Reliance Fuel Export: जब दुनिया के कई देश पश्चिम एशिया के संकट की वजह से तेल की किल्लत झेल रहे हैं, तब मुकेश अंबानी की कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज ने इस मुश्किल वक्त को एक बड़े मौके में बदल लिया है. पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव के कारण ग्लोबल स्तर पर ईंधन की सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हुई है. ऐसे समय में रिलायंस ने अपने फ्यूल एक्सपोर्ट का रुख पूर्वी व दक्षिणी अफ्रीका, भूमध्यसागरीय क्षेत्र के अलावा अन्य यूरोपीय बाजारों की तरफ मोड़ दिया. कंपनी की सितंबर तिमाही की वित्तीय रिपोर्ट बताती है कि इस कदम से इन बाजारों में रिलायंस की हिस्सेदारी करीब 50 फीसदी तक बढ़ गई है.

नए बाजारों में बनाई मजबूत पकड़
रिलायंस ने सिर्फ यूरोप या अफ्रीका तक खुद को सीमित नहीं रखा. कंपनी ने ऑस्ट्रेलिया, केन्या के साथ तंजानिया में भी प्रीमियम पेट्रोल बेचने के नए मौके तलाशे. इसके साथ ही भूमध्यसागरीय बाजार में डीजल के अलावा विमान ईंधन की सप्लाई को भी काफी बढ़ा दिया गया. रिलायंस के सप्लाई व ट्रेडिंग के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर श्रीनिवासन तुट्टागुंटा के मुताबिक, भूमध्यसागरीय बाजार में सप्लाई घटने से डीजल के साथ जेट फ्यूल के लिए अच्छे मौके मिले. इसी दौरान कंपनी ने पहली बार दक्षिण अफ्रीका को कम सल्फर वाला एटीएफ भी सप्लाई किया. इस कदम ने कंपनी के लिए भविष्य में एक्सपोर्ट के नए दरवाजे खोल दिए हैं.
O2C बिजनेस से हुई रिकॉर्ड कमाई
तेल के इस खेल में रिलायंस का ऑयलटूकेमिकल्स बिजनेस दूसरी तिमाही की कमाई का सबसे बड़ा हीरो बनकर उभरा है. ऊंची एनर्जी कीमतों के दम पर कंपनी के O2C बिजनेस का रेवेन्यू 44 फीसदी उछलकर 2,31,601 करोड़ रुपये पर पहुंच गया. वहीं, इसका ऑपरेटिंग मुनाफा 68 फीसदी की भारी बढ़त के साथ 25,203 करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया. असल में पश्चिम एशिया के तनाव ने कच्चे तेल की कीमतों में सालाना आधार पर 41 फीसदी की बढ़ोतरी कर दी है. वहीं ट्रांसपोर्ट फ्यूल के दाम भी 50 से 78 फीसदी तक उछल गए हैं. रूस के साथ पश्चिम एशिया में रिफाइनरी क्षमता प्रभावित होने से ग्लोबल रिफाइनिंग मार्जिन में भारी उछाल आया. सितंबर तिमाही में गैसोलीन क्रैक एक साल पहले के 8.4 डॉलर से बढ़कर करीब 25 डॉलर प्रति बैरल हो गया. इसी तरह डीजल क्रैक 18.7 डॉलर से बढ़कर 65.8 डॉलर पर पहुंच गया, जबकि जेट फ्यूल का मार्जिन 16 डॉलर से उछलकर 59.3 डॉलर प्रति बैरल हो गया.
कच्चे तेल की खरीदारी से लेकर जहाजों तक बदले प्लान
इस मौके का फायदा उठाना इतना आसान भी नहीं था. तिमाही के दौरान ब्रेंट क्रूड के दाम 70 से 130 डॉलर प्रति बैरल के बीच झूलते रहे. इसके अलावा कच्चे तेल के प्रीमियम, मालभाड़े के साथ बीमा का खर्च बढ़ने से खरीदारी काफी महंगी हो गई थी. होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास तनाव के बावजूद रिलायंस ने अपनी रणनीति में लचीलापन रखा. कंपनी ने कच्चे तेल की खरीदारी के लिए अमेरिका, खाड़ी देशों समेत अन्य क्षेत्रों के बीच अपने विकल्प बदले, जिससे शिपिंग की दिक्कतों के बाद भी रिकॉर्ड स्तर पर क्रूड की प्रोसेसिंग जारी रही. महंगे मालभाड़े के असर को कम करने के लिए रिलायंस ने अपने 20 से ज्यादा जहाज काम पर लगाए. कच्चे तेल के अलावा तैयार प्रोडक्ट ले जाने वाले इन कुल जहाजों की संख्या 25 के करीब पहुंच गई है.
घरेलू मांग पूरी करने पर भी रहा पूरा जोर
विदेशी बाजारों में मुनाफा कमाने के साथ रिलायंस ने भारत की घरेलू जरूरतों का भी पूरा ध्यान रखा. देश के अंदर पेट्रोल की खपत सालाना आधार पर 8.5 फीसदी बढ़ी है, जबकि डीजल की मांग में 7.5 फीसदी का इजाफा हुआ. वहीं, घरेलू मांग को पूरा करने के लिए कंपनी ने सामान्य एलपीजी का उत्पादन करीब दोगुना कर दिया. इसके लिए कंपनी को अल्काइलेट समेत पेट्रोल के कुछ अन्य कंपोनेंट्स के उत्पादन में कटौती भी करनी पड़ी. हालांकि, इस शानदार प्रदर्शन के बीच कंपनी के मार्जिन पर स्पेशल एडिशनल एक्साइज ड्यूटी का दबाव भी रहा. साथ ही, अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की ऊंची कीमतों का पूरा बोझ स्थानीय ग्राहकों पर न डाल पाने से भी मुनाफे पर थोड़ा असर पड़ा. कंपनी का मानना है कि रिफाइनरियों में रुकावट, रूसी एक्सपोर्ट पर पाबंदी के साथ चीन के एक्सपोर्ट को लेकर बनी अनिश्चितता की वजह से आने वाले समय में भी ग्लोबल सप्लाई टाइट रहेगी.