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फ्रांस का वो प्रदर्शन जब छात्रों ने हिला दी थी राष्ट्रपति की कुर्सी, अब मैक्रों के सामने फिर वही चुनौती​

फ्रांस में नौजवान सड़कों पर हैं. वे बेहतर शिक्षा, शिक्षक, वातावरण एवं स्कूल भवनों की मांग कर रहे हैं. यह आंदोलन पेरिस के एक छोटे से हिस्से से शुरू होकर अब विस्तार लेता जा रहा है. देश में कुछ जगहों पर हिंसा और पुलिस के साथ झड़पों की खबरें भी आई हैं. इस प्रदर्शन से […]

फ्रांस में नौजवान सड़कों पर हैं. वे बेहतर शिक्षा, शिक्षक, वातावरण एवं स्कूल भवनों की मांग कर रहे हैं. यह आंदोलन पेरिस के एक छोटे से हिस्से से शुरू होकर अब विस्तार लेता जा रहा है. देश में कुछ जगहों पर हिंसा और पुलिस के साथ झड़पों की खबरें भी आई हैं. इस प्रदर्शन से देश की शिक्षा व्यवस्था एवं राजनीति कठघरे में है. युवाओं के विरोध प्रदर्शन ने एक बार फिर देश की राजनीति और शिक्षा व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े किए हैं. इस स्थिति ने फ्रांस को उसके इतिहास के बड़े छात्र आंदोलनों की याद दिलाई है. लोग साल 1968 के छात्र आंदोलन को याद कर रहे हैं. उसकी चर्चा हो रही है.

आइए, इसी बहाने जानते हैं फ्रांस का वो प्रोटेस्ट जब छात्रों ने हिला दी थी राष्ट्रपति की कुर्सी, नेशनल असेंबली भंग करने का ऐलान, हुई थी नए चुनाव की घोषणा?

क्यों हुआ 1968 का छात्र आंदोलन?

फ्रांस के इतिहास में मई 1968 एक बड़ा मोड़ माना जाता है. उस समय विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के छात्रों ने शिक्षा व्यवस्था, सामाजिक नियमों और सरकार की नीतियों के खिलाफ प्रदर्शन किए. पेरिस के विश्वविद्यालयों में शुरू हुई अशांति जल्द ही देश के दूसरे हिस्सों तक पहुंची. मजदूर संगठनों ने भी हड़ताल का रास्ता अपनाया. कई कारखाने और सार्वजनिक सेवाएं प्रभावित हुईं. आंदोलन का असर इतना व्यापक था कि तत्कालीन राष्ट्रपति चार्ल्स द गॉल की सरकार पर गंभीर दबाव आया. देश में राजनीतिक अनिश्चितता बढ़ी.

द गॉल ने कुछ समय के लिए देश छोड़ दिया और बाद में चुनाव कराने का रास्ता चुना. उनकी पार्टी ने चुनाव में जीत हासिल की. इसलिए 1968 को केवल सरकार के गिरने की कहानी के रूप में देखना अधूरा होगा. आंदोलन ने सरकार को चुनौती दी, लेकिन सत्ता का फैसला चुनाव के जरिए हुआ.

नेशनल असेंबली भंग करने का फैसला

फ्रांस की राजनीति में नेशनल असेंबली भंग करने का फैसला भी अक्सर चर्चा में आता है. 2024 में राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने यूरोपीय चुनावों में अपनी पार्टी के कमजोर प्रदर्शन के बाद नेशनल असेंबली भंग कर अचानक संसदीय चुनाव कराने की घोषणा की थी. यह कदम मई 1968 की घटनाओं से अलग था. उस समय देश में छात्रमजदूर आंदोलन के बाद राष्ट्रपति द गॉल ने चुनाव का रास्ता चुना था. 2024 में मैक्रों का फैसला संसदीय चुनाव से जुड़ा राजनीतिक कदम था. इन घटनाओं का उल्लेख जरूरी है, क्योंकि कई बार अलगअलग वर्षों के विरोध और चुनावी फैसलों को एक ही घटनाक्रम की तरह पेश कर दिया जाता है. 1968 में छात्र आंदोलन व्यापक सामाजिक संकट बना. 2024 में राष्ट्रपति ने संसद भंग कर चुनाव बुलाए. दोनों प्रसंग फ्रांस की राजनीति में अहम हैं, लेकिन इनके कारण और परिणाम एक जैसे नहीं थे.

फ्रांस में आंदोलन हिंसक हो गया है.

मौजूदा आंदोलन कहां से शुरू हुआ

हाल की छात्र हलचल पेरिस के उत्तर में स्थित एक स्कूल में शिक्षकों और संसाधनों की कमी के विरोध से शुरू हुई. छात्रों ने अपने शिक्षकों के समर्थन में आवाज उठाई. शुरुआती मांगें पूरी होने पर स्कूल में हड़ताल समाप्त हो गई, लेकिन विरोध की चर्चा दूसरे इलाकों तक पहुंच चुकी थी. इसके बाद छात्रों ने कई स्कूलों के प्रवेश द्वार रोकने और प्रदर्शन करने शुरू किए. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह आंदोलन बाद में फ्रांस के अलगअलग शहरों तक पहुंचा. छात्र संगठनों, शिक्षकों और कुछ ट्रेड यूनियनों ने भी समर्थन जताया. अलगअलग जगहों पर प्रदर्शनों का आकार और स्वरूप अलग रहा. कुछ स्थानों पर शांतिपूर्ण रैलियां हुईं. दूसरी जगहों पर आगजनी, तोड़फोड़ और पुलिस के साथ टकराव की खबरें आईं.

