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बोतल पर व्हिस्की, रम या वोडका… लेकिन अंदर सबकुछ सेम? भारत में शराब की असली पहचान पर FSSAI ने उठाए बड़े सवाल!​

भारत में शराब की बोतल पर लिखा नाम व्हिस्की, रम या वोडका अब भरोसे का सवाल नहीं रहा, बल्कि कानूनी बहस का विषय बन गया है. हाल ही में फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने बॉम्बे हाई कोर्ट में साफ कहा कि लोकप्रिय ब्रांड ओल्ड मोंक को कानूनी तौर पर ‘रम’ नहीं कहा […]

भारत में शराब की बोतल पर लिखा नाम व्हिस्की, रम या वोडका अब भरोसे का सवाल नहीं रहा, बल्कि कानूनी बहस का विषय बन गया है. हाल ही में फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने बॉम्बे हाई कोर्ट में साफ कहा कि लोकप्रिय ब्रांड ओल्ड मोंक को कानूनी तौर पर ‘रम’ नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इसमें आर्टिफिशियल फ्लेवर वाला न्यूट्रल स्पिरिट इस्तेमाल होता है. सिर्फ ओल्ड मोंक ही नहीं, गोल्ड रिजर्व और मैकडॉवेल्स नंबर 1 जैसे बड़े नाम भी अब जांच के घेरे में हैं. असल मुद्दा यह है कि भारत की ज्यादातर IMFL इंडस्ट्री एक ही बेस एक्स्ट्रा न्यूट्रल अल्कोहल पर टिकी है, चाहे बोतल पर नाम कुछ भी लिखा हो. यह मामला सिर्फ इंडस्ट्री या रेगुलेशन का नहीं, बल्कि हर उस कंज्यूमर के अधिकार का है जो अपने पैसे खर्च करके यह जानना चाहता है कि गिलास में असल में क्या है. आइए इससे जुड़े 5 बड़े सवालों को आसान भाषा में समझते हैं.

सवाल व्हिस्की, रम और वोडका में असली फर्क क्या है?

जवाब इन तीनों की रेगुलेटरी पहचान अलगअलग स्टैंडर्ड से तय होती है. इसमें इस्तेमाल होने वाला रॉ मटेरियल, फर्मेंटेशन और डिस्टिलेशन प्रोसेस के साथ प्रोडक्ट की दूसरी तय खासियतें जरूरी होती हैं. FSSAI के नियमों में व्हिस्की के लिए माल्टेड सीरियल ग्रेन्स से बने फर्मेंटेड एक्सट्रैक्ट के साथ कुछ तय न्यूट्रल या रेक्टिफाइड स्पिरिट के इस्तेमाल की भी परमिशन है. वहीं, वोडका को न्यूट्रल स्पिरिट से तैयार किया जाता है. रम के लिए भी अलग स्टैंडर्ड तय हैं. इसलिए सिर्फ यह देखकर कि किसी बेवरेज में न्यूट्रल स्पिरिट का इस्तेमाल हुआ है, उसे व्हिस्की, रम या वोडका में से किसी दूसरी कैटेगरी में रख देना सही नहीं होगा. हर प्रोडक्ट को उसकी संबंधित रेगुलेटरी डेफिनिशन के आधार पर देखना जरूरी है.

सवाल क्या भारत में व्हिस्की के नाम पर दूसरी तरह की स्प्रिट इस्तेमाल हो सकती है?

जवाब कुछ परिस्थितियों में न्यूट्रल स्पिरिट का इस्तेमाल भारतीय नियमों के तहत अलाउड है. FSSAI के Alcoholic Beverages Regulations में Extra Neutral Alcohol यानी ENA को न्यूट्रल स्पिरिट के रूप में डिफाइन किया गया है. इसे एग्रीकल्चरलओरिजिन कार्बोहाइड्रेट के फर्मेंटेशन, डिस्टिलेशन और रेक्टिफिकेशन से तैयार किया जा सकता है. इसके सोर्स में सीरियल्स और मोलासेस जैसे एग्रीकल्चरल मटेरियल शामिल हो सकते हैं. इसका मतलब यह नहीं है कि भारत की हर व्हिस्की ENA से बनती है या हर ENAबेस्ड व्हिस्की किसी दूसरी कैटेगरी की शराब है. किसी स्पेसिफिक ब्रांड की कंपोजिशन जानने के लिए उसके फॉर्मुलेशन और प्रोडक्शन डिटेल्स की जरूरत होगी. एक और जरूरी बात यह है कि ENA का इस्तेमाल अपनेआप में मिलावट नहीं है. अगर किसी प्रोडक्ट में इसका इस्तेमाल संबंधित रेगुलेटरी स्टैंडर्ड के मुताबिक किया गया है, तो उसे मिलावट कहना सही नहीं होगा.

