बुधवार, 14 अक्टूबर 2026 ब्रेकिंग
जयम्मा के किरदार से प्रेरित हुईं Rashmika Mandanna, अब 400 परिवारों के लिए उठाया बड़ा कदम​ | दिवाली से पहले रेलवे कर्मचारियों को बड़ा तोहफा, मिलेगा 78 दिन का बोनस​ | Solar Panel Repair: सोलर पैनल खराब होने पर पूरा सिस्टम बदलने की जरूरत नहीं, जानें क्या करें​
दिल्ली 32°C ☀️ |
728 x 90 Advertisement
विज्ञापन
728 x 90 Advertisement
Viral

कोलकाता कैसे बना दुर्गा पूजा का गढ़? जमींदारों से आंगन से निकला उत्सव दुनियाभर में पहचान बन गया​

शारदीय नवरात्र चल रहा है. इस दौरान मां दुर्गा की पूजा की जाती है. पश्चिम बंगाल में यह बेहद भव्य तरीके से मनाया जाने वाला सांस्कृतिक उत्सव है. दुर्गा पूजा केवल देवी की आराधना नहीं है. यह लोगों, कला और परंपरा का साझा उत्सव है. इसमें मूर्तिकारों का कौशल, कलाकारों की कल्पना, ढाक की धुन […]

शारदीय नवरात्र चल रहा है. इस दौरान मां दुर्गा की पूजा की जाती है. पश्चिम बंगाल में यह बेहद भव्य तरीके से मनाया जाने वाला सांस्कृतिक उत्सव है. दुर्गा पूजा केवल देवी की आराधना नहीं है. यह लोगों, कला और परंपरा का साझा उत्सव है. इसमें मूर्तिकारों का कौशल, कलाकारों की कल्पना, ढाक की धुन और समुदायों का सहयोग शामिल है. यूनेस्को की मान्यता ने इस जीवित परंपरा को वैश्विक पहचान दी है. पश्चिम बंगाल की दुर्गा पूजा की सबसे बड़ी ताकत यही है कि यह अतीत की परंपराओं को वर्तमान के जीवन से जोड़ती है.

हर साल पंडाल बदलते हैं, नए विचार आते हैं और उत्सव फिर से लोगों को साथ लाता है. आइए, इसी बहाने समझते हैं की कोलकाता दुर्गा पूजा का गढ़ कैसे बनता गया? यूनेस्को तक ने इसे क्यों दी मान्यता?

आस्था से शुरू होने वाला उत्सव

दुर्गा पूजा पश्चिम बंगाल का सबसे खास त्योहार है. यह मां दुर्गा की आराधना का पर्व है. साथ ही यह कला, संस्कृति और सामूहिक जीवन का उत्सव भी है. हर साल शरद ऋतु में, आम तौर पर सितंबर या अक्टूबर में, बंगाल के शहर और गांव पूजा की तैयारियों में जुट जाते हैं. कोलकाता में इन दिनों सड़कें रोशनी से सजती हैं. मोहल्लों में पंडाल बनते हैं. ढाक की गूंज सुनाई देती है. लोग परिवार और दोस्तों के साथ पंडाल घूमते हैं. इस तरह पूजा घरों और मंदिरों तक सीमित नहीं रहती. पूरा शहर उत्सव का हिस्सा बन जाता है.

दुर्गा पूजा घरों और मंदिरों तक सीमित नहीं रहती, पूरा शहर उत्सव का हिस्सा बन जाता है. फोटो: PTI

बंगाल में पूजा की पुरानी परंपरा

बंगाल में दुर्गा पूजा की परंपरा 16वीं17वीं सदी से चली आ रही है. कोलकता के बरिशा इलाके में सबर्ण रॉय चौधरी परिवार की पूजा का आरंभ साल 1610 में माना जाता है. पहले कई पूजा के आयोजन बड़े और संपन्न परिवारों के घरों में होते थे. पूजा उनके आंगन या ठाकुर दालान में मनाई जाती थी. समय के साथ यह परंपरा घरों से निकलकर सार्वजनिक जीवन में आई. सार्वजनिक पूजा ने इस पर्व का रूप बदल दिया.

