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आलोचक को बनाया मंत्री, संसद में डटे रहे, पंडित नेहरू के विपक्ष से रिश्ते आज भी क्यों याद किए जाते हैं?

देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू निधन के पचास वर्षों बाद भी देश की जनता की यादों में बने हुए हैं. उनकी प्रशंसा में बोलने वाले लोग हैं, तो दूसरी ओर आलोचना करने वाले भी कम नहीं हैं. संसद से सड़कों तक पंडित नेहरू का नाम जब-तब दोहराया जाता है. आलोचना करने वाले वंशवाद के बीज बोने से लेकर कश्मीर के सवाल को उलझाने और चीन नीति की विफलता के कारण 1962 की शर्मनाक पराजय सहित तमाम मसलों को दोहराते हैं. लेकिन उन्हीं नेहरू के राजनीतिक चरित्र का एक दूसरा पहलू व्यापक सम्मान पाता है. और वह है लोकतांत्रिक असहमति के प्रति सहिष्णुता.

आलोचक को बनाया मंत्री, संसद में डटे रहे, पंडित नेहरू के विपक्ष से रिश्ते आज भी क्यों याद किए जाते हैं?
आलोचक को बनाया मंत्री, संसद में डटे रहे, पंडित नेहरू के विपक्ष से रिश्ते आज भी क्यों याद किए जाते हैं?

उन्होंने विपक्ष को शत्रु नहीं माना. संसद को केवल संख्या का खेल नहीं समझा. वे बहस को लोकतंत्र की आत्मा मानते थे. आज जब संसदीय बहसें प्रायः शोर-शराबे और कटुता की भेंट चढ़ रही हैं, उस समय पंडित नेहरू के दौर की संसद की बहसें लोकतंत्र की एक अलग परंपरा की याद दिलाती हैं, जहां असहमति तीखी थी.लेकिन संवाद कायम था. प्रहार कठोर थे. लेकिन लोकतांत्रिक मर्यादाओं के भीतर. पंडित नेहरू की पुण्यतिथि के अवसर पर पढ़िए उनके और विपक्ष के रिश्तों के बीच के कुछ प्रसंग.

सत्ता पक्ष के भीतर विपक्ष

संविधानसभा का कार्य पूर्ण हो जाने के बाद उसे अस्थायी संसद के तौर पर बदल दिया गया था. इस 313 सदस्यीय सदन में औपचारिक तौर पर कोई विपक्ष नहीं था. जो कांग्रेस में नहीं थे उन्हें असम्बद्ध सदस्य माना जाता था. शुरुआत में उनकी संख्या 22 थी. 1951 में यह संख्या 28 हो गई.

देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू. फोटो: INC

दिलचस्प है कि विपक्षी समझे जाने वाले इन असम्बद्ध सदस्यों की तुलना में कांग्रेस के भीतर का विपक्ष कहीं अधिक बड़ा और मुखर था. कांग्रेस के ऐसे कई सदस्य थे जो सरकार की आलोचना का कोई मौका नहीं छोड़ते थे. पार्टी में रहते हुए सरकार के आलोचक महावीर त्यागी और आर.के.सिधवा मंत्री बनाये गए. पंडित नेहरू की शख्सियत का अनूठा पहलू था कि वे स्वयं अपनी ही आलोचना करने में पीछे नहीं रहे. संसद में एक अवसर पर उन्होंने अपने बारे में कहा था ,’ मैं अक्सर ताज्जुब करता हूं कि पिछले कुछ महीनों में जो कुछ हुआ है उसके बाद हिंदुस्तान के लोग मुझ जैसे आदमी को क्यों बर्दाश्त करते हैं ? मैं खुद यकीन के साथ नहीं कह सकता हूँ कि अगर मैं सरकार में न होता तो क्या मैं इस सरकार को बर्दाश्त कर पाता !

सरकार की आलोचना करने वालों को भी मंत्री बनाया

कांग्रेस में रहते हुए अपनी सरकार को घेरने वाले महावीर त्यागी और आर.के.सिधवा को नेहरू ने अपनी कैबिनेट में शामिल किया. आचार्य कृपलानी भी सरकार पर प्रहार का कोई मौका नहीं छोड़ते थे. उन्होंने पहले कांग्रेस के भीतर ही एक लोकतांत्रिक दल बनाया. फिर पार्टी में अलग-थलग अनुभव करने पर किसान मजदूर प्रजा पार्टी बनाई.. रफ़ी अहमद किदवई के कांग्रेस से अलग होने के बाद भी नेहरू ने उनसे मंत्री बने रहने का आग्रह किया.

