इलेक्ट्रिक कार खरीदने का सबसे बड़ा फायदा कम रनिंग कॉस्ट को माना जाता है. पेट्रोलडीजल का खर्च नहीं होता, इंजन ऑयल बदलने की जरूरत नहीं पड़ती और कार में कई ऐसे पार्ट्स भी नहीं होते, जिनकी सर्विस करानी पड़ती है. लेकिन इलेक्ट्रिक कार के मालिकों के सामने एक ऐसा खर्च है, जिस पर खरीदारी के समय ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता. यह खर्च है टायर का.

कई मामलों में इलेक्ट्रिक कारों के टायर पेट्रोल या डीजल कारों के मुकाबले करीब 20 से 30 प्रतिशत तक जल्दी घिस सकते हैं. भारत में खराब सड़कें, गड्ढे, स्पीड ब्रेकर और बारबार रुकनेचलने वाला ट्रैफिक इस समस्या को और बढ़ा सकता है. यानी अगर आप Tata Nexon EV, MG Windsor EV या Hyundai Ioniq 5 जैसी इलेक्ट्रिक कार चलाते हैं, तो टायर की देखभाल को नजरअंदाज करना जेब पर भारी पड़ सकता है.
EV के टायर जल्दी क्यों घिसते हैं?
इसके पीछे मुख्य रूप से तीन कारण हैं. टायर निर्माता Michelin के मुताबिक, पहला है कार का ज्यादा वजन. इलेक्ट्रिक कारों में बड़ी बैटरी लगी होती है, जिसका वजन काफी ज्यादा होता है. यह ज्यादा वजन हर समय टायर पर दबाव डालता है. मोड़ लेते समय, ब्रेक लगाते समय और गाड़ी चलाते समय टायर को ज्यादा भार संभालना पड़ता है.
दूसरी बड़ी वजह है इलेक्ट्रिक मोटर का इंस्टेंट टॉर्क. पेट्रोल इंजन में पावर धीरेधीरे बढ़ती है, लेकिन इलेक्ट्रिक मोटर शुरुआत से ही काफी टॉर्क दे सकती है. ट्रैफिक सिग्नल पर तेजी से गाड़ी बढ़ाने या एक्सप्रेसवे पर अचानक स्पीड बढ़ाने से टायर पर ज्यादा दबाव पड़ता है. अगर ऐसा रोजाना कई बार हो, तो लंबे समय में टायर तेजी से घिस सकते हैं.
तीसरी वजह है रीजेनरेटिव ब्रेकिंग. EV में गाड़ी को धीमा करने के लिए मोटर का इस्तेमाल भी किया जाता है. इससे बैटरी में ऊर्जा वापस जाती है. इस प्रक्रिया में टायर भी गाड़ी की रफ्तार कम करने में अहम भूमिका निभाते हैं. इसलिए इलेक्ट्रिक कारों में टायर पर होने वाला काम सामान्य कार से अलग हो जाता है.
भारतीय EV मालिकों की जेब पर कितना असर?
टायर जल्दी बदलने पड़ें तो EV की वास्तविक मेंटेनेंस लागत बढ़ सकती है. उदाहरण के तौर पर Tata Nexon EV के चार टायर बदलने में करीब 14,000 से 24,000 रुपये खर्च हो सकते हैं. MG Windsor जैसे मॉडल के लिए यह खर्च करीब 20,000 से 36,000 रुपये तक पहुंच सकता है. वहीं Hyundai Ioniq 5 या BYD Atto 3 जैसी प्रीमियम इलेक्ट्रिक कारों में चार नए टायरों का खर्च 40,000 से 80,000 रुपये तक हो सकता है. कीमत टायर के ब्रांड और स्पेसिफिकेशन पर निर्भर करती है.
अगर किसी पेट्रोल कार के टायर सामान्य तौर पर 50,00060,000 किलोमीटर तक चल जाते हैं, तो EV में समान ड्राइविंग परिस्थितियों में यह दूरी कम हो सकती है. इसलिए EV खरीदते समय सिर्फ बिजली और सर्विस का खर्च देखना पर्याप्त नहीं है.
टायर कंपनियां भी कर रही हैं बदलाव
टायर कंपनियां EV की जरूरत को देखते हुए नए तरह के टायर तैयार कर रही हैं. इनमें ऐसे रबर कंपाउंड इस्तेमाल किए जा रहे हैं, जो कम रोलिंग रेजिस्टेंस के साथ ज्यादा टिकाऊ हों. MRF, CEAT और Apollo जैसी भारतीय कंपनियों के अलावा Michelin, Bridgestone और Goodyear जैसी ग्लोबल कंपनियां भी EV के लिए खास टायर विकसित कर रही हैं. कुछ टायरों में ज्यादा वजन संभालने के लिए XL या HL रेटिंग दी जाती है. कुछ प्रीमियम EV टायरों में अंदर की तरफ फोम भी लगाया जाता है, जिससे सड़क से आने वाला शोर कम होता है. भविष्य में सेल्फसीलिंग टायर भी ज्यादा आम हो सकते हैं, जो छोटे पंचर को खुद सील करने में सक्षम होंगे.
EV मालिक कैसे बचा सकते हैं पैसा?
EV चलाने वालों को कुछ आसान बातों का ध्यान रखना चाहिए. टायर प्रेशर को महीने में एक बार नहीं बल्कि हर हफ्ते चेक करना बेहतर है. करीब 10,000 किलोमीटर पर टायर रोटेशन कराने से चारों टायरों की घिसावट को ज्यादा समान रखा जा सकता है. करीब 15,000 किलोमीटर पर व्हील अलाइनमेंट की जांच भी करानी चाहिए, खासकर अगर कार किसी बड़े गड्ढे से तेज झटके के साथ गुजरी हो. सामान्य तौर पर अलाइनमेंट चेक और करेक्शन में करीब 2,000 से 4,000 रुपये लग सकते हैं. शहर में अचानक तेज एक्सीलरेशन से बचना भी फायदेमंद है. धीरे और स्मूथ तरीके से गाड़ी चलाने से टायर पर पड़ने वाला दबाव कम किया जा सकता है. टायर बदलते समय कंपनी की बताई लोड रेटिंग जरूर देखें. अगर कार के लिए XL या HL टायर बताए गए हैं, तो सिर्फ पैसे बचाने के लिए सामान्य रेटिंग वाला टायर नहीं लगाना चाहिए.