Wednesday, April 22, 2026
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Matka King: सट्टा में ईमानदारी का क्राइम ड्रामा…’मटका किंग’ किसकी कहानी? विजय वर्मा का यादगार किरदार

‘मटका किंग’ का एक सीन है, जहां बोर्ड पर लिखा है- ईमानदार सट्टा. इस वेब सीरीज को देखने वाले या इस सीन के बारे में जानने वाले तंज में हंस सकते हैं- सट्टा भला ईमानदार कैसे हो सकता है! सट्टा का सारा खेल ही बेईमानी पर टिका होता है, चतुराई के बिना सट्टा का खिलाड़ी होना असंभव है. लेकिन नहीं, जैसे-जैसे आप इस सीरीज की कहानी में एपिसोड दर एपिसोड आगे बढ़ते जाते हैं- एक ऐसे शख्स का सामना करते हैं जो सरकार और कानून की नाक के नीचे खुल्लमखुल्ला काला कारोबार चलाता है जबकि ईमानदारी की बातें करता है. उसे बेईमानी से सख्त नफरत है, और ईमानदारी से धंधा चलाने का मिशन है.

Matka King: सट्टा में ईमानदारी का क्राइम ड्रामा…’मटका किंग’ किसकी कहानी? विजय वर्मा का यादगार किरदार
Matka King: सट्टा में ईमानदारी का क्राइम ड्रामा…’मटका किंग’ किसकी कहानी? विजय वर्मा का यादगार किरदार

जी हां, आपने सही पढ़ा. आठ एपिसोड की मटका किंग ईमानदारी से जुए का काला कारोबार करने वाले बृज भट्टी की कहानी है. बात थोड़ी अटपटी जरूर लगेगी लेकिन यही इसकी यूएसपी है. इस ग्रे रोल को एक बार फिर से विजय वर्मा ने निभाया है, जो कि दहाड़, डार्लिंग्स या कालकूट में अपने खास रोल के लिए जाने जाते हैं. बृज भट्टी को उम्मीद, सपने, सफलता और ईमानदारी से बेहद लगाव है. इन्हीं शब्दों की बदौलत वह हर किसी का दिल जीतने में माहिर है और एक दिन शहर का सबसे बड़ा जुआरी भी बनता है. बड़े बड़े लोग उसकी कला के मुरीद हैं.

साठ-सत्तर के दशक का लुभावना रेट्रो

‘मटका किंग’ के निर्देशक नागराज मंजुले हैं और प्रोड्यूसर सिद्धार्थ रॉय कपूर. सीरीज में विजय वर्मा के अलावा गुलशन ग्रोवर, कृतिका कामरा, साई तम्हांकर, सिद्धार्थ जाधव, विनीत कुमार सिंह और भूपेंद्र जाड़ावत आदि मुख्य कलाकार हैं. सीरीज की कहानी हमें साठ के दशक में ले जाती है. पहले सीजन में सन् 1963 से लेकर 1975 तक की कहानी दिखाई गई है. बैकग्राउंड मुंबई का है. सीरीज में आपातकाल का भी जिक्र है और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को भी दिखाया जाता है. मुंबई टेक्सटाइल्स कंपनी के हड़ताली मजदूर हैं तो अंडरवर्ल्ड का बढ़ता खौफ भी. पत्रकारिता भी है, जहां ईमानदार पत्रकार है और समझौता करके बिजनेस चलाने वाला संपादक भी. कहानी में दोनों की टकराव का भी रोचक ड्रामा है.

‘मटका किंग’ रेट्रो सीन से भरी सीरीज है. दर्शकों को इसे देखना सुहावना लगता है. लेकिन इसकी कहानी उतना ही चौंकाती है. यकीन करना मुश्किल सा लग सकता है कि क्या वाकई साठ और सत्तर के दशक में मुंबई में कोई बृज भट्टी जैसा शख्स भी था जिसने जुए के काले कारोबार को मायानगरी से निकालकर पूरे देश तक पहुंचाया. कइयों को मालामाल बनाया तो कइयों को कंगाल भी बनाया. देखते-देखते जब वह सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गया तब महाराष्ट्र सरकार को भी उसके नेटवर्क को ध्वस्त करने के लिए अपनी लॉटरी शुरू करनी पड़ी. लेकिन बृज को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा. उसने इसकी भी काट निकाल ली.

