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किरदार बदले, वक्त बदला… फिर भी नहीं खत्म हुआ ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ का जादू, 17 सालों से आखिर क्यों बना हुआ है दर्शकों की पसंद

भारतीय टेलीविजन की दुनिया में कई शो आए, सुपरहिट हुए और फिर धीरे-धीरे यादों का हिस्सा बन गए। लेकिन एक शो ऐसा भी है जिसने सिर्फ टीआरपी नहीं, बल्कि लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी में अपनी जगह बनाई और उसका नाम है ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’। 17 साल… हजारों एपिसोड… कई किरदारों की विदाई… टीवी इंडस्ट्री का बदलता दौर… OTT का दबदबा… फिर भी अगर रात के खाने के समय करोड़ों लोग टीवी ऑन करके गोकुलधाम सोसाइटी पहुंच जाते हैं, तो इसके पीछे सिर्फ आदत नहीं, एक गहरा भावनात्मक रिश्ता है।

किरदार बदले, वक्त बदला… फिर भी नहीं खत्म हुआ ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ का जादू, 17 सालों से आखिर क्यों बना हुआ है दर्शकों की पसंद
किरदार बदले, वक्त बदला… फिर भी नहीं खत्म हुआ ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ का जादू, 17 सालों से आखिर क्यों बना हुआ है दर्शकों की पसंद

हालांकि, सवाल यही है कि आखिर इस शो में ऐसा क्या है, जो इसे बाकी टीवी शोज़ से अलग बनाता है। क्यों आज भी बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक इसे देखना पसंद करते हैं और कैसे किरदार बदल जाने के बावजूद इसका जादू खत्म नहीं हुआ। चलिए विस्तार से इसके बारे में जानने की कोशिश करते हैं।

शो में दिखी मिडिल क्लास की कहानी

जब 2008 में ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ शुरू हुआ, तब भारतीय टीवी पर सास-बहू ड्रामों का बोलबाला था। रिश्तों की साजिशें, भारी-भरकम इमोशनल सीन और अनगिनत ट्विस्ट… उस समय यही मनोरंजन का फॉर्मूला था। ऐसे समय में एक हल्का-फुल्का कॉमेडी शो आया, जिसमें न कोई विलेन था, न बदले की कहानी। यह शो दरअसल आम भारतीय परिवारों का आईना बन गया।

गोकुलधाम सोसाइटी सिर्फ एक काल्पनिक जगह नहीं थी, बल्कि वो भारत था- जहां अलग-अलग राज्यों, भाषाओं और संस्कृतियों के लोग साथ रहते हैं। कोई गुजराती है, कोई पंजाबी, कोई बंगाली, कोई दक्षिण भारतीय… लेकिन त्योहार सबके हैं, खुशी सबकी है। परेशानी सबकी है। यही एकता इस शो की ताकत बनी।

जेठालाल: आम आदमी का चेहरा

यह कहना गलत नहीं होगा कि अगर इस शो की जान कोई किरदार है, तो वो दिलीप जोशी द्वारा निभाया गया जेठालाल का है। जेठालाल सिर्फ एक कॉमिक कैरेक्टर नहीं, बल्कि भारतीय मिडिल क्लास आदमी की परेशानियों का प्रतीक है। बिजनेस का तनाव, परिवार की जिम्मेदारी, पत्नी से नोकझोंक, बेटे की शरारतें और ऊपर से बॉस जैसे बापूजी का डर।

उनकी कॉमेडी इसलिए काम करती है क्योंकि दर्शक उसमें खुद को देखते हैं। जब जेठालाल गड़बड़ में फंसते हैं, तो लोग हंसते जरूर हैं, लेकिन कहीं न कहीं सोचते हैं कि अरे, ये तो हमारे साथ भी होता है। यही रिलेटेबिलिटी शो को खास बनाती है।

जहां पड़ोसी परिवार हैं

आज की भागदौड़ वाली जिंदगी में लोग अपने पड़ोसियों तक को ठीक से नहीं जानते। ऐसे दौर में गोकुलधाम सोसाइटी एक ड्रीम कम्युनिटी जैसी लगती है। यहां हर समस्या सामूहिक होती है। किसी के घर खुशी आए, तो पूरी सोसाइटी जश्न मनाती है। किसी पर मुसीबत आए, तो सब साथ खड़े होते हैं। यही कारण है कि दर्शक इस शो को सिर्फ कॉमेडी नहीं, कम्फर्ट की तरह देखते हैं। कई लोगों के लिए यह शो मानसिक थकान से राहत जैसा है। ऑफिस या पढ़ाई के तनाव के बाद 20 मिनट की हल्की हंसी उन्हें रिलैक्स कर देती है।

