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क्या राजनीति में परिवार भी भरोसे की गारंटी नहीं? बसपा सुप्रीमो मायावती के फैसले से उठा सवाल​

2027 के उत्तर प्रदेश के नजदीक आते विधानसभा के चुनावों के मौके पर बसपा की ताकत और उसकी तैयारियां राजनीति के जानकारों के बीच चर्चा का विषय हैं. 2007 में प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सरकार बना चुकी बसपा बाद के चार लोकसभा और तीन विधानसभा चुनाव में लगातार पिछड़ती गई. फिलहाल लोकसभा में पार्टी […]

2027 के उत्तर प्रदेश के नजदीक आते विधानसभा के चुनावों के मौके पर बसपा की ताकत और उसकी तैयारियां राजनीति के जानकारों के बीच चर्चा का विषय हैं. 2007 में प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सरकार बना चुकी बसपा बाद के चार लोकसभा और तीन विधानसभा चुनाव में लगातार पिछड़ती गई. फिलहाल लोकसभा में पार्टी शून्य पर है. 2022 के विधानसभा चुनाव में राज्य में जीती इकलौती सीट से चुने गए विधायक की मृत्यु के कारण उत्तर प्रदेश विधानसभा में भी अब उसका कोई प्रतिनिधि नहीं है. आसन्न चुनाव के नजरिए से राज्य में भाजपा, सपा और कांग्रेस जमीनी स्तर पर अपने कैडर को सक्रिय और संगठन को मजबूत करने की कोशिश में हैं, वहीं मायावती अपने राजनीतिक वारिस के चयन में उलझी हुई हैं.

अपने भतीजे आकाश आनन्द को कभी वे आगे बढ़ाती हैं तो कभी अपरिपक्व बता घर बिठा देती हैं. आकाश के बाद अब उन्होंने उसके छोटे भाई ईशान को आगे किया है. नहीं पता कि ईशान पर उनका भरोसा कब तक बना रहेगा?

पल में तोलापल में माशा

विभिन्न राजनीतिक दलों पर एक ही परिवार के वर्चस्व की कहानियों में अब कुछ नया नहीं रह गया है. लेकिन बसपा की कहानी इस मायने में जुदा है कि उसकी प्रमुख मायावती की अपने राजनीतिक वारिस को लेकर राय पल में तोलापल में माशा होती रहती है. अपने भतीजे आकाश आनंद को वे किसी पल आगे करती हैं. फिर अपरिपक्व बताते हुए हाशिए पर डाल देती हैं. कुछ अरसे बाद फिर से उन्हें उन्हीं में लीडरशिप की खूबियां नज़र आती हैं. फिर जल्दी ही वे किनारे कर दिए जाते हैं. यह सिलसिला जून 2019 से चल रहा है.

मायावती कभी भतीजे आकाश आनंद आगे करती हैं, फिर अपरिपक्व बताते हुए हाशिए पर डाल देती हैं. फोटो: PTI

जून 2019 में आकाश को मायावती ने नेशनल क्वार्डिनेटर बनाया था.10 दिसंबर 2023 को मायावती ने उन्हें अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित किया और 2024 के लोकसभा चुनाव के में पार्टी के युवा चेहरे के तौर पर पेश किया. इसी चुनाव के दौरान आकाश के सीतापुर की सभा में भाषण पर विवाद के बाद मई 2024 में मायावती को वे अचानक अपरिपक्व नज़र आए. तुरंत ही पद से छुट्टी के साथ वे घर बिठा दिए गए. हालांकि महीने भर बाद ही उनकी वापसी हो गई.

