जिस पिता ने अपने बेटे को सबके सामने नालायक कहकर घर से निकाल दिया था, उसी पिता को एक दिन अपने बेटे की तलाश में दरदर भटकना पड़ा।

लेकिन जब वह बेटा मिला, तो उसके सामने एक ऐसा सच आया जिसने पिता के घमंड को हमेशा के लिए तोड़ दिया।
कहानी
बहुत समय पहले देवगढ़ नाम के एक गाँव में रघुवीर सिंह नाम का एक धनी किसान रहता था। उसके पास बहुतसी जमीन, कई बैल और एक बड़ा मकान था। गाँव में उसका सम्मान तो था, लेकिन लोग उसकी कठोरता से डरते भी थे।
रघुवीर का एक ही बेटा था, जिसका नाम मोहन था। मोहन अपने पिता से बिल्कुल अलग स्वभाव का था। उसे धन कमाने से अधिक दूसरों की सहायता करने में आनंद मिलता था। वह कभी किसी बूढ़े की लकड़ियाँ उठा देता, तो कभी किसी गरीब बच्चे को अपनी किताबें दे देता।
रघुवीर को बेटे की ये आदतें बिल्कुल पसंद नहीं थीं।
वह अक्सर कहता, “मोहन! दुनिया दया से नहीं, धन से चलती है। जो आदमी अपने लाभ के बारे में नहीं सोचता, वह जीवन में कभी सफल नहीं हो सकता।”
मोहन शांत स्वर में उत्तर देता, “पिताजी, धन से घर खरीदा जा सकता है, लेकिन घर में रहने वालों का प्यार नहीं।”
यह सुनकर रघुवीर गुस्से से भर जाता।
एक दिन गाँव में भयंकर सूखा पड़ा। किसानों की फसलें बर्बाद हो गईं। कई परिवारों के घरों में खाने तक के लाले पड़ गए। गाँव के कुछ गरीब किसान रघुवीर के पास अनाज उधार माँगने आए।
रघुवीर ने साफ मना कर दिया।
उसने कहा, “मेरे गोदाम में रखा अनाज मेरी मेहनत का परिणाम है। मैं इसे मुफ्त में नहीं बाँट सकता।”
मोहन यह सब देख रहा था। रात को जब सभी सो गए, तो उसने पिता के गोदाम से कुछ बोरियाँ निकालीं और गरीब परिवारों में बाँट आया।
सुबह जब रघुवीर को पता चला कि गोदाम से अनाज गायब है, तो वह आगबबूला हो गया।
उसने नौकरों से पूछताछ की। अंततः एक नौकर ने बता दिया कि मोहन रात में अनाज लेकर गया था।
रघुवीर ने पूरे गाँव के सामने मोहन को बुलाया।
“क्या तूने मेरा अनाज चुराया है?” उसने गरजकर पूछा।
मोहन ने सिर झुकाकर कहा, “हाँ, पिताजी। मैंने अनाज दिया है, लेकिन अपने लिए नहीं। गाँव में बच्चे भूखे सो रहे थे।”
रघुवीर ने क्रोध में कहा, “तुझे मेरी मेहनत की कोई कीमत नहीं! आज तूने चोरी की है। कल मेरा पूरा धन लुटा देगा। आज से इस घर में तेरे लिए कोई जगह नहीं है।”
मोहन की आँखों में आँसू आ गए।
उसने अंतिम बार पिता की ओर देखा और कहा, “पिताजी, मैं आपका घर छोड़ सकता हूँ, लेकिन किसी भूखे इंसान को देखकर उसकी सहायता करने का अपना स्वभाव नहीं छोड़ सकता।”
वह खाली हाथ गाँव से चला गया।
रघुवीर ने सोचा कि कुछ दिनों में बेटा वापस आ जाएगा और अपनी गलती स्वीकार कर लेगा। लेकिन दिन बीतते गए, महीने गुजर गए और मोहन नहीं लौटा।
समय के साथ गाँव की हालत और खराब हो गई। सूखे के कारण कई परिवार अपना घर छोड़कर दूसरे गाँवों में जाने लगे।
रघुवीर के पास धन तो था, लेकिन अब उससे बात करने वाला कोई नहीं था। लोग उसके सामने सम्मान से सिर झुकाते, मगर उसके जाते ही उसकी कठोरता की चर्चा करते।
एक शाम रघुवीर का पुराना मित्र हरिदास उसके घर आया।
उसने पूछा, “तुम्हारा बेटा कहाँ है?”
रघुवीर ने बेरुखी से कहा, “जहाँ भी होगा, अपनी करनी का फल भोग रहा होगा।”
हरिदास ने कुछ देर चुप रहने के बाद कहा, “तुम्हें पता भी है कि वह इन दिनों क्या कर रहा है?”
