पेट्रोकेमिकल से लेकर मीडिया जगत तक राज करने के बाद अब मुकेश अंबानी टेक की दुनिया के बेताज बादशाह बनना चाहते हैं. जियो प्लेटफॉर्म्स लिमिटेड के आगामी IPO का ड्राफ्ट प्रोस्पेक्टस इसी प्लान की ओर इशारा करता है. अंबानी अपने डिजिटल साम्राज्य को सिर्फ एक आम वायरलेस कंपनी के तौर पर पेश नहीं कर रहे हैं, जो हर यूजर से महीने के महज 2.25 डॉलर कमाती है. इसके बजाय, इसे एक ऐसे ग्लोबल इनोवेशन हब के रूप में दिखाया जा रहा है, जिसके पास पूरी तरह से अपनी प्रोपराइटरी तकनीक मौजूद है. ड्राफ्ट के मुताबिक, जियो के 11,000 से ज्यादा कर्मचारी डिजिटल प्रोडक्ट डेवलपमेंट में काम कर रहे हैं. ये कंपनी की कुल वर्कफोर्स का करीब 40 फीसदी है.

प्रीमियम वैल्यूएशन की चाहत
IPO के दस्तावेज में साफ इशारा है कि कंपनी का बिजनेस मॉडल ग्लोबल टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्म्स से मेल खाता है. इसमें AIड्रिवन नेटवर्क ऑटोमेशन से लेकर इंटरनेशनल टेक्नोलॉजी लाइसेंसिंग की क्षमता शामिल है. जानकारों का मानना है कि ये पूरी पिच एक कंज्यूमर बिजनेस के लिए बेहतर वैल्यूएशन हासिल करने की कोशिश है. इसे स्पेसएक्स के IPO जैसी छवि देने का प्रयास किया जा रहा है. अगर एअरटेल के अफ्रीकी बिजनेस के आंकड़ों को हटा दें, तो 55 करोड़ सब्सक्राइबर्स के साथ जियो डेटा मार्केट में सबसे आगे है. हालांकि, लिस्टिंग की तैयारी कर रही इस कंपनी का ‘रिटर्न ऑन नेटवर्थ’ भारती एअरटेल के मुकाबले आधे से भी कम है. फिर भी बाजार को 120 से 140 अरब डॉलर के वैल्यूएशन की उम्मीद है.
AI सब्सक्रिप्शन में 28 फीसदी की ग्रोथ
भविष्य की संभावनाओं को देखकर ही शायद इस वैल्यूएशन को सही ठहराया जा सकता है. पिछले साल डिजिटल सर्विसेज, जैसे एंटरटेनमेंट कंटेंट व AI सब्सक्रिप्शन में 28 फीसदी की ग्रोथ दर्ज की गई. वहीं, सामान्य टेलीकॉम बिजनेस में सिर्फ 13 फीसदी की बढ़ोतरी हुई. यही वजह है कि मेटा व अल्फाबेट जैसे बड़े निवेशक भारतीय एक्सचेंजों पर लिस्टिंग के दौरान भी कंपनी में बने हुए हैं. सवाल ये है कि IPO निवेशकों को इससे क्या मिलेगा. कर्ज चुकाने के बाद कंपनी जुटाए गए करीब 4 अरब डॉलर का क्या करेगी. फिलहाल 6G में बड़े निवेश का वक्त दूर है. ऐसे में अंबानी जियो की टेक क्षमताओं को दुनिया के सामने साबित करना चाहते हैं.
भारत में करीब 2,400 व विदेशों में 4,400 पेटेंट फाइल
अंबानी के टेक दावों को परखने के लिए जियो के पेटेंट को समझना होगा. कंपनी ने भारत में करीब 2,400 व विदेशों में 4,400 पेटेंट फाइल किए हैं. लेकिन कुछ पेटेंट विशेषज्ञों को इस बौद्धिक संपदा की असली कीमत पर संदेह है. इनमें से करीब 85 फीसदी आवेदन पिछले चार सालों में ही किए गए हैं. गूगल पेटेंट्स पर ट्रैक किए जा सकने वाले 6,100 से ज्यादा आवेदनों में से 95 प्रतिशत अभी पेंडिंग हैं. दिलचस्प बात ये है कि 77 फीसदी फाइलिंग्स में सिर्फ एक ही व्यक्ति, चीफ टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट ऑफिसर आयुष भटनागर का नाम इन्वेंटर के तौर पर दर्ज है. ये उन्हें बहुत बड़े बजट वाली ग्लोबल कंपनियों के रिसर्चर्स से भी ज्यादा प्रोडक्टिव दिखाता है, जो थोड़ा असामान्य है.
ग्लोबल मार्केट में मिलेगी चुनौती
जियो की घरेलू पकड़ बहुत मजबूत है. भारत का फिक्स्डवायरलेस एक्सेस मार्केट 2019 के बाद तीन गुना हो गया है. अब कंपनी की नजर उन 95 देशों पर है, जहां आधी से भी कम आबादी के पास होम ब्रॉडबैंड है. ये सालाना 75 अरब डॉलर का बड़ा बाजार है. लेकिन अगर कोई विदेशी ऑपरेटर लागत कम करने के लिए जियो की तकनीक अपनाता भी है, तो नोकिया, एरिक्सन, हुवावे या सैमसंग जैसी पुरानी कंपनियों से मुकाबला आसान नहीं होगा. एरिक्सन 27,000 शोधकर्ताओं व 5 अरब डॉलर के सालाना R&D बजट के साथ काम करती है. वहीं, जियो का पूरा वेतन बिल ही 700 मिलियन डॉलर है. पेटेंट हासिल करना सिर्फ एक कानूनी प्रक्रिया है. असली बात उस तकनीक की कमर्शियल वैल्यू है, जिसे साबित करना अंबानी के लिए अभी बाकी है.