रूस के साइबेरिया में एंटी प्लेग इंस्टीट्यूट की 28 वर्षीय कर्मचारी दार्या शिपिलोवा गंभीर निमोनिया से मौत हो गई. इसके बाद लोग आशंका से भर उठे कि कहीं फेफड़ों को प्रभावित करने वाले प्लेग से तो पीड़ित नहीं थी. हालंकि रूस ने प्लेग से मौत की पुष्टि नहीं की है. अलबत्ता यह जरूर कहा है कि महिला की मौत अज्ञात कारण वाली निमोनिया से हुई है. असल में बीते 25 सितंबर को इंस्टीट्यूट में प्लेग बैक्टीरिया वाला टेस्ट ट्यूब टूट गया था. उसी के बाद दार्या बीमार हुई और फिर बाद में उसकी मौत हो गई. सरकार ने लैब में ऐसी किसी भी घटना से भी इनकार किया है. इस बीच ब्लैक डेथ की कहानी भी चर्चा में आ गई जब यूरोप की एक तिहाई आबादी काल के गाल में समा गई थी. आइए, इसी बहाने समझते हैं कि कैसे प्लेग की वजह से इतनी बड़ी तबाही आई थी?

किस्सा चौदहवीं सदी का है. यूरोप ने एक ऐसी महामारी देखी, जिसने लोगों की जिंदगी और समाज को पूरी तरह बदल दिया. इस महामारी को ब्लैक डेथ कहा जाता है. यह प्लेग का एक बड़ा प्रकोप था. माना जाता है कि 1347 से 1351 के बीच इसने यूरोप की बहुत बड़ी आबादी को अपनी चपेट में लिया. आम तौर पर कहा जाता है कि यूरोप की करीब एकतिहाई से आधी आबादी की मौत हुई. उस समय बीमारी के कारणों की सही जानकारी नहीं थी. लोगों को पता नहीं था कि संक्रमण कैसे फैलता है. इलाज के साधन भी सीमित थे. इसलिए महामारी तेजी से फैली और कई शहरों तथा गांवों में जीवन ठप हो गया.
क्या थी प्लेग की असली वजह?
ब्लैक डेथ का कारण येरसिनिया पेस्टिस नाम का एक जीवाणु था. यह जीवाणु प्लेग रोग पैदा करता है. संक्रमित पिस्सू अक्सर चूहों जैसे छोटे स्तनधारियों पर रहते हैं. जब ये पिस्सू किसी इंसान को काटते हैं, तो संक्रमण फैल सकता है. कुछ प्रकार का प्लेग संक्रमित व्यक्ति की खांसी या छींक से निकलने वाली बूंदों के जरिए भी फैल सकता है. उस समय लोगों को जीवाणुओं के बारे में जानकारी नहीं थी. सूक्ष्मदर्शी और आधुनिक चिकित्सा मौजूद नहीं थे. लोग बीमारी को खराब हवा, सजा या धार्मिक संकेत से जोड़ते थे. इन धारणाओं के कारण संक्रमण रोकने के उपाय प्रभावी नहीं हो पाए.
महामारी पूरे यूरोप तक कैसे पहुंची?
ब्लैक डेथ का पूरा शुरुआती रास्ता आज भी इतिहासकारों के बीच चर्चा का विषय है. माना जाता है कि बीमारी मध्य एशिया के कुछ हिस्सों से व्यापारिक रास्तों के जरिए पश्चिम की ओर बढ़ी. व्यापारियों के जहाज और कारवां सामान के साथ चूहों तथा पिस्सुओं को भी एक जगह से दूसरी जगह ले जा सकते थे. काला सागर के आसपास के व्यापारिक बंदरगाहों ने बीमारी को आगे फैलाने में भूमिका निभाई.