मार्च 2025 में बुआ जी फिर नाराज हुईं. आकाश के ससुर अशोक सिद्धार्थ का पार्टी से निष्कासन हुआ. आकाश पर भी गुस्सा फूटा. इस बार मायावती ने आकाश को नेशनल क्वार्डिनेटर पद से ही नहीं हटाया बल्कि पार्टी से भी बाहर कर दिया. हालांकि महीने भर के भीतर ही आकाश को माफी मिल गई और उनके ओहदे नेशनल क्वार्डिनेटर के आगे चीफ भी जोड़ दिया गया. अगस्त 2025 में उन्हें एक और प्रमोशन मिला और वे नेशनल कन्वेनर बना दिए गए. स्पष्ट रूप से पार्टी के लोगों के लिए मायावती के बाद आकाश सबसे महत्वपूर्ण बन चुके थे लेकिन 3 सितंबर को मायावती को एक बार फिर भतीजा आनंद “अपरिपक्व” नज़र आया और उन्हें पार्टी की सभी जिम्मेदारियों से छुट्टी दे दी गई.

3 सितंबर को मायावती ने एक बार फिर आकाश आनंद की छुट्टी कर दी. फोटो: PTI

फर्क है इस बार की बेदखली

पार्टी में तीसरी बार की आकाश की बेदखली इस मायने में अलग है कि मायावती ने उनके छोटे भाई ईशान आनंद को आगे किया है. 27 साल के ईशान अपने बड़े भाई की तरह इंग्लैंड में पढ़े हैं. लीगल स्ट्डीज में ग्रेजुएट हैं. आकाश की राजनीतिक परिपक्वता पर 2019 से 2026 के बीच मायावती का भरोसा बनता और बिगड़ता रहा है. पहले मौकों पर आकाश आगे बढ़ाए और फिर थोड़ेथोड़े अंतराल पर घर बिठा दिए जाते थे. उनकी जगह कोई अन्य नहीं लेता था. इस बार ईशान को मुख्य सेक्टर प्रभारी बनाते हुए 15 राज्यों का जिम्मा दिया गया है. इन राज्यों में उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड शामिल नहीं है.

बुआ ने उन्हें जिम्मेदारी दी है और उनके कामकाज की समीक्षा पिता राष्ट्रीय उपाध्यक्ष आनंद कुमार को करनी रहेगी. सब कुछ परिवार के भीतर तय होना है. ईशान कितनी दूर तक चलेंगे? या फिर आकाश फिर कब बुला लिए जाएंगे? या दोनों भाई मायावती का हाथ बंटाएंगे? यह सिर्फ और सिर्फ मायावती ही जान और बता सकती हैं.

27 साल के ईशान अपने बड़े भाई आकाश की तरह इंग्लैंड में पढ़े हैं.

नई दलित ताकत की चुनौती

1989 में 9.90 फीसद वोट और दो सीटों से शुरू बसपा का जीत का सफर 2009 आने तक 27.42 फीसद वोट और लोकसभा में 20 सीट तक पहुंचा था. 2024 में यह लुढ़ककर 9.15 फीसद वोट और शून्य सीट पर पहुंच गया. 2007 में उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने वाली बसपा को उत्तर प्रदेश विधानसभा में सिर्फ एक सीट पर जीत मिली थी. 2024 के लोकसभा चुनाव में बसपा उम्मीदवारों के खुद के जीतने की नहीं बल्कि इस बात की चर्चा होती थी कि वे सपाकांग्रेस का रास्ता रोकने और भाजपा के लिए कितने मददगार होंगे?

