भारतीय शेयर बाजार में शुक्रवार का दिन निवेशकों के लिए उतारचढ़ाव और असमंजस से भरा रहा। पिछले कुछ कारोबारी सत्रों से लगातार जारी गिरावट के बाद हफ्ते के अंतिम दिन बाजार ने एक सकारात्मक शुरुआत की थी, जिससे निवेशकों के चेहरे पर कुछ राहत की उम्मीद जगी थी। आईटी सेक्टर के शेयरों में हुई लिवाली के दम पर बीएसई का प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स और एनएसई का निफ्टी हरे निशान में खुले थे। शुरुआती कुछ पलों के लिए बाजार की यह तेजी काफी उत्साहजनक लग रही थी, लेकिन यह राहत ज्यादा देर तक टिक नहीं पाई और देखते ही देखते बाजार में सुस्ती छा गई तथा कीमतें नीचे फिसलने लगीं।

कारोबार आगे बढ़ने के साथ ही अंतरराष्ट्रीय बाजारों से मिले कमजोर संकेतों और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने बाजार के मूड को बिगाड़ दिया। स्थिति यह हो गई कि जो बाजार हरे निशान के साथ खुला था, वह कुछ ही घंटों के भीतर लाल निशान में तब्दील हो गया। बैंक निफ्टी जो शुरुआत में मामूली बढ़त के साथ खुला था, वह तेजी से गिरते हुए दो सौ से अधिक अंकों के नुकसान के साथ रेड जोन में चला गया। इसी प्रकार सेंसेक्स और निफ्टी भी शुरुआती बढ़त को बरकरार नहीं रख पाए और फिसलकर लाल निशान में आ गए। इस अचानक आए बदलाव ने निवेशकों को सतर्क होने पर मजबूर कर दिया, क्योंकि वैश्विक स्तर पर आर्थिक अनिश्चितताओं का साया भारतीय बाजारों पर साफ तौर पर दिखाई दे रहा था।
बाजार में इस सुस्ती और गिरावट के पीछे कई महत्वपूर्ण कारण जिम्मेदार रहे, जिनमें सबसे बड़ा मुद्दा कच्चे तेल की ऊंची कीमतें हैं। ब्रेंट क्रूड ऑयल लगभग 114 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा है। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है, ऐसे में तेल की कीमतें बढ़ने से देश के व्यापार घाटे पर भारी दबाव पड़ता है और आयात बिल बढ़ जाता है। इसके साथ ही घरेलू स्तर पर मुद्रास्फीति और कंपनियों की परिचालन लागत बढ़ने का खतरा भी पैदा हो जाता है। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के महंगे होने की खबर आते ही निवेशकों ने बिकवाली बढ़ा दी और बाजार की चाल सुस्त पड़ गई।
वैश्विक मोर्चे पर भी स्थितियां बहुत अनुकूल नहीं थीं। एशियाई बाजारों में कमजोरी का रुख बना हुआ था और अमेरिकी शेयर बाजार भी पिछले सत्र में गिरावट के साथ बंद हुए थे। दुनिया भर के बाजारों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई तकनीक पर कंपनियों द्वारा बढ़ाए जा रहे भारीभरकम खर्च और महंगे ईंधन को लेकर चिंता का माहौल बना हुआ है। इन तमाम वैश्विक कारकों ने निवेशकों की धारणा को प्रभावित किया। इसके अलावा घरेलू स्तर पर कंपनियां अपनी सितंबर तिमाही के वित्तीय नतीजे जारी कर रही हैं, और इन नतीजों को लेकर भी बाजार में एक अनिश्चितता का माहौल है, क्योंकि निवेशक यह देखना चाहते हैं कि चुनौतीपूर्ण कारोबारी माहौल में कंपनियों का प्रदर्शन कैसा रहा है।
इन तमाम नकारात्मक और दबाव वाले कारकों के बीच बाजार के लिए कुछ राहत भरी और सकारात्मक उम्मीदें भी मौजूद हैं। मुद्रा बाजार में भारतीय रुपये ने हल्की मजबूती के साथ शुरुआत की और अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया थोड़ा संभलकर खुला। इसके अलावा, दस साल के अमेरिकी बॉन्ड की यील्ड में आई तेज गिरावट ने भी बाजार को थोड़ा संबल दिया है। इन आर्थिक संकेतकों के सुधरने से विदेशी संस्थागत निवेशकों की ओर से होने वाली बिकवाली में कमी आने की उम्मीद बंधती है, जिससे आने वाले दिनों में शेयर बाजार को कुछ हद तक सहारा मिल सकता है।
बाजार के जानकारों के अनुसार आने वाले सप्ताह में निवेशकों को एक बड़ा वित्तीय सहारा मिल सकता है। हाल ही में जियो प्लेटफॉर्म्स के आईपीओ को लेकर निवेशकों जबरदस्त प्रतिक्रिया देखने को मिली थी और पिछले दो दिनों के दौरान इस आईपीओ को भारीभरकम बोलियां प्राप्त हुई थीं। रिपोर्ट्स के मुताबिक शेयरों के अलॉटमेंट की प्रक्रिया पूरी होने के बाद इस प्रक्रिया से तीन लाख करोड़ रुपये से अधिक की भारी राशि वापस बाजार में लौटने की संभावना है। जब यह नकदी बाजार में प्रवाहित होगी, तो इससे लिक्विडिटी बढ़ेगी और शेयरों को जरूरी सपोर्ट मिलने की उम्मीद है, जिससे कारोबार में दोबारा तेजी आ सकती है।
शेयर बाजार की इस चाल के बीच निवेशकों को काफी समझदारी से काम लेने की जरूरत है। यदि आने वाले सत्रों में बाजार में तेजी लौटती है, तो उसकी मुख्य अगुवाई देश की बड़ी और दिग्गज कंपनियों यानी लार्जकैप शेयरों द्वारा किए जाने की उम्मीद है। मजबूत फंडामेंटल वाली बड़ी कंपनियों के शेयरों में उचित कीमत पर निवेश के अवसर तलाशना इस समय समझदारी भरा कदम हो सकता है। इसके विपरीत, मिडकैप और विशेषकर स्मॉलकैप शेयरों पर दबाव बने रहने की पूरी आशंका है, क्योंकि इन छोटे शेयरों के वैल्यूएशन में पहले जो उछाल आया था, वह कई मामलों में कंपनियों के वास्तविक प्रदर्शन के बजाय बाजार में आए अतिरिक्त कैश फ्लो की वजह से था।
मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए निवेशकों के लिए यह समय आंख मूंदकर निवेश करने का नहीं है, बल्कि पूरी सतर्कता बरतने का है। एक तरफ जहाँ आईटी शेयरों की खरीदारी, रुपये की मजबूती और आगामी नकदी प्रवाह जैसी सकारात्मक चीजें बाजार को थामने का काम कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ महंगा कच्चा तेल, वैश्विक बाजारों की मंदी और तिमाही नतीजों का दबाव जोखिम को लगातार बढ़ा रहा है। निवेशकों को चाहिए कि वे केवल शुरुआती रुझानों या तेजी को देखकर कोई भी फैसला न लें, बल्कि हर कंपनी के बुनियादी कामकाज, उसकी कमाई और संभावित जोखिमों का बारीकी से आकलन करने के बाद ही अपने निवेश के संबंध में कोई ठोस निर्णय लें।