1347 के आसपास भूमध्यसागर के कई बंदरगाहों पर जहाज पहुंचे. उनके साथ बीमारी भी यूरोप के तटीय इलाकों में आई. फिर व्यापार और लोगों की आवाजाही से संक्रमण दूसरे क्षेत्रों में फैलता गया. रूस और काला सागर के आसपास के इलाकों का इस कहानी में महत्व है. इस क्षेत्र से होकर गुजरने वाले व्यापारिक रास्ते एशिया और यूरोप को जोड़ते थे. लेकिन इसे केवल रूस की महामारी कहना सही नहीं होगा. ब्लैक डेथ एक विशाल क्षेत्र में फैली महामारी थी. इसका प्रभाव यूरोप, एशिया और उत्तरी अफ्रीका के कई हिस्सों तक पहुंचा.
क्या थे इस रहस्यमयी बीमारी के लक्षण?
प्लेग के अलगअलग रूप थे. सबसे आम रूप को ब्यूबोनिक प्लेग कहा जाता है. इसमें शरीर के कुछ हिस्सों में दर्दनाक सूजन होती थी. ये सूजन अक्सर गर्दन, बगल या जांघ के पास दिखाई देती थीं. इन्हें ब्यूबो कहा गया. रोगी को तेज बुखार, कमजोरी और दर्द भी हो सकता था. कुछ मामलों में संक्रमण खून तक पहुंच जाता था. इसे सेप्टीसीमिक प्लेग कहा जाता है. एक अन्य रूप में फेफड़े प्रभावित होते थे. इसे न्यूमोनिक प्लेग कहा जाता है. यह रूप सांस के जरिए एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक फैल सकता है. बीमारी कई बार बहुत तेजी से गंभीर हो जाती थी. उस समय प्रभावी दवाएं उपलब्ध नहीं थीं.
रोजमर्रा की जिंदगी पर हुआ था तेज असर
महामारी के फैलने पर लोगों के लिए सामान्य जीवन जीना कठिन हो गया. बाजार बंद होने लगे. खेतों में काम करने वाले कम पड़ गए. व्यापार और यात्रा प्रभावित हुए. परिवारों ने अपने प्रियजनों को खोया. कई जगहों पर शवों को दफनाने के लिए पर्याप्त लोग नहीं बचे. शहरों में आबादी घनी थी. घरों और गलियों में साफसफाई की सुविधाएं सीमित थीं. लोग एकदूसरे के पास रहते थे. ऐसी परिस्थितियों में बीमारी को रोकना मुश्किल था. कुछ लोग शहर छोड़कर गांवों की ओर चले गए. कुछ स्थानों पर अधिकारियों ने बाहर से आने वाले लोगों और जहाजों को रोकने की कोशिश की. अलग रखने की इस व्यवस्था ने आगे चलकर क्वारंटीन की अवधारणा को जन्म दिया.
प्लेग पर क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
#WATCH | Delhi: On pneumonic plague and Yersinia pestis, Senior Consultant, Internal Medicine, Apollo Hospitals, Dr S. Chatterjee says, “It actually spreads by the bite of fleas, by handling contaminated animal tissues, or, if it is pneumonic plague, which involves the lungs, then through secretions…what is very important is early detection and treatment, especially of pneumonic plague.
He further says, “…the pneumonic plague actually spreads from man to man because of respiratory droplet infection. When somebody coughs or sneezes, and he is infected, he can spread the infection from one person to another. The other ways it can infect is by infected fleas from rodents and all that…”
He adds, “…the risk is low; there’s nothing to panic. But awareness is very important…if it happens, you need to detect it first and treat it early, because sometimes it can be lethal and can kill a person within hours if not treated appropriately.”
