Motab Sheikh: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में कांग्रेस को केवल दो सीटों पर जीत मिली, लेकिन इनमें से एक जीत ने पूरे चुनाव की सबसे दिलचस्प कहानी लिख दी. फरक्का विधानसभा सीट से कांग्रेस उम्मीदवार मोताब शेख ने न सिर्फ चुनाव जीता, बल्कि उससे पहले वोटर लिस्ट से अपना नाम कटने के खिलाफ लंबी कानूनी लड़ाई भी लड़ी. जिस वक्त दूसरे उम्मीदवार चुनाव प्रचार में व्यस्त थे, उस समय मोताब शेख अदालतों और सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगा रहे थे. लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और आखिरकार वही शख्स विधायक बन गया, जिसका नाम कुछ हफ्ते पहले तक मतदाता सूची में ही मौजूद नहीं था.

SIR में नाम कटने से बढ़ी थी मुश्किलें
चुनावी प्रक्रिया शुरू होने से पहले स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के दौरान मोताब शेख का नाम वोटर लिस्ट से हटा दिया गया. यह उनके लिए बड़ा झटका था, क्योंकि बिना वैध मतदाता बने वह चुनाव नहीं लड़ सकते थे. मोताब शेख ने पहले स्थानीय स्तर पर अपना नाम जुड़वाने की कोशिश की, लेकिन जब कोई समाधान नहीं निकला तो उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. चुनाव नजदीक थे और समय तेजी से निकल रहा था.
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सुप्रीम कोर्ट से मिली बड़ी राहत
मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने नवगठित अपीलीय न्यायाधिकरण को शेख के मामले की समीक्षा करने का निर्देश दिया. खास बात यह थी कि यह ट्रिब्यूनल 5 अप्रैल को बना था और अगले ही दिन पहले चरण के उम्मीदवारों के नामांकन शुरू होने वाले थे. फरक्का सीट पर भी पहले चरण में मतदान होना था, इसलिए मोताब शेख के पास बेहद कम समय बचा था. लेकिन सुप्रीम कोर्ट में समय पर दाखिल की गई अपील ने उन्हें राहत दिला दी.
दस्तावेज सही मिले, फिर जुड़ा नाम
अपीलीय न्यायाधिकरण ने मोताब शेख के सभी दस्तावेजों की जांच की. पासपोर्ट समेत दूसरे आधिकारिक कागजात में कोई गड़बड़ी नहीं मिली. यहां तक कि उनके पिता के नाम को लेकर भी कोई विसंगति सामने नहीं आई. ट्रिब्यूनल की अध्यक्षता कर रहे कलकत्ता हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश टीएस शिवज्ञानम ने अपने आदेश में कहा कि चुनाव आयोग तकनीकी कारणों का हवाला देता रहा, लेकिन हटाए जाने की प्रक्रिया का स्पष्ट विवरण नहीं दे सका. इसके बाद ट्रिब्यूनल ने मोताब शेख को वैध मतदाता मानते हुए उनका नाम फिर से वोटर लिस्ट में शामिल करने का आदेश दिया.
27 लाख आवेदनों में पहला मंजूर मामला
मोताब शेख का मामला इसलिए भी खास बन गया क्योंकि वह लगभग 27 लाख आवेदकों में पहले ऐसे व्यक्ति थे, जिनका आवेदन मंजूर किया गया. बताया जाता है कि उस समय तक अपीलीय प्रक्रिया में बेहद कम मामलों का निपटारा हुआ था. नाम वापस जुड़ने के बाद मोताब शेख ने राहत की सांस ली और तुरंत अपना नामांकन दाखिल किया. इसके बाद उन्होंने चुनाव प्रचार शुरू किया और जनता के बीच अपनी संघर्ष की कहानी भी रखी.
संघर्ष से जीत तक का सफर
फरक्का विधानसभा सीट पर मुकाबला आसान नहीं था. बीजेपी उम्मीदवार सुधीर चौधरी ने कड़ी टक्कर दी, लेकिन मोताब शेख ने 8 हजार से ज्यादा वोटों से जीत दर्ज की. यह जीत सिर्फ एक चुनावी जीत नहीं थी, बल्कि उस संघर्ष की कहानी बन गई जिसमें एक व्यक्ति ने वोटर लिस्ट से नाम कटने के बाद भी हार नहीं मानी. अदालत से लेकर चुनावी मैदान तक का उनका सफर अब बंगाल चुनाव की सबसे चर्चित कहानियों में शामिल हो चुका है.





