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Nepal Flood: जंग, संधि या गोरखाओं की बहादुरी…अंग्रेज नेपाल को क्यों नहीं बना पाए गुलाम?​

भीषण आपदा की वजह से नेपाल इन दिनों चर्चा में है. अचानक आई बाढ़ ने धनजन की भारी हानि की है. सड़क, पुल के साथ ही अनेक सरकारीनिजी भवन तक इस आपदा के शिकार हुए. टूट गए. बह गए. लेकिन नेपाल इस आपदा से मजबूती से लड़ रहा है. अपने ऊपर आई विपदा से लड़ना […]

भीषण आपदा की वजह से नेपाल इन दिनों चर्चा में है. अचानक आई बाढ़ ने धनजन की भारी हानि की है. सड़क, पुल के साथ ही अनेक सरकारीनिजी भवन तक इस आपदा के शिकार हुए. टूट गए. बह गए. लेकिन नेपाल इस आपदा से मजबूती से लड़ रहा है. अपने ऊपर आई विपदा से लड़ना नेपाल को आता है. समस्याओं से अपने तरीके से निपटना उसे आता है. वहां के लोगों में एक खास जज्बा है. समस्याओं से जूझने की लेगेसी उन्हें भीड़ में अलग खड़ा करती है. इसके अनेक उदाहरण इतिहास में मिलते हैं. इसकी जानकारी सबको होनी चाहिए. आइए, ताजे संदर्भों में जानते हैं कि नेपाल कभी अंग्रेजों का गुलाम क्यों नहीं बना? क्या है आंग्लनेपाल युद्ध, सुगौली संधि? कैसे गोरखा सैनिकों ने दिखाई बहादुरी, जो पूरी दुनिया में आज भी सम्मान की नजर से देखे जाते हैं?

नेपाल दक्षिण एशिया का एक ऐसा देश है, जो ब्रिटिश शासन के समय भी अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखने में सफल रहा. भारत के बड़े हिस्से पर अंग्रेजों का शासन था. श्रीलंका, बर्मा और कई अन्य क्षेत्रों पर भी ब्रिटिश प्रभाव बढ़ चुका था. फिर भी नेपाल पूरी तरह ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा नहीं बना. इसका सबसे बड़ा कारण नेपाली लोगों का मजबूत प्रतिरोध था. नेपाल का पहाड़ी भूगोल भी उसके लिए सुरक्षा कवच बना. ऊंचे पहाड़, गहरी घाटियां, घने जंगल और कठिन रास्ते किसी भी बाहरी सेना के लिए बड़ी चुनौती थे.

नेपाल में एक मजबूत सैन्य परंपरा भी थी. गोरखा शासकों ने अलगअलग पहाड़ी राज्यों को मिलाकर अपना प्रभाव बढ़ाया था. नेपाली सैनिक अनुशासित थे. वे कठिन परिस्थितियों में लड़ने के अभ्यस्त थे. अंग्रेजों ने नेपाल को हराने की कोशिश जरूर की. 1814 से 1816 तक अंग्रेजों और नेपाल के बीच युद्ध हुआ. इस युद्ध के बाद नेपाल को कुछ क्षेत्र छोड़ने पड़े. लेकिन अंग्रेज नेपाल पर अपना सीधा शासन स्थापित नहीं कर सके.

किसने किया गोरखा राज्य का विस्तार?

18वीं शताब्दी में गोरखा राज्य के राजा पृथ्वी नारायण शाह ने नेपाल के एकीकरण की शुरुआत की. उन्होंने छोटेछोटे पहाड़ी राज्यों को अपने अधीन किया. काठमांडू घाटी पर अधिकार मिलने के बाद गोरखा शक्ति और मजबूत हुई. नेपाल का विस्तार पश्चिम और दक्षिण की ओर भी हुआ. नेपाली सेना ने कुमाऊं, गढ़वाल और तराई के कई क्षेत्रों में अपना प्रभाव स्थापित किया. कुछ इलाकों में स्थानीय शासकों और नेपाली अधिकारियों के बीच तनाव भी बढ़ा. इसी समय भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी अपनी शक्ति बढ़ा रही थी.

साल 1814 में अंग्रेजों और नेपाल के बीच युद्ध शुरू हुआ. फोटो: AI Generated

कंपनी का शासन बंगाल से आगे बढ़कर उत्तर भारत तक पहुंच गया था. वह व्यापार के साथसाथ राजनीतिक नियंत्रण भी चाहती थी. नेपाल और अंग्रेजों की सीमाएं कई जगह एकदूसरे के करीब आ गईं. सीमा को लेकर विवाद बढ़ने लगे. दोनों पक्ष एकदूसरे के विस्तार को खतरे के रूप में देखने लगे.

