1970 के दशक का दौर हिंदी सिनेमा के लिए बड़े बदलावों का समय था। एक तरफ फिल्मों में प्यार, परिवार और भावनाओं की कहानियां दर्शकों को पसंद आ रही थीं, तो दूसरी तरफ देश की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियां तेजी से बदल रही थीं। इसी दौर में भारतीय सिनेमा ने एक ऐसे सुपरस्टार को देखा, जिसने रोमांस के बादशाह माने जाने वाले राजेश खन्ना की चमक को पीछे छोड़ दिया। ये स्टार कोई और नहीं बल्कि अमिताभ बच्चन थे। जिन्हें आगे चलकर ‘एंग्री यंग मैन’ कहा गया।

1969 से लेकर शुरुआती 70 के दशक तक राजेश खन्ना का जादू दर्शकों के सिर चढ़कर बोलता था। ‘आराधना’, ‘आनंद’, ‘कटी पतंग’ और ‘अमर प्रेम’ जैसी फिल्मों ने उन्हें देश का सबसे बड़ा रोमांटिक स्टार बना दिया था। लड़कियों के बीच उनकी दीवानगी ऐसी थी कि उनके नाम खून से खत लिखे जाते थे। उनकी मुस्कान, धीमी आवाज और रोमांटिक अंदाज लोगों को बेहद पसंद आता था।
फीकी पड़ने लगी राजेश खन्ना की चमक
उस समय हिंदी फिल्मों में प्यार, त्याग और इमोशनल कहानियों का दौर था और उस दौर के सबसे बड़े चेहरे बन चुके थे। लेकिन देश के हालात बदल रहे थे और इसका असर फिल्मों के दर्शकों पर भी पड़ने लगा।
1975 में देश में इमरजेंसी लागू हुई। राजनीतिक तनाव, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और आम आदमी की परेशानियों ने लोगों के भीतर गुस्सा पैदा कर दिया था। समाज में निराशा और असंतोष का माहौल था। ऐसे समय में दर्शक फिल्मों में सिर्फ रोमांस नहीं, बल्कि अपने संघर्ष और गुस्से की झलक देखना चाहते थे।
यहीं से हिंदी सिनेमा में एक नए तरह के हीरो की जरूरत महसूस हुई, ऐसा हीरो जो सिस्टम से लड़ सके, अन्याय के खिलाफ आवाज उठा सके और आम आदमी का प्रतिनिधित्व करे।
अमिताभ का शुरू हुआ दौर
इसी दौर में अमिताभ बच्चन की फिल्मों ने लोगों के दिलों में जगह बनानी शुरू की। ‘जंजीर’, ‘दीवार’, ‘त्रिशूल’ और ‘शोले’ जैसी फिल्मों में उनका गुस्सैल और विद्रोही किरदार दर्शकों को बेहद पसंद आया। उनकी स्क्रीन प्रेजेंस, भारी आवाज और दमदार डायलॉग ने उन्हें बाकी सितारों से अलग बना दिया।
अमिताभ बच्चन का किरदार उस आम इंसान की आवाज बन गया, जो सिस्टम से नाराज था। दर्शकों को लगा कि फिल्मों में पहली बार कोई हीरो उनके दर्द और संघर्ष को पर्दे पर दिखा रहा है। यही वजह रही कि धीरे-धीरे रोमांटिक फिल्मों का दौर कमजोर पड़ने लगा और एक्शन व सामाजिक संघर्ष वाली फिल्मों का प्रभाव बढ़ गया।
क्यों अमिताभ के आगे नहीं चल पाया राजेश खन्ना का जादू?
राजेश खन्ना की इमेज एक रोमांटिक हीरो की थी। हालांकि उन्होंने कई शानदार फिल्में दीं, लेकिन बदलते दौर के साथ दर्शकों की पसंद भी बदल गई। जहां के किरदार गुस्से और संघर्ष का प्रतीक बन रहे थे, वहीं राजेश खन्ना की फिल्मों का भावनात्मक अंदाज पुराने दौर का लगने लगा।
एक ओर रोमांस और भावनाएं थीं, दूसरी ओर व्यवस्था से लड़ने वाला नया हीरो। दर्शकों ने उस समय दूसरे विकल्प को ज्यादा अपनाया।
हिंदी सिनेमा का सबसे बड़ा बदलाव
70 के दशक का यह बदलाव हिंदी सिनेमा के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण मोड़ों में गिना जाता है। राजेश खन्ना ने जहां सुपरस्टार संस्कृति की शुरुआत की, वहीं अमिताभ बच्चन ने हिंदी फिल्मों में नए तरह के नायक को स्थापित किया। दोनों सितारों ने अपने-अपने दौर में भारतीय सिनेमा को नई पहचान दी।
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आज भी जब हिंदी सिनेमा के सबसे बड़े सितारों की बात होती है, तो राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन का नाम सबसे पहले लिया जाता है। एक ने रोमांस को नई ऊंचाई दी, तो दूसरे ने गुस्से और संघर्ष को पर्दे पर नई आवाज दी।