हारजीत चुनाव का हिस्सा है लेकिन जब लड़ने की मंशा पर सवाल उठने लगें तो ऐसे उम्मीदवारों/दलों की वोट कटवा के रूप में शिनाख्त होने लगती है. क्या बसपा उसी राह पर है? विधानसभा और लोकसभा चुनाव के मुद्दे आमतौर पर अलग होते हैं, लेकिन हर अगले चुनाव के मौके पर बीते चुनाव की चर्चा जरूर होती है. 2024 में पार्टी को सिर्फ करारी शिकस्त ही नहीं मिली थी बल्कि उसके परम्परागत दलित वोट बैंक के लिए एक दूसरी दलित ताकत के उभार ने नई चुनौती खड़ी की. इस चुनाव में आजाद समाज पार्टी के चंद्रशेखर आजाद न केवल नगीना से लंबे अंतर से जीते थे अपितु इस सीट पर बसपा को सिर्फ 13,212 वोट मिले थे. इस चुनाव में उत्तर प्रदेश की जिन 79 सीटों पर बसपा मैदान में उतरी थी , उनमें किसी सीट पर पार्टी दूसरे स्थान पर भी नहीं पहुंच सकी थी. 15 सीटों पर उसे पचास हजार से भी कम वोट मिले थे.

2024 के लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी खाता खोलने में असमर्थ रही.

करिश्मे पर सवाल

2009 में मायावती प्रधानमंत्री पद की दावेदार थीं. 2024 के लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी खाता खोलने में असमर्थ रही. 2007 में उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत की उन्होंने सरकार बनाई और 2022 में विधानसभा की एक सीट पर वे सिमट गईं. लगातार शिकस्त झेल रही बसपा 2027 में क्या कोई करिश्मा दिखा पाएगी? दलित वोटरों पर एकाधिकार का दावा करने वाली मायावती कभी इस वोट बैंक के जरिए अन्य जातीय समूहों को अपनी ओर खींचती थीं. लेकिन वे अब अपने परम्परागत वोटरों को भी नहीं सहेज पा रही हैं.

उत्तर प्रदेश के पिछले तीन विधानसभा चुनाव और इसी अवधि के तीन लोकसभा चुनावों की शिकस्त ने मायावती की छवि पर जबरदस्त आघात किया है. चुनाव में पराजय किसी नेता की राजनीतिक यात्रा का अंत नहीं होता. लेकिन ऐसी पार्टियां जो किसी एक नेता के करिश्में पर टिकी होती हैं , वहां लगातार हार उस नेता की लोकप्रियता पर सवाल खड़े करते हुए समर्थकों को निराश करती है. मायावती की राजनीतिक यात्रा ऐसे ही खराब दौर से गुजर रही है.

गठबंधन ने दिया फायदा !

मायावती को हमेशा शिकायत रही है कि गठबंधन की हालत में बसपा के वोट तो सहयोगी पार्टी को ट्रांसफर हो जाते हैं, लेकिन उनके वोट बसपा को नहीं मिलते. हालांकि मायावती के इस दावे को 2019 के लोकसभा चुनाव के नतीजों ने गलत साबित किया था. इस चुनाव में उत्तर प्रदेश में बसपा और सपा का गठबंधन हुआ था. 2014 के लोकसभा चुनाव में मायावती अकेले लड़ीं और शून्य पर रहीं. 2019 के गठबंधन में राज्य की दस सीटें उनकी पार्टी जीत गई थी. सपा को सिर्फ पांच सीटें मिलीं थीं. फिर भी मायावती ने अखिलेश यादव की क्षमता पर सवाल उठाते हुए गठबंधन तोड़ दिया था. 2022 का उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव अकेले लड़कर बसपा इकलौती सीट पर थम गई थी, जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव में उसकी स्लेट साफ थी.

बसपा कार्यकर्ताओं की भी मायावती तक पहुंच आसान नहीं है. फोटो: PTI

कांशीराम की छीजती विरासत

बसपा को सबसे बड़ी जीत 2007 में उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनावों में मिली थी. उस जीत में ब्राह्मण, मुस्लिम और पिछड़ों के बीच से मिले समर्थन की बड़ी भूमिका थी. इस वोट के साथ मायावती के दलित और खासतौर से जाटव वोट के जुड़ाव ने उनकी जीत की इबारत लिख दी थी. आगे वे इसे कभी नहीं दोहरा सकीं तो इसकी वजह थी कि वे सर्वजन के उस वोट को सहेज नहीं पाईं.

