भारत में सोने के बदले कर्ज लेने का चलन तेजी से बढ़ रहा है. सोने की कीमतों में बढ़ोतरी और आसानी से कर्ज मिलने के कारण बैंक और गैरबैंकिंग वित्तीय कंपनियां इस कारोबार में तेजी से आगे बढ़ रही हैं. लेकिन अब इस तेजी के पीछे छिपे एक दूसरे पहलू पर सवाल उठ रहे हैं. क्या लोग अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए गोल्ड लोन ले रहे हैं या पहले से लिए गए कर्ज की किस्तें चुकाने के लिए अपना सोना गिरवी रख रहे हैं?

कर्ज चुकाने की क्षमता पर सवाल
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, मैक्वेरी ने चिंता जताई है कि गोल्ड लोन की बढ़ती मांग का एक हिस्सा ऐसे ग्राहकों से आ रहा हो सकता है, जो पहले से दूसरे कर्ज चुकाने में परेशानी का सामना कर रहे हैं. बजाज फाइनेंस और पिरामल फाइनेंस ने भी कुछ कर्जदारों की भुगतान क्षमता को लेकर चिंता जताई है.
भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, 31 जुलाई 2026 तक बैंकों का के बदले दिया गया कर्ज सालाना आधार पर 88.1% बढ़कर 5.52 लाख करोड़ रुपये हो गया. एक साल पहले यह बढ़ोतरी 136.4% थी. यानी गोल्ड लोन का कारोबार अब भी तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन इसकी रफ्तार पहले के मुकाबले कुछ धीमी हुई है.
रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, 31 अगस्त 2026 तक बैंकों का लगभग 5.6 लाख करोड़ रुपये था, जबकि NBFC कंपनियों का गोल्ड लोन बढ़कर 3.6 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया. NBFC के गोल्ड लोन में सालाना आधार पर 69% की बढ़ोतरी दर्ज की गई.
पुराने कर्ज चुकाने के लिए लिया जा रहा नया कर्ज
गोल्ड लोन कारोबार को लेकर सबसे बड़ी चिंता उन ग्राहकों की है, जो पहले से कर्ज चुकाने में पीछे चल रहे हैं. पिरामल फाइनेंस के मुताबिक, वित्त वर्ष 202526 में इंडस्ट्री में दिए गए कुल गोल्ड लोन में से 15% से 23% तक ऐसे ग्राहकों को दिए गए, जो कम से कम एक दूसरे कर्ज की किस्त 90 दिनों से ज्यादा समय से नहीं चुका रहे थे. रॉयटर्स के मुताबिक, ऐसे कर्ज की रकम लगभग 4.7 लाख करोड़ रुपये आंकी. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि इतने गोल्ड लोन खराब हो चुके हैं. यह आंकड़ा केवल ऐसे कर्जदारों की स्थिति बताता है, जिन पर पहले से भुगतान का दबाव है.
इस मामले को उदाहरण से आसानी से समझ सकते हैं. मान लीजिए किसी व्यक्ति ने पर्सनल लोन लिया है और उसकी किस्तें बकाया हैं. वह बैंक या फाइनेंस कंपनी के पास सोना गिरवी रखकर नया गोल्ड लोन ले सकता है. इससे उसका पुराना बकाया चुक सकता है, लेकिन अगर उसकी आमदनी नहीं बढ़ती, तो भविष्य में नई किस्तें चुकाना भी मुश्किल हो सकता है. इस तरह एक कर्ज चुकाने के लिए दूसरा कर्ज लेना समस्या का स्थायी समाधान नहीं बनता. मैक्वेरी के मुताबिक, कुछ कर्जदाताओं के रिकवरी कर्मचारी भी बकाया चुकाने के लिए ग्राहकों को गोल्ड लोन लेने का विकल्प सुझा सकते हैं.
क्या गोल्ड लोन लेना जोखिम भरा है?
गोल्ड लोन अपने आप में खराब या जोखिम भरा कर्ज नहीं है. इसका इस्तेमाल परिवार की अचानक आई आर्थिक जरूरतों, इलाज, बच्चों की पढ़ाई और छोटे कारोबार के लिए पूंजी जुटाने में किया जाता है. छोटे शहरों में कई परिवारों के लिए सोना उनकी सबसे महत्वपूर्ण संपत्तियों में से एक है. वहीं, कुछ कारोबारी अपने काम को बढ़ाने या रोजमर्रा के खर्च पूरे करने के लिए सोने के बदले कर्ज लेते हैं. गोल्ड लोन की खासियत यह है कि इसके बदले ग्राहक सोना गिरवी रखता है. अगर वह कर्ज नहीं चुका पाता, तो नियमों के तहत कर्जदाता गिरवी रखे गए सोने की नीलामी करके अपनी रकम वसूलने की कोशिश कर सकता है. इस वजह से गोल्ड लोन में बिना किसी गारंटी वाले पर्सनल लोन के मुकाबले नुकसान कम रहने की संभावना होती है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि कर्ज देने वाली कंपनियों को कोई नुकसान नहीं हो सकता.