— ANI October 5, 2026
डर और अफवाहों की वजह से दिक्कतें बढ़ी
लोगों के पास बीमारी का वैज्ञानिक कारण नहीं था. इसलिए डर और अफवाहें तेजी से फैलती थीं. कुछ लोगों ने इसे ईश्वर का प्रकोप माना. कुछ ने विशेष धार्मिक अनुष्ठान किए. कई जगहों पर निर्दोष समुदायों पर बीमारी फैलाने का झूठा आरोप लगाया गया. इससे हिंसा और अन्याय बढ़े. कुछ चिकित्सक उस समय के ज्ञान के आधार पर इलाज करने की कोशिश करते थे. वे जड़ीबूटियों, सुगंधित पदार्थों और रक्त निकालने जैसे तरीकों का इस्तेमाल करते थे. इन उपायों से बीमारी का भरोसेमंद इलाज नहीं हो पाता था. फिर भी, उस दौर के लोग अपने उपलब्ध ज्ञान के अनुसार मदद करने का प्रयास कर रहे थे.
समाज और अर्थव्यवस्था में हुए नकारात्मक बदलाव
ब्लैक डेथ के कारण काम करने वाले लोगों की संख्या बहुत घट गई. खेतों, कार्यशालाओं और व्यापार में मजदूरों की कमी हो गई. कई इलाकों में मजदूरी बढ़ी. बचे हुए किसानों और कारीगरों को पहले से बेहतर शर्तों की मांग करने का अवसर मिला. कुछ शासकों ने मजदूरी पर नियंत्रण लगाने की कोशिश की. इससे तनाव भी पैदा हुआ. भूमि और संपत्ति के मालिकों को भी नुकसान हुआ. कई खेत खाली पड़ गए. कुछ गांव उजड़ गए. व्यापारिक रास्ते और बाजार धीरेधीरे फिर से शुरू हुए, लेकिन पुराने ढांचे में बदलाव आ चुका था. यूरोप की आबादी को महामारी से पहले के स्तर तक पहुंचने में कई पीढ़ियां लगीं.
क्या सचमुच एकतिहाई आबादी मरी?
ब्लैक डेथ से हुई मौतों की सटीक संख्या बताना कठिन है. उस समय जनगणना और मृत्यु के व्यवस्थित रिकॉर्ड आज जैसे नहीं थे. अलगअलग क्षेत्रों में असर भी अलग था. कुछ शहरों में मौतें बहुत अधिक हुईं. कुछ ग्रामीण इलाकों पर तुलनात्मक रूप से कम असर पड़ा. इसी वजह से इतिहासकार अलगअलग अनुमान देते हैं. यूरोप की एकतिहाई आबादी एक प्रचलित अनुमान है, लेकिन यह हर क्षेत्र के लिए समान नहीं था. कुछ अनुमानों में कुल मौतों का अनुपात इससे अधिक भी बताया गया है. इसलिए इसे एक मोटा अनुमान समझना चाहिए, न कि पक्की गिनती.
ब्लैक डेथ से क्या मिली सीख?
ब्लैक डेथ हमें बताती है कि बीमारी केवल शरीर को प्रभावित नहीं करती. वह परिवारों, अर्थव्यवस्था और समाज के ढांचे को भी बदल सकती है. बीमारी के बारे में सही जानकारी न होने पर डर, अफवाह और भेदभाव फैल सकते हैं. साफसफाई, बीमारी की निगरानी और संक्रमित लोगों को समय पर चिकित्सा देना बहुत जरूरी है. आज दुनिया के पास आधुनिक जांच, दवाएं और सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था है. फिर भी महामारी के समय भरोसेमंद जानकारी और समाज का सहयोग अहम रहते हैं.
ब्लैक डेथ का इतिहास केवल अतीत की त्रासदी नहीं है. यह याद दिलाता है कि बीमारी से लड़ने के लिए विज्ञान, तैयारी और इंसानियत तीनों की जरूरत होती है. इस महामारी के बाद यूरोप की अर्थव्यवस्था और सामाजिक संबंधों में कई बदलाव आए. आबादी घटने से कामगारों की भूमिका बढ़ी. कई पुरानी व्यवस्थाओं पर दबाव पड़ा.