मोहल्ले के लोग मिलकर आयोजन करने लगे. वे चंदा जुटाते, पंडाल बनाते और पूजा की व्यवस्था संभालते. इससे आम लोगों को भी पूजा में भाग लेने का अवसर मिला. आज भी सामूहिक भागीदारी बंगाल की दुर्गा पूजा की पहचान है. हुगली जिले के गुप्तिपाड़ा में 18वीं सदी के उत्तरार्ध में बारोयारी पूजा की शुरुआत से जुड़ी एक प्रचलित परंपरा मिलती है. कोलकाता में शुरुआती सर्वजनिन पूजा 1910 में भवानीपुर में आयोजित हुई.

दुर्गा पूजा की तैयारी त्योहार से कई महीने पहले शुरू हो जाती है. फोटो: PTI

पंडाल बने कला के मंच

पश्चिम बंगाल की दुर्गा पूजा को खास बनाने में पंडालों की बड़ी भूमिका है. हर साल कलाकार और कारीगर नए विचारों पर काम करते हैं. कहीं पंडाल पारंपरिक मंदिर जैसा दिखता है. कहीं उसकी सजावट लोककला, प्रकृति या किसी सामाजिक विषय से प्रेरित होती है. बांस, कपड़े, मिट्टी, लकड़ी और अन्य सामग्री से अस्थायी ढांचे बनाए जाते हैं. रोशनी और सजावट से ये पंडाल दर्शकों के लिए आकर्षक अनुभव बनाते हैं. लोग केवल पूजा करने नहीं आते. वे अलगअलग पंडालों की कला देखने और उनके पीछे की कल्पना समझने भी आते हैं. इसी वजह से पूजा के दिनों में शहर खुली कलादीर्घा जैसा लगता है. पंडाल थोड़े समय के लिए बनते हैं, लेकिन उन्हें बनाने में अनेक लोगों का कौशल और मेहनत शामिल होती है.

दुर्गा पूजा के दौरान अलगअलग हिस्सों में सांस्कृतिक प्रोग्राम आयोजित किए जाते हैं. फोटो: PTI

मूर्तिकारों और कारीगरों का योगदान

दुर्गा पूजा की तैयारी त्योहार से कई महीने पहले शुरू हो जाती है. मूर्तिकार देवी दुर्गा और उनके परिवार की प्रतिमाएं बनाते हैं. मिट्टी को आकार देना, प्रतिमा को सुखाना, रंगना और सजाना, हर चरण में अनुभव और धैर्य की जरूरत होती है. कोलकाता का कुम्हार टोली इलाका मूर्ति निर्माण के लिए जाना जाता है. यहां कलाकार पीढ़ियों से अपने हुनर को आगे बढ़ाते आए हैं. प्रतिमाओं के साथ पंडालों की सजावट, रोशनी, संगीत और अन्य कामों में भी अनेक कारीगर और कलाकार जुटते हैं. इस तरह त्योहार पारंपरिक कौशल को जीवित रखने और स्थानीय लोगों को काम देने में मदद करता है.

कोलकाता का कुम्हार टोली इलाका मूर्ति निर्माण के लिए जाना जाता है. फोटो: PTI

समुदाय और साझा उत्सव

दुर्गा पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठानों का नाम नहीं है. यह लोगों के मिलने और साथ समय बिताने का अवसर भी है. परिवार नए कपड़े पहनते हैं. लोग दोस्तों और रिश्तेदारों से मिलते हैं. वे पंडाल घूमते हैं और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आनंद लेते हैं. स्थानीय पूजा समितियां आयोजन की जिम्मेदारी उठाती हैं. मोहल्ले के लोग सजावट, व्यवस्था और कार्यक्रमों में सहयोग करते हैं. यह साझा काम लोगों को जोड़ता है.

