देश के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित औद्योगिक घरानों में शुमार टाटा ग्रुप (Tata Group) के लिए आज का दिन काफी अहम साबित होने वाला है. 8 मई को टाटा ट्रस्ट्स के बोर्ड की एक बेहद महत्वपूर्ण बैठक आयोजित हो रही है. इस बैठक का मुख्य एजेंडा ‘टाटा संस’ (Tata Sons) की संभावित शेयर बाजार लिस्टिंग (IPO) है. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के नए और सख्त नियमों ने कंपनी पर पब्लिक होने का भारी दबाव बना दिया है. दिलचस्प बात यह है कि इस लिस्टिंग को लेकर खुद टाटा परिवार के भीतर एक राय नहीं है. एक तरफ जहां कुछ ट्रस्टी इसे पारदर्शिता की दिशा में उठाया गया कदम मान रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ नोएल टाटा इसके सख्त खिलाफ हैं.

क्या खत्म हो गए हैं टाटा के पास सारे विकल्प?
टाटा संस के सामने सबसे बड़ी चुनौती भारतीय रिजर्व बैंक की नई गाइडलाइंस हैं. 1 जुलाई से लागू होने वाले नियमों के तहत, RBI टाटा संस को एक ‘शैडो बैंक’ (Shadow Bank) यानी सिस्टेमिकली इम्पोर्टेंट नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी (NBFC) का दर्जा देने जा रहा है. इन नियमों के मुताबिक, इस श्रेणी में आने वाली कंपनियों के लिए शेयर बाजार में लिस्ट होना अनिवार्य है.
यह पहली बार नहीं है जब टाटा संस पर यह दबाव पड़ा है. साल 2022 में भी RBI ने कंपनी को ‘अपर-लेयर’ NBFC घोषित करते हुए तीन साल के भीतर पब्लिक होने का अल्टीमेटम दिया था. तब टाटा ग्रुप ने अपने कर्ज का पुनर्गठन करके खुद को गैर-सिस्टेमिक इकाई साबित कर लिया था और प्राइवेट बने रहने में सफल रही थी.
लेकिन अब हालात बदल चुके हैं. RBI ने साफ कर दिया है कि जो शैडो लेंडर्स सीधे आम जनता से फंड नहीं लेते हैं, वे भी इस नियम के दायरे में आएंगे, खासकर तब जब उनकी संपत्ति 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो. रिपोर्ट्स की मानें तो RBI ने अनौपचारिक तौर पर यह भी साफ कर दिया है कि वह टाटा संस को लिस्टिंग से कोई विशेष छूट नहीं देने वाला, क्योंकि इससे भविष्य में अन्य कंपनियों के लिए एक गलत नजीर पेश होगी.
क्यों गहराया है यह अंदरूनी विवाद?
इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा ध्यान खींचने वाली बात टाटा ट्रस्ट्स के भीतर चल रही आपसी खींचतान है. टाटा संस की करीब दो-तिहाई हिस्सेदारी टाटा ट्रस्ट्स के पास है. ट्रस्ट के छह में से दो प्रमुख ट्रस्टी, वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह, मानते हैं कि कंपनी के लिस्ट होने से कामकाज में अधिक पारदर्शिता और वित्तीय अनुशासन आएगा. इसके ठीक विपरीत, अपने सौतेले भाई रतन टाटा के निधन के बाद समूह पर अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहे नोएल टाटा इस आईपीओ के सख्त खिलाफ हैं.
उनका विरोध इस हद तक है कि फरवरी में जब टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन के तीसरे कार्यकाल पर चर्चा हो रही थी, तब ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक नोएल टाटा ने उनसे यह आश्वासन मांगा था कि होल्डिंग कंपनी को लिस्ट नहीं किया जाएगा. जब चंद्रशेखरन ने यह गारंटी देने से इनकार कर दिया, तो टाटा संस बोर्ड ने उनकी पुनर्नियुक्ति पर वोटिंग ही टाल दी. 8 मई की बैठक में नए नॉमिनी की नियुक्ति पर भी चर्चा होनी है, जिसे उद्योग जगत नोएल टाटा की अपनी ताकत बढ़ाने की एक रणनीतिक चाल मान रहा है.
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अगर आया IPO, तो किसे होगा सबसे बड़ा फायदा?
निवेशक हमेशा से टाटा ग्रुप की कंपनियों पर भरोसा जताते आए हैं. अगर टाटा संस बाजार में उतरती है, तो यह भारतीय शेयर बाजार के लिए एक ऐतिहासिक घटना होगी. हालांकि, इस पूरी प्रक्रिया का सबसे बड़ा और सीधा फायदा शापूरजी पालोनजी (Shapoorji Pallonji) ग्रुप को होने वाला है. इस ग्रुप के पास टाटा संस में 18.4% की भारी-भरकम अल्पांश हिस्सेदारी है. शापूरजी ग्रुप ने अपनी इस हिस्सेदारी को गिरवी रखकर बाजार से काफी महंगा कर्ज उठाया हुआ है.
शापूर मिस्त्री और उनके परिवार की कुल संपत्ति 32 बिलियन डॉलर आंकी जाती है, जिसका करीब 75% हिस्सा सिर्फ टाटा संस के शेयरों में फंसा हुआ है. वर्तमान में ये शेयर ‘इलिक्विड’ हैं, जिन्हें तुरंत नकदी में नहीं बदला जा सकता. शापूरजी ग्रुप पहले ही लिस्टिंग का खुलकर समर्थन कर चुका है, क्योंकि अगर कंपनी पब्लिक होती है, तो उनकी इस हिस्सेदारी की सही वैल्यू अनलॉक हो जाएगी.





