421 साल पहले यानी आज के दिन को मुगल इतिहास एक बड़े बदलाव का साक्षी बना. अकबर के पुत्र शहजादा सलीम ने इसी दिन आगरा में सत्ता संभाली थी, जो बाद में जहांगीर के नाम से जाना गया. यह उत्तराधिकार सरल नहीं था. सलीम ने अपने पिता अकबर के खिलाफ बगावत की थी. दरबार में उसके विरोधी भी थे. अकबर के अंतिम दिनों में यह सवाल उठने लगा था कि मुगल तख्त पर सलीम बैठेगा या उसका बेटा खुसरो?

आइए, जानते हैं कि पिता बादशाह अकबर से बगावत करके शहजादा सलीम कैसे बना बादशाह जहांगीर? उसके कौनकौन से फैसले पसंद किए गए, किसका हुआ विरोध?
सलीम और अकबर के बीच बढ़ती दूरी
सलीम, अकबर का सबसे बड़ा बेटा था. उसका जन्म 1569 में हुआ था. अकबर ने उसका नाम सूफी संत शेख सलीम चिश्ती के नाम पर रखा. बचपन में वह शहजादा था और उसे शासन तथा सेना से जुड़े काम सौंपे गए. लेकिन बड़े होने के साथ पितापुत्र के रिश्ते समय के साथ तनावपूर्ण होते गए. सलीम को लगता था कि अकबर उसे सत्ता में पर्याप्त महत्व नहीं दे रहे. वह अपने लिए स्वतंत्र शक्ति और समर्थक जुटाने लगा.
बादशाह जहांगीर.
15991600 के आसपास उसने इलाहाबाद में अपना अलग दरबार बनाया. उसने अपने नाम से सिक्के जारी किए और कुछ इलाकों से राजस्व भी अपने नियंत्रण में लिया. यह केवल नाराजगी नहीं थी. यह अकबर की सत्ता को सीधी चुनौती थी. सलीम की बगावत ने दरबार को दो हिस्सों में बांट दिया. कुछ अमीर उसके साथ थे.
कुछ अकबर के प्रति वफादार रहे. सलीम का सबसे गंभीर कदम अबुल फजल की हत्या से जुड़ा था. अकबर के करीबी सलाहकार अबुल फजल को 1602 में बुंदेला सरदार वीरसिंह देव ने मार डाला. सलीम पर इस हत्या की योजना में भूमिका का आरोप लगाया गया. इस घटना ने अकबर और सलीम के बीच भरोसा और कम कर दिया.
क्या अकबर खुसरो को उत्तराधिकारी बनाना चाहते थे?
सलीम के विद्रोह के कारण अकबर के सामने उत्तराधिकार का कठिन सवाल था. दरबार के कुछ प्रभावशाली लोगों ने सलीम के बेटे खुसरो को बेहतर विकल्प माना. खुसरो को युवा, संयमी और लोकप्रिय बताया जाता था. आमेर के राजा मानसिंह और मिर्जा अजीज कोका जैसे अमीरों के नाम भी इस राजनीतिक खींचतान में सामने आते हैं. अकबर की बीमारी के समय दरबार में अलगअलग गुट सक्रिय थे. कुछ लोग खुसरो के पक्ष में थे. सलीम के समर्थक भी उत्तराधिकार तय करने में जुटे थे. ऐसी स्थिति में अकबर की मृत्यु के बाद सत्ता संघर्ष का खतरा बहुत बढ़ गया था.
मुगल बादशाह अकबर.
अकबर की मृत्यु और सलीम का राज्यारोहण
अकबर की मृत्यु अक्टूबर 1605 में हुई. उसके बाद सलीम के समर्थकों ने तेजी से काम किया. उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि खुसरो या कोई दूसरा दावेदार तख्त तक न पहुंच सके. सलीम को आगरा में बादशाह घोषित किया गया. उसने नूरुद्दीन मुहम्मद जहांगीर बादशाह गाजी की उपाधि अपनाई. सलीम के सत्ता में आने का कारण केवल उसका राजवंशीय अधिकार नहीं था. उसके पास दरबार में समर्थक थे. वह लंबे समय से प्रशासन और सेना से जुड़ा था.
अकबर के शासन के अंतिम वर्षों में वह अपनी अलग राजनीतिक ताकत बना चुका था. अकबर के जीवित रहते हुए भी उसने स्वतंत्र शासन की कोशिश की थी. इसलिए सत्ता संभालने के समय उसके पास अपने पक्ष में काम करने वाला एक समूह मौजूद था.