आचार्य कृपलानी भी सरकार पर प्रहार का कोई मौका नहीं छोड़ते थे.

उन्होंने कहा , माननीय सदस्यों को पूरा अधिकार है कि देश के वर्तमान चित्र को आलोचनात्मक दृष्टि से देखें. यदि सदन में कोई प्रभावी विपक्ष होता तो अवश्य ही यह उसका अधिकार ही नहीं कर्तव्य भी होता कि वह सरकार की कमियों की ओर ध्यान दिलाते हुए रचनात्मक सुझाव रखता. क्योंकि कोई प्रभावी विपक्ष है ही नहीं इसलिए मैं अपने साथियों की आलोचना का स्वागत करता हूं, जो नीतियों के मामले में प्रायः हमारे साथ हैं.’

मुखर्जी का पलटवार और फिर लगे ठहाके

शुरुआती सालों में संसद में यदि कोई नेता नेहरू को बौद्धिक स्तर पर सबसे अधिक चुनौती देता था, तो वह थे डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी. वे नेहरू मंत्रिमंडल में उद्योग मंत्री भी रहे, लेकिन बाद में नीतिगत मतभेदों के कारण अलग हो गए. कश्मीर और अनुच्छेद 370 पर मुखर्जी ने कश्मीर नीति पर नेहरू को लगातार घेरा. एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे – मुखर्जी का केवल राजनीतिक नारा नहीं था, बल्कि नेहरू की संघीय और कश्मीर नीति पर सीधा हमला था. नेहरू इन प्रश्नों से असहज होते थे, लेकिन उन्होंने कभी मुखर्जी की आवाज दबाने का प्रयास नहीं किया. वे लंबे उत्तर देते और कहते कि कश्मीर केवल कानूनी प्रश्न नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और अंतरराष्ट्रीय परिस्थिति से जुड़ा विषय है. लोकसभा में संसदीय शिष्टाचार का एक अनूठा दृश्य तब देखने में आया जब पंडितजी ने बिना किसी लाग – लपेट के श्यामा प्रसाद मुखर्जी से क्षमा मांगी.

उत्तर में मुखर्जी ने कहा था कि क्षमायाचना की कोई आवश्यकता नहीं है. इतना पर्याप्त है कि प्रधानमंत्री ने माना कि जिस भाषा का उन्होंने प्रयोग किया वह अनुचित थी. प्रसंग यह था कि मुखर्जी के भाषण के सही संदर्भ को समझे बिना पंडितजी ने कह दिया,’मैं तो समझ रहा था कि किसी सज्जन व्यक्ति को सुन रहा हूँ. उन्हें (मुखर्जी को) सच का सामना करना चाहिए. ‘ जवाब में मुखर्जी ने कहा था , ‘ मैं सच का कैसे सामना करूं ? मैं तो सरकार का सामना कर रहा हूं.’ तब पूरा सदन गूंज गया था. हंसने वालों में पंडित नेहरू भी शामिल थे.

पंडित नेहरू. फोटो: Keystone Features/Hulton Archive/Getty Images

विपक्ष-आलोचना को माना जरूरी

पहली निर्वाचित लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चार दिन चली बहस के उत्तर में 22 मई 1952 का नेहरू का भाषण संसदीय जनतंत्र में विपक्ष की अनिवार्यता को रेखांकित करता है. उन्होंने कहा था, ‘मेरा विश्वास है कि किसी भी सरकार के लिये आलोचकों और विपक्ष का होना जरूरी है, क्योंकि आलोचना के बिना लोग अपने में संतुष्ट अनुभव करने लगते हैं. सरकार आत्मसंतुष्ट हो जाती है. सारी संसदीय व्यवस्था आलोचना पर आधारित है.

विपक्ष में जो हैं, उनका स्वागत है. इससे अंतर नही पड़ता कि हम उनसे सहमत हैं अथवा नहीं. महत्व इस बात का है कि वे देश के किसी भी किसी हिस्से के विचारों का प्रतिनिधित्व करते हैं. एक सदस्य के इस कथन पर कि उन्होंने (नेहरू ने) इतिहास में अपना स्थान खो दिया, के जबाब में उन्होंने कहा था कि महत्व इस बात का नहीं है कि इतिहास मेरा क्या मुकाम तय करेगा ? महत्व इस बात का है कि इसका देश और उसकी चालीस करोड़ जनता के भाग्य पर क्या प्रभाव होगा?’