सवाल रम और व्हिस्की में फ्लेवर मिलाने पर विवाद क्यों हो सकता है?

जवाब विवाद का सवाल सिर्फ फ्लेवर इस्तेमाल करने का नहीं, बल्कि किस प्रोडक्ट में किस तरह फ्लेवर का इस्तेमाल हुआ और उसे लेबल पर किस तरह पेश किया गया, इसका है. ओल्ड मोंक मामले में FSSAI ने कोर्ट के सामने कहा कि संबंधित प्रोडक्ट में न्यूट्रल स्पिरिट के साथ रम फ्लेवरिंग का इस्तेमाल होता है और इसी आधार पर उसे केवल रम के रूप में बेचने पर आपत्ति जताई गई. यह FSSAI का पक्ष है. इसे अदालत का फाइनल निष्कर्ष नहीं माना जाना चाहिए. किसी अल्कोहलिक बेवरेज के लेबल पर प्रोडक्ट की नेचर, इंग्रीडिएंट्स या फ्लेवरिंग से जुड़ी जानकारी रेगुलेटरी रिक्वायरमेंट के मुताबिक और कंज्यूमर के लिए क्लियर होना जरूरी है.

सवाल ओल्ड मोंक के 7 Years Old Blended दावे पर सवाल क्यों उठे?

जवाब ओल्ड मोंक की बोतल पर इस्तेमाल किए गए 7 Years Old Blended क्लेम को लेकर बॉम्बे हाई कोर्ट में सवाल उठे. सुनवाई के दौरान प्रोडक्ट में फ्लेवरिंग और लेबल पर उसकी जानकारी को लेकर भी चर्चा हुई. उपलब्ध रिपोर्ट्स के मुताबिक निर्माता ने लेबल में बदलाव करने पर सहमति जताई है. इसमें added flavour को साफ तौर पर दिखाने और 7 Years Old Blended वर्डिंग हटाने का प्रपोजल शामिल है.

सवाल क्या भारत में शराब की बोतल पर कंज्यूमर को पूरी जानकारी मिलती है?

जवाब इस सवाल का जवाब किसी एक ब्रांड या पूरी इंडस्ट्री पर ब्लैंकेट स्टेटमेंट देकर नहीं दिया जा सकता. भारत में अल्कोहलिक बेवरेज के लिए FSSAI के स्पेसिफिक स्टैंडर्ड और लेबलिंग रिक्वायरमेंट हैं. इसके अलावा शराब की रेगुलेशन में राज्य सरकारों की भी अहम भूमिका होती है. ओल्ड मोंक विवाद ने हालांकि यह सवाल जरूर सामने रखा है कि प्रोडक्ट की कैटेगरी, फ्लेवरिंग और एजरिलेटेड क्लेम को लेबल पर कितनी क्लैरिटी से पेश किया जाना चाहिए. कंज्यूमर के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि बोतल पर किया गया क्लेम प्रोडक्ट की वास्तविक रेगुलेटरी कैटेगरी और लागू लेबलिंग रिक्वायरमेंट के मुताबिक हो.

शराब को कैसे क्लासीफाई किया जाता है?

