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Watermelon: न तमिलनाडु, न आंध्र प्रदेश, भारत में कहां है तरबूज का गढ़? UAE-मालदीव तक डिमांड

उत्तर भारत हो या मध्य, तरबूज वो फल है जिसकी मांग खत्म नहीं होती. इसकी एक वजह यह भी है कि तरबूज अब सिर्फ एक फल नहीं रहा. यह फूड के एक्सपेरिमेंट का आधार बन गया है. तरबूज और इसका रस ही नहीं, अब इसे स्मूदी, मॉकटेल, शरबत, फ्लेवर वाली मिठाइयों और कैंडी बनाने में भी इस्तेमाल किया जा रहा है. वर्ल्ड पॉपुलेशन रिव्यू के आंकड़े बताते हैं कि तरबूज की पैदावर में चीन आगे है. यह हर साल 60,386,121 मीट्रिक टन तरबूज उगाता है.

Watermelon: न तमिलनाडु, न आंध्र प्रदेश, भारत में कहां है तरबूज का गढ़? UAE-मालदीव तक डिमांड
Watermelon: न तमिलनाडु, न आंध्र प्रदेश, भारत में कहां है तरबूज का गढ़? UAE-मालदीव तक डिमांड

दूसरे पायदान पर तुर्किए है और देश-दुनिया को सबसे ज्यादा तरबूज देने के मामले में भारत तीसरे नम्बर पर है. भारत में हर साल 3,308,000 मीट्रिक टन तरबूज उगाया जाता है. भारतीय तरबूज की कितनी मांग है यह इससे समझा जा सकता है कि दुनिया के दर्जनों देश इसे आयात करते हैं.संयुक्त अरब अमीरात, मालदीव, कतर, भूटान और बहरीन समेत कई देश भारतीय तरबूज के मुरीद हैं. भारत में तरबूज की बड़े स्तर पर पैदावार के पीछे कुछ चुनिंदा राज्य हैं. जानिए, देश को कौन सा राज्य सबसे ज्यादा तरबूज देता है और क्यों.

भारत में कहां है तरबूज का गढ़?

देश को सबसे ज्यादा तरबूज देने में उत्तर प्रदेश सबसे आगे है. भारत में जितना भी तरबूज पैदा होता है, उसमें 21 फीसदी हिस्सेदारी अकेले उत्तर प्रदेश की है. उत्तर प्रदेश के बाद कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तामिलनाडु और महाराष्ट्र का नम्बर आता है. इन राज्यों में तापमान और मिट्टी इसकी पैदावार के लिए परफेक्ट मानी जाताी है. तरबूज कितना पैदा होगा यह सिंचाई और बारिश पर भी निर्भर करता है, लेकिन इसके बावजूद उत्तर प्रदेश सबसे ज्यादा तरबूज की पैदावार में पहले स्थान पर बना हुआ है.

तरबूज और इसका रस ही नहीं, अब इसे स्मूदी, मॉकटेल, शरबत, फ्लेवर वाली मिठाइयों और कैंडी बनाने में भी इस्तेमाल किया जा रहा है.

उत्तर प्रदेश तरबूज उगाने में सबसे आगे क्यों?

अब सवाल है कि तरबूज तो कई राज्यों में उग रहा है फिर उत्तर प्रदेश कैसे आगे निकल गया. तरबूज वो फसल है जो कुछ ही महीनों में तैयार हो जाता है. यही वजह है कि यहां इसकी खेती अधिक होती है और मौसम-मिट्टी भी इसमें मदद करती है. यह बलुई मिट्टी में सबसे ज्यादा पैदावर देता है. इस मिट्टी में पानी नहीं रुकता और बेहतर जल निकासी के साथ जड़ें गहरी हो जाती हैं. यही तरबूज की खेती के एक सबसे जरूरी शर्त है जो उत्तर प्रदेश की मिट्टी में पूरी होती है.

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उत्तर प्रदेश सबसे ज्यादा तरबूज की पैदावार में पहले स्थान पर बना हुआ है.

यही नहीं, उत्तर प्रदेश की गंगा और यमुना नदियों के किनारे की जमीन यानी दोआब क्षेत्र इसी बलुई दोमट मिट्टी से भरपूर है. आगरा, मथुरा, इटावा, प्रयागराज, वाराणसी और मिर्जापुर जैसे जिलों में नदियों के किनारे की जमीन पर हर साल किसान बंपर तरबूज उगाते हैं. यहां का pH स्तर भी 6 से 7 के बीच रहता है, जो इसकी खेती के लिए आदर्श है. दूसरे राज्यों में भारी या चिकनी मिट्टी की समस्या है. यही वजह है कि यूपी की जमीन हर साल करोड़ों रुपयों की फसल देती है.

आगरा, मथुरा, इटावा, प्रयागराज, वाराणसी और मिर्जापुर में बंपर पैदावार होती है.

यूपी का तरबूज ज्यादा रसीला, मीठा और जल्दी पकता है

तरबूज के बीजों के अंकुरण के लिए 22 से 25 डिग्री सेल्सियस तापमान और पकने के लिए 30 से 35 डिग्री सेल्सियस तापमान जरूरी है. उत्तर प्रदेश जलवायु के मानकों पर खरा उतरता है. यहां फरवरी के अंत में तरबूज की बुआई शुरू होती है और मई-जून तक फसल पूरी तरह से तैयार हो जाती है. इसी दौर की गर्मी में इसकी सबसे ज्यादा मांग होती है. यहां गर्मी के मौसम में अधिक नमी नहीं होती यही वजह है कि यहां का तरबूज ज्यादा मीठा और रसीला होने के साथ जल्दी पकता है.

फरवरी के अंत में तरबूज की बुआई शुरू होती है और मई-जून तक फसल पूरी तरह से तैयार हो जाती है.

कितने देशों में भारतीय तरबूज की मांग?

भारतीय तरबूज का सबसे बड़ा खरीदार संयुक्त अरब अमीरात है. इसके मालदीव, भूटान, कतर, बहरीन और नेपाल उन देशों में शामिल हैं जहां बड़ी तादात में भारत तरबूज एक्सपोर्ट करता है. तरबूज का इतिहास 5 हजार साल पुराना है. मान्यताओं में दावा किया जाता है इसकी सबसे पहली पैदावार प्राचीन मिस्र में हुई, जहां इसे अक्सर राजाओं की कब्र में रखा जाता था ताकि मरने के बाद उन्हें पोषण मिलता रहे.

तरबूज आमतौर पर लाल होता है क्योंकि इसमें लायकोपीन पाया जाता है. यह एंटीऑक्सीडेंट इसे लाल रंग देता है, जो टमाटर में भी पाया जाता है लेकिन वर्तमान में तरबूत पीले, नारंगी और सफेद गूदे वाले भी मार्केट में उपलब्ध हैं.

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