सोने की कीमत गिरने पर बढ़ सकती है परेशानी
गोल्ड लोन देने वाली कंपनियों के लिए सोने की कीमतें बेहद जरूरी हैं. अगर कर्ज लेने के बाद सोने की कीमत तेजी से गिरती है और उसी समय बड़ी संख्या में ग्राहक कर्ज चुकाना बंद कर देते हैं, तो कंपनियों के सामने मुश्किल बढ़ सकती है. ऐसी स्थिति में गिरवी रखे गए सोने की नीलामी से पूरी रकम वसूलना हमेशा संभव नहीं होता. अगर कई ग्राहक एक साथ भुगतान में चूक करते हैं, तो बड़ी मात्रा में सोने की नीलामी भी उसकी बिक्री से मिलने वाली रकम पर दबाव डाल सकती है. हालांकि, RBI के नियमों के तहत कर्ज की रकम और गिरवी रखे गए सोने की कीमत के बीच एक अंतर रखा जाता है. इसका मकसद सोने की कीमत घटने की स्थिति में कर्जदाता को कुछ सुरक्षा देना है.
RBI ने गोल्ड लोन के नियमों में क्या बदलाव किए?
ने जून 2025 में सोने और चांदी के बदले कर्ज देने के लिए नए दिशानिर्देश जारी किए थे. ये नियम 1 अप्रैल 2026 से लागू हुए. नए नियमों के तहत कर्ज की रकम के हिसाब से सोने की कीमत के मुकाबले लोन की लिमिट तय की गई है. 2.5 लाख रुपये तक के कर्ज पर सोने की कीमत का अधिकतम 85% तक लोन होगा. 2.5 लाख से 5 लाख रुपये तक के कर्ज पर 80% तक लोन. 5 लाख रुपये से ज्यादा के कर्ज पर अधिकतम 75% तक लोन होगा. इसके अलावा, व्यक्तिगत जरूरतों के लिए एकमुश्त भुगतान वाले गोल्ड लोन की अवधि अधिकतम 12 महीने रखी गई है. इन नियमों का मकसद कर्ज देने की प्रक्रिया को व्यवस्थित करना और कर्जदाता व ग्राहक, दोनों के जोखिम को नियंत्रित करना है.
गोल्ड लोन कारोबार में उतर रही हैं नई कंपनियां
गोल्ड लोन बाजार की बढ़ती मांग को देखते हुए कई नई कंपनियां भी इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ा रही हैं. टाटा कैपिटल ने जुलाई में योगक्षेमम लोन्स में 88.6% हिस्सेदारी खरीदने की घोषणा की थी. इसके बाद गोदरेज कैपिटल ने कनकदुर्गा फाइनेंस का गोल्ड लोन कारोबार खरीदा. इकोनॉमिक टाइम्स की अगस्त की रिपोर्ट के अनुसार, आदित्य बिड़ला कैपिटल मार्च 2027 तक 200 से 300 गोल्ड लोन शाखाएं खोलने की योजना बना रही थी. कंपनी का लंबी अवधि का लक्ष्य लगभग 1,000 शाखाओं तक पहुंचना है. वहीं, एलएंडटी फाइनेंस ने चालू वित्त वर्ष में 500 गोल्ड लोन शाखाएं जोड़ने की योजना बनाई है. गोल्ड लोन में कंपनियों की दिलचस्पी की एक वजह यह है कि इसमें कर्ज के बदले सोना गिरवी रखा जाता है. लेकिन तेजी से कारोबार बढ़ाने की होड़ में अगर कंपनियां ग्राहकों की भुगतान क्षमता की सही जांच नहीं करतीं, तो भविष्य में जोखिम बढ़ सकता है.
मार्च 2028 तक 30 लाख करोड़ रुपये का हो सकता है बाजार
ICRA की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, गोल्ड लोन बाजार अगले दो वर्षों में 30% से अधिक बढ़कर मार्च 2028 तक 30 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है. हालांकि, बाजार की असली मजबूती केवल कर्ज की रकम बढ़ने से तय नहीं होगी. यह भी देखना होगा कि कितने ग्राहक समय पर कर्ज चुका पा रहे हैं और कितने लोग पुराने कर्ज का भुगतान करने के लिए नया गोल्ड लोन ले रहे हैं. बजाज फाइनेंस ने कहा है कि शुरुआती स्तर पर कर्ज चुकाने में हो रही देरी का बड़ा कारण कम अवधि वाले कुछ लोन उत्पाद थे. कंपनी ने इन योजनाओं को बंद कर दिया है और उसका मानना है कि इससे कर्ज की लागत पर बड़ा असर पड़ने की आशंका नहीं है.