कोलकाता। बंगाल का चुनावी रण इस बार विकास के रोडमैप पर नहीं, बल्कि धर्म, संस्कृति और थाली के स्वाद पर लड़ा जा रहा है। जहाँ एक तरफ ध्रुवीकरण की राजनीति अपनी जड़ें जमा रही है, वहीं दूसरी ओर अस्मिता के नाम पर पलटवार हो रहा है। लेकिन इस शोर-शराबे के बीच बंगाल का भविष्य यानी शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार कहीं गुम हो गया है।

मछली-भात बनाम धार्मिक पाठ
चुनावी रैलियों में अब आर्थिक नीतियों पर चर्चा कम और धार्मिक प्रतीकों का प्रदर्शन ज्यादा होता है। एक पक्ष अगर धार्मिक एजेंडे को हवा दे रहा है, तो दूसरा पक्ष मंच से मंत्रोच्चार और श्बंगाली अस्मिताश् के नाम पर खान-पान को ढाल बना रहा है। राजनीति अब घर की रसोई और मंदिर की चैखट तक सिमट गई है।
वो सवाल, जो पोस्टर से गायब हैं-
भावुकता के इस ज्वार में जनता के बुनियादी सवाल हाशिए पर धकेल दिए गए हैं-
- शिक्षा का संकट- क्या स्कूलों में मिलने वाली शिक्षा बच्चों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार कर रही है?
- रोजगार का पलायन- बंगाल का हुनरमंद युवा दूसरे राज्यों में नौकरी ढूंढने को मजबूर क्यों है?
- स्वास्थ्य का हाल- क्या एक आम आदमी को इलाज के लिए आज भी अपनी जमीन और जेवर नहीं बेचने पड़ते?
- कानून व्यवस्था- क्या राजनीति से परे समाज में न्याय की गारंटी सुरक्षित है?
भावनाएं वोट तो दिला सकती हैं, लेकिन भविष्य नहीं बनातीं।ष् यह वाक्य आज के बंगाल चुनाव का सबसे बड़ा सच बनकर उभरा है।
सोशल मीडिया हेडलाइन
क्या बंगाल को मुद्दे नहीं, सिर्फ मुकाबला चाहिए?
जब चुनाव धर्म बनाम धर्म और संस्कृति बनाम संस्कृति हो जाए, तो समझ लीजिए कि जनता का एजेंडा हाईजैक हो चुका है। मछली-भात और धार्मिक पाठ की राजनीति में असली हार उस युवा की हो रही है जो नियुक्ति पत्र का इंतजार कर रहा है।
लोकतंत्र की मजबूती इस बात में नहीं है कि हम कितनी जोर से नारा लगाते हैं, बल्कि इस बात में है कि हम अपना वोट श्भावनाश् पर देते हैं या श्विकासश् पर।
याद रखिए– एजेंडा बदलने से तकदीर नहीं बदलती, नीयत और नीति बदलने से बदलती है।