क्या हैं छात्रों की मुख्य मांगें?

छात्रों की शिकायतों का केंद्र स्कूलों की स्थिति है. कई विद्यार्थियों का कहना है कि कक्षाओं में जरूरत से ज्यादा छात्र हैं. शिक्षक कम पड़ते हैं. जब कोई शिक्षक अनुपस्थित होता है, तो उसकी जगह पढ़ाने वाला व्यक्ति हमेशा उपलब्ध नहीं होता. इससे पढ़ाई के घंटे प्रभावित होते हैं. स्कूलों की इमारतों और सुविधाओं को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं. कुछ छात्रों ने खराब कक्षाओं, कम संसाधनों और गर्म मौसम में पढ़ाई की मुश्किलों पर ध्यान दिलाया. उनका कहना है कि शिक्षा का अधिकार तभी सार्थक है, जब स्कूलों में सीखने के लिए जरूरी माहौल हो. इन मांगों के पीछे केवल परीक्षा या पाठ्यक्रम की चिंता नहीं है. छात्र यह भी पूछ रहे हैं कि क्या सभी इलाकों के स्कूलों को समान अवसर और संसाधन मिल रहे हैं. कम आय वाले या पिछड़े इलाकों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को बेहतर सुविधाएं देने की मांग भी आंदोलन का हिस्सा बनी है.

प्रदर्शन कर रहे छात्रों की कई मांगे हैं.

सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव

फ्रांस सरकार ने छात्रों की समस्याओं पर चर्चा और सुधार के प्रस्तावों की बात कही है. प्रधानमंत्री सेबास्टियन लेकोर्नू ने स्कूलों में छात्रों की चिंताओं को सुनने की जरूरत पर जोर दिया. शिक्षा मंत्रालय ने विद्यार्थियों से सुझाव लेने की पहल भी की. लेकिन छात्र संगठनों का कहना है कि केवल बातचीत काफी नहीं है. वे ठोस फैसले और समयबद्ध कार्रवाई चाहते हैं. तनाव का दूसरा बड़ा कारण पुलिस की भूमिका है. प्रदर्शन के दौरान पुलिस और युवाओं के बीच झड़पें हुईं. कुछ छात्र और शिक्षा कर्मचारी घायल हुए. पुलिसकर्मियों के घायल होने की खबरें भी सामने आईं. कुछ छात्र संगठनों और आलोचकों ने पुलिस की कार्रवाई को जरूरत से ज्यादा कठोर बताया.

🚨BREAKING: Paris, France currently looks like a warzone as the city is being overtaken by ProPalestine terrorists https://t.co/DKrBxOdRUU

— Eric Deters October 6, 2026

क्या युवा फिर राजनीति बदल सकते हैं?

फ्रांस का इतिहास बताता है कि छात्रों की आवाज कभीकभी बड़े सामाजिक बदलाव की शुरुआत बन सकती है. 1968 में छात्रों के विरोध को मजदूरों के समर्थन ने व्यापक आंदोलन में बदल दिया था. आज के प्रदर्शन भी सरकार को शिक्षा और युवाओं की जरूरतों पर जवाब देने के लिए मजबूर कर रहे हैं. फिर भी अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि मौजूदा आंदोलन देश की सत्ता या चुनावी राजनीति को उसी तरह प्रभावित करेगा. आज के युवाओं की मांग अधिक बुनियादी है. वे चाहते हैं कि स्कूलों में शिक्षक हों, कक्षाएं पढ़ाई के योग्य हों और उनकी समस्याओं को गंभीरता से सुना जाए. सरकार के सामने चुनौती है कि वह प्रदर्शन को केवल कानूनव्यवस्था का सवाल न माने. उसे शिक्षा व्यवस्था की कमियों पर भी जवाब देना होगा.

फ्रांस की सड़कों पर उठती आवाज एक साफ संदेश देती है. युवा अपने भविष्य से जुड़े फैसलों में भागीदारी चाहते हैं. विरोध शांतिपूर्ण रहे और बातचीत का रास्ता खुला रहे, तो मांगों पर समाधान तलाशना आसान हो सकता है. हिंसा से नुकसान बढ़ता है और असली मुद्दे पीछे छूट जाते हैं. अब देखना होगा कि सरकार और छात्र संगठन बातचीत के जरिए भरोसा कायम कर पाते हैं या नहीं.

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संपादकीय टीम

खबर मंकी की अनुभवी एडिटोरियल डेस्क। हमारे लेखक और संपादक दिन-रात निष्पक्ष, सटीक और तीव्र समाचार आप तक पहुँचाने के लिए काम करते हैं।

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