लोहिया के हमलों पर झुंझलाते-फिर भी सुनते-मुस्कराते

आजादी की लड़ाई में पंडित नेहरू के काफी नजदीक रहे डॉक्टर राम मनोहर लोहिया आजादी के बाद उनकी आलोचना करने वाले नेताओं में सबसे ज्यादा मुखर थे. अगर संसद में किसी ने नेहरू को सबसे अधिक बेचैन किया, तो वे लोहिया थे. लोहिया का हमला केवल नीतियों पर नहीं, बल्कि सत्ता के चरित्र पर होता था. वे नेहरू को अंग्रेजी मानसिकता वाली अभिजात राजनीति का प्रतीक मानते थे.तीन आना बनाम पंद्रह आना की बहस के जरिए लोहिया ने संसद में देश में व्याप्त आर्थिक विषमता का प्रश्न बड़े प्रभावशाली ढंग से उठाया था.

राम मनोहर लोहिया.

उन्होंने कहा कि भारत की विशाल जनता तीन आने प्रतिदिन में जीवन गुजारती है ,जबकि सरकार और शासक वर्ग विलासिता में रहते हैं. इस बहस में उन्होंने नेहरू के खर्चों तक का उल्लेख किया था. लेकिन यह व्यक्तिगत आक्षेप नहीं बल्कि सत्ता की संरचना पर हमला था.लोहिया के भाषणों में तीखा व्यंग्य होता था. वे कहते थे देश में समाजवाद नहीं, सरकारी अमीरवाद बढ़ रहा है. लोहिया की इस शैली से नेहरू कई बार झुंझलाते थे. संसद में उनके चेहरे पर बेचैनी भी दिखाई देती थी. किंतु वे उन्हें सुनते थे. एक बार बहस के दौरान लोहिया लगातार बीच में बोलते रहे. सदन में शोर बढ़ गया. नेहरू ने मुस्कुराकर कहा—डॉ. लोहिया इतने अधीर हैं कि उन्हें इतिहास भी जल्दी चाहिए.

1962 की पराजय ने भीतर से भी तोड़ा

1962 में चीन से जबरदस्त शिकस्त ने पंडित नेहरू को बुरी तरह आहत किया था. वे सिर्फ विपक्ष के निशाने पर नहीं थे. भीतर से भी टूट गए थे. कभी नेहरू के साथी रहे आचार्य कृपलानी बाद में उनके प्रखर आलोचक रहे. नेहरू को निशाने पर लेते हुए उन्होंने कहा कि कहने को लोकतंत्र है लेकिन सब कुछ प्रधानमंत्री कार्यालय के इर्द-गिर्द केंद्रित हो रहा है. 1962 की पराजय के बाद संसद में कृपलानी ने सरकार की तैयारियों पर गंभीर प्रश्न उठाए. उन्होंने पूछा कि यदि चीन मित्र था, तो युद्ध की नौबत क्यों आई? कहा कि आपने पंचशील के सपने देखे और उधर चीन सड़कें बनाता रहा. महावीर त्यागी के प्रहार तो और भी तीखे थे. नेहरू के इस कथन कि जिस क्षेत्र पर चीन ने कब्जा किया है वहां घास का एक तिनका भी नहीं उगता – त्यागी ने अपने गंजे सिर के आगे करते हुए नेहरू से कहा था, पंडितजी, अगर मेरे सिर का यह हिस्सा कट जाए तो क्या मैं कह दूं कि कुछ नहीं गया! लेकिन पराजय की इस पीड़ा में भी अपनी जबाबदेही से बचने या सदन से कतराने की उन्होंने कोशिश नही की.

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तीखी आलोचना बीच भी संसद में डटे रहे

खराब सेहत के बीच भी सदन की कार्यवाही में अपनी सक्रिय भागीदारी को लेकर नेहरू सजग रहे. सदन के जरिये वे लगातार देश की जनता और व्यवस्था के अन्य अंगों को इस नाजुक सवाल पर भरोसे में लेते रहे. 16 अगस्त 1961 से 12 दिसम्बर 1962 के मध्य सदन की बैठकों में उन्होंने चीन के संबंध में 32 अवसरों पर बयान दिए अथवा बहस में हस्तक्षेप किया. ये बयान लगभग दो सौ पृष्ठों में एक लाख चार हजार शब्द समेटे हुए हैं.