शराब की क्लासिफिकेशन सिर्फ इस आधार पर नहीं होती कि उसमें कौनसा बेस अल्कोहल इस्तेमाल हुआ है. अलगअलग रेगुलेटरी सिस्टम में रॉ मटेरियल, फर्मेंटेशन, डिस्टिलेशन, मैच्योरिंग, फ्लेवरिंग और दूसरे टेक्निकल स्टैंडर्ड की भूमिका हो सकती है. भारत में FSSAI के Alcoholic Beverages Regulations अलगअलग अल्कोहलिक बेवरेज कैटेगरी के लिए स्पेसिफिक स्टैंडर्ड तय करते हैं. दूसरी तरफ EU जैसे मार्केट में स्पिरिट्स के लिए अलग लीगल डेफिनिशन हैं. इसलिए किसी भारतीय प्रोडक्ट को सिर्फ विदेशी नियमों के आधार पर दूसरी कैटेगरी में रख देना सही नहीं होगा. मिसाल के तौर पर EU के नियमों में रम और व्हिस्की के लिए अलगअलग प्रोडक्शन रिक्वायरमेंट हैं. इसलिए यह कहना कि मोलासेस या न्यूट्रल स्पिरिट इस्तेमाल होने भर से कोई व्हिस्की असल में रम बन जाती है, रेगुलेटरी तौर पर बहुत ज्यादा सिम्प्लीफिकेशन होगी.

भारतीय शराब बाजार में ENA की भूमिका क्या है?

भारत में ENA और न्यूट्रल स्पिरिट का इस्तेमाल अल्कोहलिक बेवरेज प्रोडक्शन में होता है. लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि देश की ज्यादातर व्हिस्की, रम और वोडका एक ही तरीके से बनती हैं. किसी कैटेगरी में न्यूट्रल स्पिरिट की परमिशन होना और किसी स्पेसिफिक प्रोडक्ट का उस कैटेगरी की सभी रेगुलेटरी कंडीशन को पूरा करना—दो अलग बातें हैं. यही फर्क ओल्ड मोंक विवाद को समझने के लिए भी जरूरी है. यहां सवाल सिर्फ बेस स्पिरिट का नहीं, बल्कि प्रोडक्ट की पूरी फॉर्मुलेशन, फ्लेवरिंग और लेबल पर किए गए क्लेम का है.

तो ओल्ड मोंक विवाद से क्या बड़ा सवाल सामने आया?

यह मामला भारतीय शराब की पूरी इंडस्ट्री को एक जैसा साबित नहीं करता, लेकिन यह जरूर दिखाता है कि अल्कोहलिक बेवरेज की कैटेगरी और उसके लेबल क्लेम रेगुलेटरी जांच के दायरे में आ सकते हैं. FSSAI का कहना है कि न्यूट्रल स्पिरिट और रम फ्लेवरिंग वाले संबंधित प्रोडक्ट को रम के रूप में लेबल करने पर सवाल उठता है. वहीं अदालत में हुई कार्यवाही के दौरान 7 Years Old Blended जैसे क्लेम और फ्लेवर डिस्क्लोजर पर भी चर्चा हुई. इसका सीधा असर कंज्यूमर ट्रांसपेरेंसी पर पड़ता है. आखिर बोतल पर जो लिखा है, वह प्रोडक्ट की वास्तविक नेचर और लागू नियमों के मुताबिक होना चाहिए.

ओल्ड मोंक का विवाद सिर्फ एक ब्रांड की लेबल डिस्प्यूट तक सीमित नहीं है. इसने यह चर्चा जरूर तेज कर दी है कि भारत में व्हिस्की, रम और दूसरी डिस्टिल्ड स्पिरिट्स की रेगुलेटरी पहचान कैसे तय होती है और कंज्यूमर को लेबल पर कितनी क्लियर जानकारी मिलनी चाहिए. लेकिन इस मामले से यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि भारत की व्हिस्की, रम और वोडका एक ही चीज हैं या कि हर ENAबेस्ड स्पिरिट गलत तरीके से बेची जा रही है. असल सवाल यह है कि किस प्रोडक्ट में कौनसी स्पिरिट इस्तेमाल हुई है, उसकी फॉर्मुलेशन क्या है, फ्लेवरिंग का इस्तेमाल कैसे हुआ है और लेबल पर किए गए क्लेम संबंधित नियमों के मुताबिक हैं या नहीं. ओल्ड मोंक मामले की आगे की कानूनी प्रक्रिया इन सवालों पर और क्लियरिटी दे सकती है.

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संपादकीय टीम

खबर मंकी की अनुभवी एडिटोरियल डेस्क। हमारे लेखक और संपादक दिन-रात निष्पक्ष, सटीक और तीव्र समाचार आप तक पहुँचाने के लिए काम करते हैं।

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