैसले ने इस पूरे मामले को सुर्खियों में ला दिया है. विवाद का मुख्य कारण रतन टाटा के पिता नवल टाटा द्वारा शेयरों को लेकर किया गया एक पुराना करार है.

क्या है नवल टाटा की पुरानी शर्त
साल 1989 में नवाजबाई रतन टाटा ट्रस्ट ने नवल टाटा को शेयर ट्रांसफर किए थे. इस ट्रांसफर के दौरान मशहूर कानूनविद् नानी पालखीवाला की सलाह पर कुछ खास शर्तें लगाई गई थीं. शर्त ये थी कि नवल टाटा इन शेयरों को अपने जीवनकाल में किसी बाहरी व्यक्ति को नहीं दे सकते. अगर वह इसे देना चाहें, तो सिर्फ अपनी पत्नी या बच्चों को दे सकते हैं. सबसे अहम बात ये थी कि उनके बच्चों पर भी यही नियम लागू होगा. उन्हें भी ये शेयर अपने परिवार के सदस्यों को ही देने होंगे, किसी तीसरे पक्ष को नहीं. इस कदम का मकसद टाटा संस के शेयरों को टाटा परिवार के पास ही सुरक्षित रखना था.
वसीयत में फंसा ये बड़ा पेंच
दिक्कत तब शुरू हुई जब रतन टाटा ने अपनी वसीयत में टाटा संस की 0.83 प्रतिशत हिस्सेदारी दो चैरिटी संस्थाओं के नाम कर दी. ये दो संस्थाएं रतन टाटा एंडोमेंट ट्रस्ट और रतन टाटा एंडोमेंट फाउंडेशन हैं. टाटा संस में 0.83 प्रतिशत हिस्सेदारी की अनुमानित कीमत 10,000 करोड़ रुपये से भी ज्यादा है. चैरिटी कमिश्नर अमोघ कालोटी के फैसले के अनुसार, अगर रतन टाटा ने शेयरों को बाहरी चैरिटी को देकर पुरानी शर्तों का उल्लंघन किया है, तो NRTT के ट्रस्टी उचित कदम उठा सकते हैं. इससे नवल टाटा की शर्तों के साथ रतन टाटा की वसीयत का सीधा टकराव पैदा हो गया है.
मामला परिवार के भीतर सुलझाने की कोशिश
इस पूरे मामले को सुलझाने के लिए NRTT के ट्रस्टी अब रतन टाटा की वसीयत के एग्जीक्यूटर्स से संपर्क कर सकते हैं. NRTT के ट्रस्टियों में नोएल टाटा, वेणु श्रीनिवासन, विजय सिंह जैसे नाम शामिल हैं. रतन टाटा ने अपनी वसीयत के लिए डारियस खंबाटा, मेहली मिस्त्री, शिरीन जेजीभॉय सहित चार एग्जीक्यूटर्स नियुक्त किए थे. माना जा रहा है कि इस विवाद को कोर्ट में ले जाने के बजाय परिवार के भीतर आपसी बातचीत से सुलझाने की कोशिश की जाएगी.
जानकारों की है ये राय
कानूनी विशेषज्ञों की राय इस मुद्दे पर बंटी हुई है. एक पक्ष का कहना है कि पिता की वसीयत को बेटे की वसीयत तभी बदल सकती है जब पिता ने पूरी संपत्ति बिना किसी शर्त के बेटे के नाम की हो. चूंकि नवल टाटा ने शर्तों को माना था, इसलिए ये शर्तें उनके परिवार पर भी लागू होती हैं. वहीं दूसरी तरफ, रतन टाटा की वसीयत का ड्राफ्ट तैयार करने वाले एक वकील का तर्क है कि वसीयत को चुनौती नहीं दी जा सकती. उनका मानना है कि शेयर पूरी तरह से चैरिटी के लिए दिए गए हैं, किसी बाहरी व्यक्ति को नहीं, इसलिए ये फैसला वैध है.