आंग्लनेपाल युद्ध की कहानी भी जानिए

साल 1814 में अंग्रेजों और नेपाल के बीच युद्ध शुरू हुआ. इसे आंग्लनेपाल युद्ध या एंग्लोगोरखा युद्ध भी कहा जाता है. अंग्रेज इस युद्ध को जल्दी जीतना चाहते थे. उनके पास बड़ी सेना थी. आधुनिक हथियार भी. अंग्रेजों ने नेपाल पर कई दिशाओं से हमला किया. उन्होंने पश्चिम में कुमाऊं और गढ़वाल की ओर सेना भेजी. उन्होंने देहरादून और नालापानी क्षेत्र में भी अभियान चलाया. वे मकवानपुर और काठमांडू की दिशा में आगे बढ़ने की योजना बना रहे थे. नेपाल की सेना संख्या में कम थी. उसके पास अंग्रेजों जैसी आधुनिक तोपें नहीं थीं. फिर भी नेपाली सैनिकों ने कड़ा मुकाबला किया.

नालापानी का युद्ध क्यों याद करते हैं लोग?

आंग्लनेपाल युद्ध का प्रमुख प्रसंग नालापानी का युद्ध है. यह युद्ध देहरादून के पास खलंगा किले में हुआ. नेपाली सैनिकों का नेतृत्व बलभद्र कुंवर कर रहे थे. किले में नेपाली सैनिकों की संख्या कम थी. उनके साथ महिलाएं और बच्चे भी मौजूद थे. अंग्रेजी सेना ने किले को चारों ओर से घेर लिया. अंग्रेजों के पास तोपें थीं. उन्होंने कई दिनों तक किले पर हमला किया. इसके बावजूद नेपाली सैनिकों ने आत्मसमर्पण नहीं किया.

अंग्रेजों ने नेपाल को पूरी तरह जीतने की कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हुए. फोटो: Pexels

उन्होंने अपनी सीमित सामग्री से मुकाबला जारी रखा. किले में पानी की भारी कमी हो गई. सैनिकों और आम लोगों को बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ा. अंत में बलभद्र कुंवर ने किला खाली करने का निर्णय लिया. वे बचे हुए सैनिकों के साथ वहां से निकल गए. अंग्रेजों ने किले पर कब्जा तो कर लिया, लेकिन नेपाली सैनिकों की बहादुरी से वे प्रभावित हुए. इस युद्ध में अंग्रेज अधिकारी रॉबर्ट रोलो गिलेस्पी मारे गए. यह घटना अंग्रेजी सेना के लिए बड़ा झटका थी. नालापानी की लड़ाई ने दिखाया कि छोटी नेपाली टुकड़ी भी बड़ी सेना को लंबे समय तक रोक सकती है.

नेपाली सैनिकों की बहादुरी के किससे और भी हैं

नालापानी के अलावा कई अन्य क्षेत्रों में भी नेपाली सैनिकों ने वीरता दिखाई. जैथक और मलाऊं के युद्ध उल्लेखनीय हैं. मलाऊं किले की रक्षा अमर सिंह थापा ने की. वे नेपाली सेना के वरिष्ठ और अनुभवी सेनापति थे. उन्हें नेपाल के महान योद्धाओं में गिना जाता है. अमर सिंह थापा ने पहाड़ी युद्ध की रणनीति अपनाई. उन्होंने ऊंचे स्थानों का लाभ उठाया. नेपाली सैनिकों ने अंग्रेजों को कई बार कठिन स्थिति में डाल दिया. अंग्रेजों के पास अधिक सैनिक और बेहतर हथियार थे. धीरेधीरे उन्होंने अपनी रणनीति बदली. उन्होंने अलगअलग दिशाओं से दबाव बढ़ाया. स्थानीय क्षेत्रों पर कब्जा किया. इससे नेपाली सेना की आपूर्ति और संचार व्यवस्था कमजोर होने लगी.

क्यों पूरी तरह नेपाल को नहीं जीत सके अंग्रेज?

अंग्रेजों ने नेपाल को पूरी तरह जीतने की कोशिश की. लेकिन पहाड़ों में लड़ना उनके लिए आसान नहीं था. सैनिकों को भोजन और हथियार पहुंचाना कठिन था. मौसम भी कई बार उनके खिलाफ रहा. नेपाल की सेना अपने क्षेत्र से परिचित थी. वह पहाड़ी रास्तों, जंगलों और घाटियों का उपयोग करती थी. नेपाली सैनिक अचानक हमला करते थे. फिर सुरक्षित स्थानों पर लौट जाते थे. अंग्रेजों को लगातार नुकसान उठाना पड़ा. उन्हें समझ आ गया कि नेपाल को पूरी तरह जीतना बहुत महंगा साबित हो सकता है. फिर भी उन्होंने कई नेपाली क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया. नेपाल के सामने युद्ध रोकने के अलावा ज्यादा विकल्प नहीं बचे.