रघुवीर ने कोई उत्तर नहीं दिया।
हरिदास ने बताया कि पास के एक कस्बे में मोहन ने मजदूरी करके कुछ पैसे बचाए थे। उन पैसों से उसने एक छोटीसी रसोई शुरू की, जहाँ भूखे लोगों को मुफ्त भोजन मिलता था। बाद में कुछ व्यापारियों ने भी उसकी सहायता करनी शुरू कर दी।
रघुवीर ने यह सुनकर उपहास किया।
“कुछ लोगों को खाना खिलाने से कोई महान नहीं बन जाता।”
हरिदास ने धीरे से कहा, “सही कहा। लेकिन भूखे आदमी के लिए एक वक्त का भोजन भी पूरी दुनिया से बड़ा होता है।”
उस रात रघुवीर को नींद नहीं आई।
पहली बार उसने सोचा कि कहीं उसने अपने बेटे को समझने में गलती तो नहीं की।
एक दिन ऐसा आया, जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी
कुछ महीने बाद देवगढ़ में भयंकर महामारी फैल गई। लोग बीमार पड़ने लगे। गाँव के बाहर रहने वाले कई परिवारों को सहायता की आवश्यकता थी।
रघुवीर भी बीमार पड़ गया। उसकी देखभाल करने वाले नौकर एकएक करके गाँव छोड़कर चले गए। धन और संपत्ति होने के बावजूद वह अपने बिस्तर से उठने में असमर्थ था।
कई दिनों तक उसे उचित भोजन और दवा नहीं मिली।
एक सुबह गाँव के वैद्य ने कहा, “इन्हें तुरंत कस्बे के बड़े चिकित्सालय में ले जाना होगा। यहाँ इनका उपचार संभव नहीं है।”
लेकिन रघुवीर को ले जाने के लिए कोई तैयार नहीं हुआ। लोग स्वयं बीमारी से भयभीत थे।
तभी गाँव में एक बैलगाड़ी आई। उसके साथ कुछ लोग दवाइयाँ और भोजन लेकर पहुँचे।
उनके बीच एक युवक भी था।
वह मोहन था।
पिता को कमजोर अवस्था में देखकर मोहन की आँखें भर आईं। वह तुरंत उनके पास बैठ गया और उनका हाथ पकड़ लिया।
रघुवीर ने कठिनाई से आँखें खोलीं।
“तू… यहाँ क्यों आया है?” उसने धीमी आवाज़ में पूछा। “मैंने तो तुझे घर से निकाल दिया था।”
मोहन ने पिता के माथे पर हाथ रखते हुए कहा, “आपने मुझे घर से निकाला था, पिताजी। अपने दिल से नहीं।”
रघुवीर की आँखों से आँसू बहने लगे।
“मैंने तेरा अपमान किया। तुझे चोर कहा। फिर भी तू मेरी सहायता करने आया?”
मोहन ने उत्तर दिया, “यदि मैं भी आपके साथ वैसा ही व्यवहार करता, जैसा आपने मेरे साथ किया था, तो फिर मेरे और आपमें अंतर ही क्या रह जाता?”
मोहन अपने साथ चिकित्सक लाया था। उसने पिता के उपचार की व्यवस्था की और कई दिनों तक उनकी सेवा की।
धीरेधीरे रघुवीर स्वस्थ होने लगा।
एक दिन उसने मोहन को अपने पास बुलाया और कहा, “बेटा, मैंने जीवन भर धन को सबसे बड़ी ताकत समझा। मुझे लगता था कि जिसके पास अधिक धन है, वही सबसे सफल है। लेकिन जब मैं अकेला पड़ा था, तब मेरा धन मेरे आँसू नहीं पोंछ सका। आज तू आया, तो मुझे लगा कि मैं अभी भी किसी के लिए अपना हूँ।”
मोहन ने पिता का हाथ थाम लिया।
“पिताजी, धन कमाना गलत नहीं है। लेकिन यदि धन कमाने के चक्कर में हम इंसानियत खो दें, तो अंत में हमारे पास सब कुछ होते हुए भी कुछ नहीं बचता।”
रघुवीर फूटफूटकर रो पड़ा।
अगले दिन उसने मोहन से कहा, “क्या तू मेरे साथ वापस घर चलेगा?”
मोहन ने मुस्कराकर उत्तर दिया, “मैं आपके साथ चलूँगा, पिताजी। लेकिन एक शर्त पर।”
रघुवीर ने पूछा, “कैसी शर्त?”
मोहन बोला, “हमारे गोदाम का एक हिस्सा हमेशा उन लोगों के लिए रहेगा, जिनके घर में भोजन नहीं है। किसी को भूखा लौटना नहीं पड़ेगा।”
रघुवीर ने बिना देर किए उसकी बात मान ली।
उस दिन के बाद देवगढ़ में एक नई परंपरा शुरू हुई। हर महीने गाँव के गरीब परिवारों के लिए अनाज रखा जाता और जरूरतमंदों को भोजन दिया जाता।
कुछ वर्षों बाद रघुवीर की मृत्यु हुई। उसकी अंतिम यात्रा में पूरा गाँव शामिल हुआ। लोग उसकी संपत्ति की चर्चा नहीं कर रहे थे, बल्कि उस बदलाव को याद कर रहे थे जो उसके जीवन के अंतिम वर्षों में आया था।
मोहन ने अपने पिता की स्मृति में गाँव में एक भोजनशाला बनवाई। उसके द्वार पर एक वाक्य लिखा था—
“जिस घर से भूखा इंसान खाली हाथ लौटे, उस घर की समृद्धि अधूरी है।”
लोग उस वाक्य को पढ़ते और अपने बच्चों को उसकी कहानी सुनाते।
मोहन ने अपने पिता को कभी उनके पुराने व्यवहार के लिए अपमानित नहीं किया। उसने उन्हें एक दूसरा अवसर दिया—और उसी अवसर ने एक कठोर हृदय वाले व्यक्ति को दूसरों का दर्द समझना सिखा दिया।
सीख
किसी की गलती को सुधारने का अवसर देना कमजोरी नहीं, बल्कि महानता है। धन इंसान को समृद्ध बना सकता है, लेकिन क्षमा, दया और प्रेम ही उसे वास्तव में बड़ा बनाते हैं।