तेलंगाना से एक बेहद संवेदनशील और हैरान करने वाला मामला सामने आया है, जिसने राज्य की रेवंत रेड्डी सरकार को गंभीर कठघरे में खड़ा कर दिया है। यहाँ रोड ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन (RTC) के एक सामान्य बस ड्राइवर बैरी अशोक द्वारा किसानों की पीड़ा पर सवाल उठाने और सरकार से धान खरीद शुरू करने की अपील करने पर उनकी नौकरी छीनने का आरोप लगा है। इस घटना के बाद कांग्रेस पार्टी के ‘फ्रीडम ऑफ स्पीच’ के राष्ट्रीय दावों पर बड़े सवालिया निशान खड़े हो गए हैं।

पूरा मामला तब शुरू हुआ जब बस ड्राइवर बैरी अशोक जगित्याल-धर्मपुरी मार्ग से अपनी बस लेकर गुजर रहे थे। उस दौरान वहां स्थानीय कांग्रेस नेता और कार्यकर्ता धरना-प्रदर्शन कर रहे थे। जब अशोक को पता चला कि यह धरना पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों के विरोध में है, तो उन्होंने मौके पर मौजूद नेताओं से पूछ लिया कि कांग्रेस नेताओं को पहले धान खरीद और किसानों की बदहाली पर ध्यान देना चाहिए।
अशोक ने कहा था कि किसान छह महीने हाड़-तोड़ मेहनत कर फसल उगाते हैं, लेकिन सरकारी खरीद न होने की वजह से वे तपती धूप और बेमौसम बारिश में अपनी उपज बचाने के लिए मजबूर हैं। उन्होंने सिर्फ सरकार से जल्द से जल्द खरीद प्रक्रिया शुरू करने का अनुरोध किया था।
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किसानों के हक में बोलना पड़ा भारी, रेवंत रेड्डी सरकार पर उठे सवाल
आरोप है कि सरकार के मंत्रियों और नेताओं को एक आम कर्मचारी की यह सलाह रास नहीं आई और किसानों के पक्ष में आवाज उठाने की सजा के रूप में बैरी अशोक को नौकरी से हटाने की बात कही गई। इस कार्रवाई के बाद जनता और राजनीतिक गलियारों में यह बहस छिड़ गई है कि अशोक ने न तो कोई अपशब्द कहे, न हिंसा की और न ही कोई भ्रष्टाचार किया, तो फिर उन पर इतनी बड़ी गाज क्यों गिराई गई? क्या तेलंगाना में सरकार की नीतियों की आलोचना करना अब अपराध बन चुका है?
राहुल गांधी और कांग्रेस हाईकमान की चुप्पी पर निशाना
कांग्रेस पार्टी देश भर में लगातार संविधान बचाने और बोलने की आजादी की वकालत करती है, लेकिन अपने ही शासित राज्य तेलंगाना में मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी के इस कथित कदम पर कांग्रेस का राष्ट्रीय नेतृत्व पूरी तरह मौन है। सवाल अब सीधे राहुल गांधी से भी पूछे जा रहे हैं कि जब एक आम नागरिक या कर्मचारी अपनी राय रखता है और उस पर दमनकारी कार्रवाई होती है, तो हाईकमान चुप क्यों बैठ जाता है?
यह पहली बार नहीं है जब तेलंगाना सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठे हैं। इससे पहले भी भाजपा नेता बंदी संजय के बेटे से जुड़े पॉक्सो मामले में भी कांग्रेस नेतृत्व की चुप्पी की भारी आलोचना हुई थी, लेकिन आलाकमान की ओर से कोई निर्णायक कदम नहीं देखा गया। अब बैरी अशोक का यह मामला केवल एक ड्राइवर की नौकरी का नहीं, बल्कि यह इस बात का पैमाना बन गया है कि कांग्रेस की ‘फ्रीडम ऑफ स्पीच’ सिर्फ भाषणों तक सीमित है या जमीन पर भी लागू होती है।