अलगअलग उम्र, वर्ग और पृष्ठभूमि के लोग एक ही उत्सव में भाग लेते हैं. पूजा के दिनों में भोजन और बाजार भी उत्सव का हिस्सा बन जाते हैं. शहर में दुकानों और खानेपीने के ठेलों पर चहलपहल बढ़ती है. इसलिए दुर्गा पूजा का असर धार्मिक स्थलों से आगे, रोजमर्रा के सार्वजनिक जीवन तक दिखाई देता है.

दुर्गा पूजा के मौके पर पूरा कोलकाता सजा हुआ नजर आता है. फोटो:PTI

यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची

यूनेस्को ने 2021 में कोलकाता में दुर्गा पूजा को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया. यह मान्यता पूजा की जीवित परंपरा, कला, शिल्प और सामुदायिक भागीदारी को पहचान देती है. अमूर्त सांस्कृतिक विरासत किसी इमारत या स्मारक तक सीमित नहीं होती. इसमें वे परंपराएं, कौशल और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियां शामिल होती हैं जिन्हें समुदाय पीढ़ीदरपीढ़ी आगे बढ़ाते हैं. दुर्गा पूजा में मूर्तियां बनाने का शिल्प, ढाक बजाना, पूजा के अनुष्ठान और पंडाल निर्माण इसके उदाहरण हैं. यूनेस्को के अनुसार, पूजा से पहले कारीगर गंगा की मिट्टी से देवी और उनके परिवार की प्रतिमाएं बनाते हैं. उत्सव के दौरान लोग पंडालों को देखने के लिए शहर में घूमते हैं. इस मौके पर कला और धार्मिक अभिव्यक्ति सार्वजनिक जीवन का हिस्सा बन जाती है.

Kolkata is glowing up for Durga Puja… This year Durga Puja is going to be the Best Puja ever… https://t.co/6m5qtFqnbA

— Vineeta Singh 🇮🇳 October 9, 2026

परंपरा के साथ बदलती कल्पना

दुर्गा पूजा की एक खास बात यह है कि इसमें परंपरा और नए विचार साथ चलते हैं. देवी की पूजा और पारंपरिक रीतिरिवाज बने रहते हैं. वहीं पंडालों की सजावट और विषय हर साल नए रूप ले सकते हैं. कई आयोजक अपने पंडालों के जरिए सामाजिक या पर्यावरण से जुड़े विचार सामने रखते हैं. इससे लोगों को उत्सव के बीच किसी महत्वपूर्ण विषय पर सोचने का अवसर मिलता है. पूजा इस तरह कला और संवाद का मंच भी बनती है.

पश्चिम बंगाल की पहचान बनी दुर्गा पूजा

आज देश भर में मनाई जाने वाली दुर्गा पूजा पश्चिम बंगाल की सांस्कृतिक पहचान से गहराई से जुड़ी है. यह बंगाली भाषा, कला, संगीत, शिल्प और सामुदायिक जीवन को एक साथ सामने लाती है. कोलकाता में इसका भव्य सार्वजनिक रूप विशेष रूप से दिखाई देता है. हालांकि यह पर्व बंगाल के अन्य हिस्सों और दुनिया भर के बंगाली समुदायों में भी मनाया जाता है. पश्चिम बंगाल दुर्गा पूजा का गढ़ इसलिए बना क्योंकि यहां धार्मिक परंपरा को सार्वजनिक कला और सामूहिक भागीदारी से जोड़ा गया. कारीगरों का हुनर, पंडालों की रचनात्मकता और लोगों की सक्रिय भागीदारी इसे हर साल नया रूप देती है.

विज्ञापन
728 x 90 Advertisement
शेयर करें:
Author Bio Pic

संपादकीय टीम

खबर मंकी की अनुभवी एडिटोरियल डेस्क। हमारे लेखक और संपादक दिन-रात निष्पक्ष, सटीक और तीव्र समाचार आप तक पहुँचाने के लिए काम करते हैं।

🐒 KHABAR MONKEY