फिल्मेकर्स इन दिनों भगवान कृष्ण पर काफी फिल्में बना रहे हैं। पहले ‘लालो: कृष्णा सदा सहायते’ आई, जिसे लोगों ने काफी पसंद किया। इसके बाद ‘कृष्णावतारम’ रिलीज हुई और उसे भी दर्शकों से अच्छा रिस्पॉन्स मिला। अब मेकर्स एक और मूवी लेकर आ गए हैं, जिसका नाम ‘कृष्णा और चिट्ठी’ है। यह एक पारिवारिक और स्पोर्ट्स-ड्रामा फिल्म है। जिसमें क्रिकेट के प्रति जुनून और भगवान श्रीकृष्ण में विश्वास के संगम को दिखाया गया है।

निर्देशक विनय भारद्वाज और सौमित्र सिंह की इस फिल्म में रिश्तों, संघर्ष और उम्मीद की कहानी को संवेदनशील तरीके से पेश करने की कोशिश की है। हालांकि, फिल्म हर मोर्चे पर पूरी तरह सफल नहीं होती, लेकिन इसका भावनात्मक पक्ष दर्शकों को बांधे रखता है। ऐसे में अगर आप भी यह फिल्म देखने का प्लान कर रहे हैं, तो पहले रिव्यू यहां पढ़ सकते हैं।
क्या है फिल्म की कहानी?
सबसे पहले बात करते हैं कि फिल्म की कहानी क्या है। यह अर्जुन (दर्शील सफारी) नाम के एक लड़के के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसे क्रिकेट से बेहद लगाव है। उसके लिए क्रिकेट सिर्फ खेल नहीं, बल्कि जिंदगी का सहारा है। वह सचिन तेंदुलकर का बहुत बड़ा फैन होता है। अर्जुन कश्मीर जैसे संवेदनशील जगह में पला-बढ़ा है। वह अपने परिवार, हालात और सपनों के बीच लगातार संघर्ष करता दिखाई देता है।
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दूसरी तरफ उनके इलाके की एक जमीन जिस पर मंदिर बनना था, उसे वहां का एमएलए (सज्जाद डेलाफ्रूज) हथिया लेता है, ताकि मॉल बना सके। इसके बाद उस एमएलए से टक्कर लेते हैं अर्जुन के पिता (अरुण गोविल) और कहानी में नया मोड़ आ जाता है। इस जमीन का फैसला एक क्रिकेट मैच पर टिक जाता है। आगे क्या होगा वह इस्पॉइलर तो हम आपको बता सकते, क्योंकि उसके लिए आपको फिल्म देखनी होगी। हां, यह मूवी आपको आमिर खान की ‘लगान’ की थोड़ी बहुत याद जरूर दिला सकती है।
कैसा है सितारों का अभिनय
सबसे पहले बात करें दर्शील सफारी की, तो उन्होंने अर्जुन के किरदार को ईमानदारी के साथ निभाया है। उनकी परफॉर्मेंस में मासूमियत और बेचैनी दोनों दिखाई देती हैं। अरुण गोविल अपनी सीमित मौजूदगी में भी प्रभाव छोड़ते हैं। उनके किरदार में सादगी और ठहराव है, जो फिल्म के भावनात्मक पक्ष को मजबूत करता है। सज्जाद डेलाफ्रूज और मीर सरवर ने कहानी के गंभीर माहौल को प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाया है।
कैसा है फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर
फिल्म का म्यूजिक और बैकग्राउंड स्कोर शानदार है, जो फिल्म में जान डालता है। कई सीन बिना ज्यादा डायलॉग के भी असर छोड़ते हैं। सिनेमैटोग्राफी खासतौर पर कश्मीर की लोकेशंस को खूबसूरती से स्क्रीन पर उतारती है। हालांकि, फिल्म की स्पीड कुछ जगहों पर धीमी महसूस होती है और सेकंड हाफ थोड़ा लंबा लगने लगता है। कुछ सीन और डायलॉग ज्यादा प्रभावशाली हो सकते थे।
फिल्म देखे या नहीं?
मुझे लगता है कि ‘कृष्णा और चिट्ठी’ उन दर्शकों के लिए बेहतर अनुभव साबित हो सकती है, जो एक्शन, हॉरर जैसे जॉनर के बजाय भावनात्मक और संवेदनशील कहानियां पसंद करते हैं। फिल्म पूरी तरह यादगार नहीं बन पाती, लेकिन अपने संदेश और भावनात्मक अपील की वजह से असर जरूर छोड़ती है।