12 से 14 नवम्बर 1962 के तीन दिनों में सदन के 165 सदस्यों ने चीन हमले को लेकर अपने विचार रखे. रक्षा तैयारियों की कमी और देश का सम्मान सुरक्षित रखने में सरकार की विफलता के लिए तीखे प्रहार हुए. पंडित नेहरू सीधे निशाने पर थे. परन्तु पूरे समय वे सदन में बैठे. धैर्यपूर्वक सभी को सुना. रक्षा और विदेश मंत्रालय की दोहरी जिम्मेदारी उनके पास थी. विस्तार से उन्होंने उत्तर दिया और सदन को आश्वस्त किया कि चीन के हमले से जुड़ा कागज का हर पुर्जा सदन के समक्ष रखा जाएगा.

पंचशील और शांति प्रयासों के लिए निरंतर आलोचना का केंद्र बने नेहरू देश की सुरक्षा के लिए सैन्य शक्ति को सुदृढ़ करने के लिए भी सचेत थे. 10 अगस्त 1960 को लोकसभा में परमाणु ऊर्जा विभाग की एक विस्तृत रिपोर्ट पर चर्चा के दौरान उन्होंने कहा था, ‘जहां तक हमारा संबंध है, हमने एटम बम या इसी प्रकार की चीजें न बनाने का निश्चय किया है. लेकिन इस नई शक्ति के इस्तेमाल की उन्नति में पीछे रहने का हमारा कोई इरादा नहीं है. यह सच है कि जिस देश ने परमाणु ऊर्जा का पूरी तरह विकास कर लिया है, वह अंततः इसे अच्छे या बुरे प्रयोजनों के लिए इस्तेमाल कर सकता है. मैं आज जो कह रहा हूं वह जरूरी नहीं है कि भविष्य के लोगों पर बंधन होगा. लेकिन मुझे आशा है कि हम इस देश में ऐसा वातावरण बनाएंगे जिससे कोई भी सरकार भविष्य में इसका प्रयोग बुरे प्रयोजनों के लिए नहीं करेगी.’

अटल बिहारी वाजपेयी.

नेहरू-अटल के रिश्ते; लोकतंत्र की खूबसूरती की मिसाल

पंडित नेहरू और अटल बिहारी के रिश्ते भारतीय राजनीति में हमेशा उत्सुकता और चर्चा का विषय रहे हैं. लोकसभा में अटल बिहारी के पहले भाषण और संसदीय कौशल से पंडित नेहरू इतने प्रभावित हुए थे कि सोवियत संघ के तत्कालीन प्रधानमंत्री के भारत दौरे और उनसे अटल बिहारी की मुलाकात कराते हुए उन्हें भविष्य का प्रधानमंत्री बता दिया था. बावजूद इसके अटल बिहारी ने कश्मीर, चीन सहित तमाम मसलों में नेहरू सरकार को घेरने का कोई मौका नहीं छोड़ा. पर जहां राष्ट्रहित के सवाल आये, वहां वे एक जुट रहे.

20 अप्रैल 1960 को चीन के प्रधानमंत्री चाउ एन लाई की भारत यात्रा के समय संसद का सत्र चल रहा था. उसी दिन प्रश्नकाल में भारत-चीन सीमा विवाद पर अटल बिहारी का एक तारांकित प्रश्न लगा था, जिसका नम्बर पहला था. पंडित नेहरू चीनी प्रधानमंत्री को रिसीव करने एयर पोर्ट जा रहे थे. उन्हें लगा कि इस यात्रा के समय सीमा विवाद से जुड़े प्रश्न पर संसद में चर्चा उचित नहीं होगी.

पंडित नेहरू ने अटल बिहारी वाजपेयी को फोन कर प्रश्न स्थगित करने का अनुरोध किया और अटल बिहारी मान गए थे. पंडित नेहरू के निधन के बाद संसद में अटल बिहारी का श्रद्धांजलि भाषण आज भी दोहराया जाता है. 1977 में जनता पार्टी सरकार में अटल जी विदेश मंत्री बने. अधिकारियों ने विदेश मंत्री कार्यालय कक्ष में लगी पंडित नेहरू की फोटो हटवा दी थी. अटल बिहारी की निगाह उस खाली स्थान पर गई. नेहरू की फोटो लगने के बाद ही वे अपनी कुर्सी पर बैठे. 27 मई 1996 को लोकसभा में अपने प्रसिद्ध विश्वास मत भाषण के दौरान अटल बिहारी ने कहा था, पंडित नेहरू ने लोकतंत्र की जड़ें मजबूत कीं. अगर वे चाहते तो इस देश में लोकतंत्र की जगह कुछ और भी हो सकता था, लेकिन उन्होंने लोकतांत्रिक परंपराओं को मजबूत किया.

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