बसपा के हिस्से का अकेला दलित वोट दूसरों की जीत या हार की तो वजह बन सकता है, लेकिन खुद की जीत के लिए काफी नहीं होता. मायावती का शक्ति केंद्र उत्तर प्रदेश रहा है. यहां की ताकत कुछ अन्य राज्यों में उन्हें छिट पुट सफलताएं दिलाती रही है. लेकिन उत्तर प्रदेश उन्हें चुनावदरचुनाव निराश कर रहा है. क्यों? इसकी वजहों में पार्टी चलाने का उनका तौरतरीका भी है. बेशक दलितवंचित उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी रहें हैं लेकिन उनके बीच मायावती की मौजूदगी और संवाद दुर्लभ है.

चुनाव के दिनों के अलावा मायावती की राजनीतिक सक्रियता बयानों तक सीमित रहती है. चुनाव में भी वे केवल बड़ी रैलियों को संबोधित करना पसंद करती हैं. पार्टी कार्यकर्ताओं की भी उन तक पहुंच आसान नहीं है. जनता के बीच सबसे कम पहुंचने वाले नेताओं में मायावती अगली कतार में हैं. संगठन में फेरबदल वे तेजी से करती हैं. कभी भी किसी की सिर्फ पद से ही नहीं पार्टी से भी छुट्टी हो सकती है. कांशीराम ने केवल वोटरों की ही नहीं बल्कि समर्पित कैडर की समृद्ध विरासत मायावती को सौंपी थी. मायावती काफी कुछ खो चुकी हैं. वोटरों के बीच पहचाने जाने वाले तमाम चेहरे मायावती का साथ छोड़ चुके हैं. भतीजा आकाश आनंद तक उनका भरोसा कायम नहीं रख सका.

अपनी से ज्यादा दूसरे की जीतहार में भूमिका की चर्चा

भाजपा के उभार के साथ मायावती और बसपा के सामने अलग किस्म की चुनौती सामने आई है. चुनाव में उन पर भाजपा की अपरोक्ष मदद के आरोप लगते हैं. विरोधी उन्हें भाजपा की बी टीम के तौर पर भी प्रचारित करते हैं. यहां तक कि भाजपा के इशारे पर उनके उम्मीदवार चुनने या फिर बदलने तक की कथाएं चुनाव अभियान बीच तैरती रहती हैं. उत्तर प्रदेश में उनके और सपा के बीच मुस्लिम वोटरों को पाले में करने की होड़ रहती है. इस दौड़ में मायावती काफी पीछे छूट चुकी हैं.

सपा मुस्लिम वोटरों के बीच यह धारणा कायम करने में कामयाब रही है कि बसपा कभी भी भाजपा का साथ कर सकती है. यह भी कि बसपा इतनी ताकतवर नहीं है कि देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में भाजपा को रोक सके. बसपा की इस कमजोरी ने अन्य भाजपा विरोधी वोटरों के बीच भी उसकी पहुंच मुश्किल की है. यहां तक कि परम्परागत दलित समर्थकों के बीच भी अपने उम्मीदवार की जीत या फिर मुख्य मुकाबले में होने का भरोसा दिलाने की असफलता के कारण ,उसका आधार तेजी से सिमट रहा है. पार्टी उस दौर से गुजर रही है , जब उसकी चर्चा अपनी जीत से ज्यादा, दूसरी पार्टी के उम्मीदवारों की जीतहार में भूमिका को लेकर होती है. फिलहाल इससे उबरने के लिए मायावती कोई गंभीर कोशिश करती नज़र नहीं आ रहीं.

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संपादकीय टीम

खबर मंकी की अनुभवी एडिटोरियल डेस्क। हमारे लेखक और संपादक दिन-रात निष्पक्ष, सटीक और तीव्र समाचार आप तक पहुँचाने के लिए काम करते हैं।

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