परिवार के साथ देखने लायक कंटेंट

आज के दौर में कंटेंट तेजी से बोल्ड और एडल्ट होता जा रहा है। लेकिन ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ ने शुरुआत से ही फैमिली एंटरटेनमेंट का रास्ता चुना। इसमें डबल मीनिंग जोक्स, अश्लीलता और हिंसा जैसी चीजें नहीं देखने को मिली। यही वजह है कि बुजुर्ग से लेकर छोटे बच्चे तक एक साथ बैठकर इसे देख सकते हैं। अब ऐसा कंटेंट अब बहुत कम बचा है और शायद यही इसकी सबसे बड़ी यूएसपी भी है।

किरदार बदले लेकिन एहसास नहीं

शो को 17 साल हो गए हैं और इन सालों में शो के कई लोकप्रिय चेहरे बदल गए। दयाबेन का जाना, टप्पू का बदलना, नए चेहरों का शो में आना- इन सबने दर्शकों को झटका दिया। खासकर दिशा वकानी का का शो छोड़ना कई लोगों के लिए इमोशनल कर देने वाला था। दयाबेन की आवाज, उनका अंदाज और ‘हे मां, माताजी’ जैसे डायलॉग शो की पहचान बन चुके थे।

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इनके जाने के बाद भी शो बंद नहीं हुआ क्यों? क्योंकि इस शो की असली ताकत सिर्फ एक किरदार नहीं, उसका इकोसिस्टम है। गोकुलधाम का माहौल, किरदारों के रिश्ते, त्योहारों की गर्माहट और रोजमर्रा की छोटी-छोटी कहानियां यही असली हीरो हैं। दर्शक किसी एक व्यक्ति से नहीं, सब से जुड़ चुके हैं।

नॉस्टेल्जिया का बड़ा फैक्टर

आज जो बच्चे इस शो को देखकर बड़े हुए, वो अब यंग हो चुके हैं। लेकिन जब भी टीवी पर जेठालाल, भिड़े या पोपटलाल दिखाई देते हैं, तो उन्हें अपना बचपन याद आ जाता है। यही नॉस्टेल्जिया शो को नई ताकत देता है। लोग सिर्फ नए एपिसोड नहीं देखते, पुराने एपिसोड बार-बार देखते हैं। क्योंकि वो उन्हें एक आसान, खुशहाल और हल्के दौर की याद दिलाते हैं। डिजिटल युग में जब हर चीज तेजी से बदल रही है, तब यह शो लोगों को स्थिरता का एहसास देता है।

सोशल मीडिया और मीम ने भी बढ़ाई लोकप्रियता

एक समय था जब टीवी शो सिर्फ टीवी तक सीमित रहते थे। लेकिन ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ इंटरनेट के दौर में भी खुद को ढालने में सफल रहा। आज सोशल मीडिया पर जेठालाल के एक्सप्रेशन, बबीता जी के सीन, भिड़े का गुस्सा और पोपटलाल की शादी वाले मीम्स हर जगह दिखाई देते हैं। यानी शो अब सिर्फ टेलीविजन कंटेंट नहीं रहा, बल्कि इंटरनेट कल्चर का हिस्सा बन चुका है। कई युवा तो ऐसे भी हैं जिन्होंने टीवी पर नहीं, बल्कि मीम्स और क्लिप्स के जरिए इस शो को जाना।

हर एपिसोड में मिला संदेश

यह एक कॉमेडी शो है, लेकिन इसके एपिसोड अक्सर सामाजिक संदेश भी देते हैं। कभी पानी बचाने की बात, कभी स्वच्छता अभियान, कभी शिक्षा, कभी पर्यावरण- शो ने हमेशा हल्के अंदाज में गंभीर बातें कही हैं। सबसे खास बात यह रही कि ये संदेश उपदेश जैसे नहीं लगते। दर्शक हंसते-हंसते सीख लेते हैं। यही बैलेंस इसे लंबे समय तक बनाए रखता है।

आखिर क्यों बना हुआ है दर्शकों की पसंद?

17 साल तक किसी शो का टिके रहना सिर्फ किस्मत नहीं होता। इसके पीछे दर्शकों का भरोसा, भावनात्मक जुड़ाव और लगातार बनी हुई पहचान होती है। ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ ने लोगों को सिर्फ हंसाया नहीं, बल्कि उनके घरों का हिस्सा बन गया। यह शो उस दौर की याद दिलाता है जब परिवार साथ बैठकर टीवी देखा करते थे। जब पड़ोसी रिश्तेदार जैसे होते थे। जब छोटी-छोटी बातों में खुशी मिल जाती थी।

किरदार बदल गए, वक्त बदल गया, मनोरंजन के तरीके बदल गए… लेकिन लोगों की एक जरूरत नहीं बदली- दिल हल्का करने वाली सच्ची, साफ और अपनापन भरी कहानियां और शायद इसी वजह से, गोकुलधाम का दरवाजा आज भी हर शाम करोड़ों दर्शकों के लिए खुल जाता है।

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