आंग्लनेपाल युद्ध के बाद अंग्रेजों ने गोरखा सैनिकों की वीरता को पहचाना. फोटो: PTI

सुगौली संधि की कहानी भी जानें

युद्ध के बाद नेपाल और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच सुगौली संधि हुई. संधि का प्रारंभिक रूप 1815 में तैयार हुआ. बाद में इसे 1816 में अंतिम रूप से स्वीकार किया गया. इस संधि ने नेपाल की सीमाओं और राजनीतिक स्थिति को बदल दिया. संधि के अनुसार नेपाल ने अपने कई क्षेत्र अंग्रेजों को सौंप दिए. इनमें कुमाऊं और गढ़वाल के बड़े हिस्से शामिल थे. नेपाल ने सिक्किम से जुड़े कुछ क्षेत्रों पर भी अपना दावा छोड़ा.

तराई के कुछ हिस्से भी अंग्रेजों के नियंत्रण में चले गए. संधि के बाद काली नदी को नेपाल और ब्रिटिश भारत के बीच सीमा का आधार माना गया. सुगौली संधि नेपाल के लिए कठिन समझौता था. नेपाल ने अपना काफी भूभाग खो दिया, लेकिन उसने अपनी स्वतंत्रता नहीं खोई.

कमाल की है गोरखा सैनिकों की बहादुरी

आंग्लनेपाल युद्ध के बाद अंग्रेजों ने गोरखा सैनिकों की वीरता को पहचाना. उन्होंने नेपाली सैनिकों को अपनी सेना में भर्ती करना शुरू किया. गोरखा सैनिकों की पहचान साहस, अनुशासन और कठिन परिस्थितियों में लड़ने की क्षमता से बनी. वे पहाड़ी इलाकों में तेज गति से चल सकते थे. वे कम साधनों में भी लंबे समय तक टिक सकते थे. उनका पारंपरिक हथियार खुकरी है. यह छोटी, मजबूत और घुमावदार धार वाली तलवार होती है. खुकरी गोरखा सैनिकों की वीरता का प्रतीक बन गई. गोरखा सैनिकों ने बाद में ब्रिटिश सेना के लिए भी युद्ध किए.

वे प्रथम विश्व युद्ध और द्वितीय विश्व युद्ध सहित कई संघर्षों में शामिल हुए. आज भी भारतीय और ब्रिटिश सेनाओं में गोरखा रेजिमेंट की परंपरा मौजूद है. नेपाल और गोरखा सैनिकों का नाम सैन्य इतिहास में सम्मान के साथ लिया जाता है.

नेपाल में बाढ़.

नेपाल की स्वतंत्रता का है खास महत्व

सुगौली संधि के बाद नेपाल की शक्ति कम हुई. उसकी सीमाएं छोटी हो गईं. लेकिन नेपाल पर ब्रिटिश कानून लागू नहीं हुआ. वहां ब्रिटिश प्रशासन नहीं बना. नेपाली राजशाही और स्थानीय शासन व्यवस्था जारी रही. अंग्रेजों ने नेपाल को एक स्वतंत्र, लेकिन प्रभावशाली पड़ोसी के रूप में देखा. नेपाल भारत और तिब्बत के बीच रणनीतिक क्षेत्र में स्थित था. उसे पूरी तरह जीतने के बजाय अंग्रेजों ने उसके साथ राजनीतिक संबंध बनाए रखना अधिक उपयोगी समझा. नेपाल ने भी समझदारी से अपनी स्वतंत्रता बचाई. उसने अंग्रेजों से सीधा टकराव लगातार जारी नहीं रखा. उसने संधि के बाद राजनयिक संबंधों का रास्ता अपनाया.

इस इतिहास से एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है. बड़ी सेना और आधुनिक हथियार हमेशा जीत की गारंटी नहीं देते. कठिन भूगोल, मजबूत नेतृत्व और सैनिकों का मनोबल भी युद्ध का परिणाम बदल सकते हैं. गोरखा सैनिकों की बहादुरी इसी का महत्वपूर्ण उदाहरण है.

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संपादकीय टीम

खबर मंकी की अनुभवी एडिटोरियल डेस्क। हमारे लेखक और संपादक दिन-रात निष्पक्ष, सटीक और तीव्र समाचार आप तक पहुँचाने के लिए काम करते हैं।

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