आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल के बीच नौकरियों को लेकर चिंता भी बढ़ रही है. टेक इंडस्ट्री से जुड़े कई बड़े नाम मानते हैं कि AI आने वाले वर्षों में बड़ी संख्या में नौकरियों को प्रभावित कर सकता है. वहीं, इकोनॉमिस्ट का कहना है कि AI का मतलब सीधे तौर पर नौकरियों का खत्म होना नहीं है. उनका तर्क है कि टेक्नोलॉजी काम करने के तरीके को बदल सकती है और कई नई नौकरियां भी पैदा हो सकती हैं.

लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स की एक रिसर्च में AI और रोजगार से जुड़ी 74 स्टडीज का रिव्यू किया गया. इसमें रोजगार पर संभावित असर के अनुमान माइनस 20% से प्लस 25% तक रहे. इससे साफ है कि AI से कितनी नौकरियां जाएंगी, इसका कोई एक तय आंकड़ा नहीं है.
एंथ्रोपिक के CEO डारियो अमोदेई ने चेतावनी दी है कि 2030 तक AI एंट्रीलेवल की करीब आधी व्हाइटकॉलर नौकरियों को खत्म कर सकता है. माइक्रोसॉफ्ट के कोफाउंडर बिल गेट्स भी कह चुके हैं कि अगर सरकारों ने सही नीतियां नहीं बनाईं, तो अगले एक दशक में नौकरियों की संख्या में बड़ी कमी आ सकती है.
हालांकि, इकोनॉमिस्ट इन दावों को लेकर ज्यादा सावधानी बरतने की बात कहते हैं. उनका कहना है कि ऑटोमेशन की वजह से बड़े पैमाने पर नौकरियां खत्म होने की बातें पहले भी कई बार की गईं, लेकिन वे सही साबित नहीं हुईं. 2013 की एक चर्चित स्टडी में भी अनुमान लगाया गया था कि एक दशक में अमेरिका की करीब आधी नौकरियां खत्म हो सकती हैं, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. नोबेल पुरस्कार विजेता इकोनॉमिस्ट क्रिस्टोफर पिसाराइड्स के मुताबिक, टेक्नोलॉजी से नौकरियां खत्म होने को लेकर की गई बड़ी संख्या वाली ज्यादातर भविष्यवाणियां गलत साबित हुई हैं.
एक नौकरी में कई तरह के काम
इकोनॉमिस्ट का सबसे अहम तर्क यह है कि काम और नौकरी एक ही चीज नहीं हैं. एक नौकरी में कई तरह के टास्क होते हैं. AI इनमें से कुछ कामों को ऑटोमेट कर सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पूरी नौकरी खत्म हो जाएगी.
मसलन, AI किसी कंसल्टेंट के लिए डेटा का एनालिसिस या प्रेजेंटेशन तैयार कर सकता है, लेकिन क्लाइंट से बातचीत करना, लोगों को समझाना और किसी सुझाव को जमीन पर लागू करना अभी भी इंसानी भूमिका हो सकती है. इसलिए किसी नौकरी के 50% काम AI कर सकता है, तो इसका मतलब यह नहीं कि उस नौकरी की 50% सीटें खत्म हो जाएंगी.
अभी बड़े पैमाने पर नौकरी जाने के सबूत नहीं
OECD के 13 देशों में 8,000 एम्प्लॉयर्स के सर्वे में AI का इस्तेमाल करने वाली हर 10 में से सिर्फ 1 कंपनी ने कर्मचारियों की संख्या घटाने की बात कही. वहीं, सिर्फ 1% कंपनियों ने कहा कि AI नौकरी कम करने की मुख्य वजह था. यानी फिलहाल कुल रोजगार के आंकड़ों में AI की वजह से बड़े पैमाने पर बेरोजगारी का साफ असर नहीं दिख रहा है.
हालांकि, युवा कर्मचारियों के लिए चिंता जरूर है. कई देशों में टेक से जुड़े क्षेत्रों में एंट्रीलेवल हायरिंग धीमी हुई है. इसकी एक वजह यह हो सकती है कि AI की मदद से सीनियर कर्मचारी ज्यादा काम कर पा रहे हैं और वे रूटीन काम भी संभाल रहे हैं, जो पहले जूनियर कर्मचारियों को मिलते थे, लेकिन इकोनॉमिस्ट इसके लिए सिर्फ AI को जिम्मेदार मानने से बचते हैं.
एआई से मौके भी
AI नई नौकरियां भी पैदा कर सकता है
AI कुछ नौकरियों की मांग घटा सकता है, लेकिन इससे नई नौकरियां और नए बाजार भी बन सकते हैं. AI डेटा सेंटरों को इंजीनियरों की जरूरत होती है. सस्ती कानूनी सेवाओं से ज्यादा लोग वकीलों की सेवाएं ले सकते हैं. इसी तरह अर्थव्यवस्था में आय और उत्पादकता बढ़ने पर हेल्थकेयर और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में मांग बढ़ सकती है.
इसलिए बड़ा सवाल सिर्फ यह नहीं है कि AI कितनी नौकरियां खत्म करेगा, बल्कि यह भी है कि AI से होने वाला आर्थिक फायदा किसे मिलेगा. AI ज्यादा कुशल कर्मचारियों की कमाई बढ़ा सकता है, लेकिन रूटीन काम करने वालों के वेतन पर दबाव भी डाल सकता है. इससे अमीर और कम आय वाले कर्मचारियों के बीच अंतर बढ़ने का खतरा है. इसी वजह से इकोनॉमिस्ट का फोकस बड़े पैमाने पर बेरोजगारी आने का इंतजार करने के बजाय ऐसी नीतियां बनाने पर है, जिससे AI से बढ़ने वाली उत्पादकता और कमाई का फायदा ज्यादा लोगों तक पहुंच सके.
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