उत्तर प्रदेश की इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अलीगढ़ पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए. अलीगढ़ के थाना क्वार्सी से जुड़े एक मामले में कोर्ट ने अरेस्ट मेमो में कथित हेरफेर और कोर्ट में गलत दस्तावेज पेश किए जाने को गंभीरता से लिया. जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की खंडपीठ ने आरोपी को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया.

साथ ही, उन्होंने रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया कि वे दोषी पुलिसकर्मियों के आचरण की BNSS की धारा 379 के तहत जांच शुरू करें और यह सुनिश्चित करें कि उनके खिलाफ किसी सक्षम अदालत में मामला दर्ज किया जाए. याचिकाकर्ता को दिए गए गिरफ्तारी मेमो और हाई कोर्ट में राज्य सरकार की ओर से दाखिल जवाबी हलफनामे के साथ लगाए गए मेमो में अंतर पाया गया.
कोर्ट ने पाया कि गिरफ्तारी मेमो के कुछ कॉलम में गिरफ्तारी के बाद और रिमांड की कार्यवाही पूरी होने के बाद विवरण जोड़े गए थे. कोर्ट ने यह भी संभावना जताई कि बदलाव बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल होने के बाद किए गए.
पुलिस चौकी पर CCTV को लेकर भी सवाल
पुलिस की ओर से हलफनामे में चौकी पर CCTV कैमरे नहीं होने की बात कही गई थी, जबकि याचिकाकर्ता की ओर से दाखिल तस्वीरों में चौकी के प्रवेश द्वार पर कैमरे दिखाई दिए. इस पूरे मामले को लेकर जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की पीठ की सख्त टिप्पणी की. पीठ ने कहा कि पुलिस की कार्रवाई को गिरफ्तारी मेमो में कथित जालसाजी और न्यायालय के समक्ष झूठी गवाही से जुड़ा गंभीर मामला माना.
रजिस्ट्रार जनरल को जांच के निर्देश
हाईकोर्ट ने रजिस्ट्रार जनरल को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 379 के तहत जांच की प्रक्रिया आगे बढ़ाने और प्रथमदृष्टया अपराध पाए जाने पर संबंधित लोगों के खिलाफ सक्षम न्यायालय में शिकायत दर्ज कराने के निर्देश दिए. कोर्ट ने गिरफ्तारी के आधार पर्याप्त और स्पष्ट नहीं होने के कारण बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार कर ली. निर्देश दिया कि यदि याचिकाकर्ता किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है, तो उसे तत्काल रिहा किया जाए.
रिहाई का मतलब आरोपों से बरी होना नहीं
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि रिहाई का आदेश मूल जालसाजी के मामले में आरोपों की सत्यता पर कोई फैसला नहीं है. न ही उसका बरी होना है.