गद्दी संभालने के बाद सुलह के फैसले
बादशाह बनने के बाद जहांगीर ने कुछ ऐसे कदम उठाए जिनका उद्देश्य पुराने विरोध को कम करना था. उसने अकबर के कई अधिकारियों और अमीरों को उनके पदों पर बने रहने दिया. कुछ पुराने विरोधियों को भी माफ किया. इससे प्रशासन में अचानक बदलाव नहीं हुआ और दरबार में स्थिरता बनी रही. जहांगीर ने अपने शासन के शुरुआती दौर में कुछ आदेश जारी किए. इनमें कुछ करों को हटाने, यात्रियों की सुरक्षा, मृत व्यक्ति की संपत्ति उसके वारिसों को देने और कुछ खास दिनों में पशुवध रोकने जैसे निर्देश शामिल बताए जाते हैं.
उसने नशे से जुड़ी वस्तुओं पर रोक की घोषणा भी की. इन आदेशों से उसने न्यायप्रिय और जनहित की चिंता करने वाले शासक की छवि बनानी चाही. उसने न्याय की जंजीर का भी उल्लेख किया. यह जंजीर महल के बाहर लगाई गई थी. दावा था कि कोई भी फरियादी इसे खींचकर सीधे बादशाह तक अपनी शिकायत पहुंचा सकता है. यह विचार लोगों को पसंद आ सकता था, क्योंकि इससे न्याय तक पहुँचने का प्रतीकात्मक रास्ता मिलता था.
किन फैसलों का विरोध हुआ?
जहांगीर के शुरुआती मेलमिलाप के बावजूद सत्ता की लड़ाई खत्म नहीं हुई. 1606 में खुसरो ने विद्रोह कर दिया. वह आगरा से निकला और पंजाब की ओर बढ़ा. उसके साथ कुछ समर्थक भी जुड़ गए. जहांगीर ने सेना के साथ उसका पीछा किया. खुसरो हार गया और बंदी बना लिया गया. इस विद्रोह को दबाने के बाद जहांगीर ने कठोर कार्रवाई की. खुसरो के कई साथियों को दंड दिया गया. खुसरो को कैद में रखा गया.
इससे यह साफ हुआ कि जहांगीर अपने उत्तराधिकार को चुनौती देने वाले किसी भी दावेदार को सहन नहीं करेगा. खुसरो को मदद देने के आरोप में सिख गुरु अर्जुन देव को भी दंडित किया गया. इस घटना का सिख इतिहास पर गहरा असर पड़ा. इसे जहांगीर के शासन के सबसे विवादास्पद फैसलों में गिना जाता है. जहांगीर की न्याय और उदारता की छवि के साथ यह कठोर कदम मेल नहीं खाता था. इससे धार्मिक समुदायों और मुगल सत्ता के संबंधों में तनाव पैदा हुआ.
शासन में नूरजहां और दरबार की राजनीति
जहांगीर के शासनकाल में नूरजहाँ का प्रभाव भी बढ़ा. उसने प्रशासन और दरबार की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उसके परिवार के लोग भी ऊंचे पदों पर पहुंचे. कुछ दरबारी इस प्रभाव को पसंद करते थे, जबकि दूसरे अमीर इससे असहज थे. शहजादों और अमीरों के बीच प्रतिस्पर्धा बनी रही. बाद में शहजादा खुर्रम, जो आगे चलकर शाहजहां बना, भी सत्ता संघर्ष में शामिल हुआ. इस तरह जहांगीर के शासन में केवल पिता और बेटे का विवाद नहीं था. यह दरबार के अलगअलग गुटों, शहजादों और प्रभावशाली परिवारों की सत्ता की लड़ाई भी थी.
जहांगीर के फैसलों का मिलाजुला असर भी दिखा
जहांगीर की गद्दी तक पहुंचने की कहानी में सुलह और दमन दोनों दिखाई देते हैं. उसने कुछ पुराने विरोधियों को माफ किया और जनहित के आदेश जारी किए. इससे शासन में स्थिरता लाने की कोशिश हुई. दूसरी ओर, खुसरो के विद्रोह और गुरु अर्जुन देव को दंड देने जैसे फैसलों ने विरोध और असंतोष को बढ़ाया. सलीम ने अकबर के खिलाफ विद्रोह किया था. फिर भी वह मुगल तख्त पर बैठने में सफल हुआ, क्योंकि उसके पास राजवंशीय दावा, दरबारी समर्थन और सत्ता पर नियंत्रण था.
अकबर की मृत्यु के बाद उसके समर्थकों ने तेजी से कदम उठाए. इस तरह शहजादा सलीम जहांगीर बना. उसका राज्यारोहण केवल एक राजकुमार के बादशाह बनने की घटना नहीं था. यह मुगल दरबार की राजनीति, उत्तराधिकार की अनिश्चितता और सत्ता बचाने के कठोर तरीकों की कहानी भी थी.