‘मटका किंग’ की कहानी क्या है?

आखिर ये ‘मटका किंग’ वास्तव में किससे प्रेरित कहानी है, ये भी जानना जरूरी है. लेकिन उससे पहले सीरीज की कहानी की बात कर लेते हैं. बृज भट्टी बहुत ही गरीब परिवार से ताल्लुक रखता है. विभाजन के बाद कराची से मुंबई आया है. उसकी पत्नी है- बरखा (साईं तम्हांकर). वह सेठ लालजी भाई (गुलशन ग्रोवर) के यहां नौकरी करता है. लालजी भाई अपने मुख्य कारोबार के साथ-साथ जुए का अड्डा भी चलाता है. यहां उसे काम करते हुए पता चलता है कि उसका सारा खेल बेईमानी पर टिका है. इसके बाद वह प्रण लेता है कि वह भी जुए का कारोबार चलाएगा लेकिन ईमानदारी की बदौलत. कभी बेईमानी नहीं करेगा. आगे चलकर उसे शहर की रईस पारसी गुलरुख (कृतिका कामरा) भी मिलती है, लेकिन ईमानदारी उसके धंधे की बुनियाद है. इसके बाद उसे क्या-क्या झेलना पड़ता है, परिवार में क्या-क्या होता है, वह कैसे फिल्म फायनेंसर भी बनता है- ये सबकुछ जानने के लिए आप अमेजन प्राइम वीडियो पर सीरीज देखें.

विजय वर्मा का रोल किससे प्रेरित?

अब आपको बताते हैं कि आखिर ये बृज भट्टी का किरदार किसकी रियल लाइफ से प्रेरित है. बृज भट्टी वास्तव में मुंबई का कुख्यात जुआरी और व्यापारी रतन खत्री की जिंदगी से प्रेरित है. वह आजादी के बाद पाकिस्तानी शरणार्थी बना. मुंबई में बसेरा बनाया. गुजारे के लिए कई जगहों पर छोटे मोटे काम किए और इसी दौरान उसने जुए का खेल शुरू किया. साठ और सत्तर के दशक के अंतराल में रतन खत्री मुंबई में अंडरवर्ल्ड सट्टेबाजी का बादशाह कहलाया. वह रोजाना उस दौर में भी लाखों कमाता था. नगदी संभालने के लिए उसने कई गैरकानूनी काम किए. उसके मटके की फ्रेंचायजी चलती थी. उसके बारे में ऐसा भी कहा जाता है कि वह इंडस्ट्री में कई फिल्मों में पैसे भी लगाता था. इमरजेंसी के दौरान उसके जुए के अड्डों पर छापे पड़े. उसका काला कारोबार सिमटा और उसे गिरफ्तार भी किया गया.

इसमें कोई दो राय नहीं कि मटका किंग की मेकिंग लुभावनी है. विजय वर्मा के साथ-साथ गुलशन ग्रोवर, कृतिका कामरा, साई तम्हांकर, सिद्धार्थ जाधव, विनीत कुमार सिंह और भूपेंद्र जाड़ावत आदि सभी कलाकारों ने बेहतरीन अदाकारी दिखाई है. नागराज का निर्देशन भी प्रभावित करने वाला है. सीरीज में साठ के दशक की मुंबई, कपास मिल, तब के लोग, परिवहन, पोशाकें, बोलचाल भाषा आदि का बखूबी ध्यान रखा गया है. खासकर मुंबइया मराठी के साथ हिंदी का मिश्रण सुनने में मधुर लगता है.लेकिन सीरीज में कई ऐसे सीन हैं जो जस्टीफाई नहीं करते.

काले कारोबारी की ईमानदारी समझ से परे

सीरीज में दिखाया गया है कि दगड़ू जैसे एक सामान्य शख्स के फोन करने पर सीबीआई की टीम तुरंत बृज को उसकी शादी के समय ही गिरफ्तार करने आ जाती है, यह बहुत तार्किक नहीं लगता. वहीं सीरीज में दगड़ू की प्रेमिका सुलभा का क्या होता है, ये भी पता नहीं चलता. इसके अलावा भी कई प्रश्न अनुत्तरित हैं, संभव है दूसरे सीजन में उसके जवाब मिले. लेकिन एक बात जो खटकती है वह है बृज भट्टी की ईमानदारी वाली फिलॉस्फी. सट्टेबाजी के अंडरवर्ल्ड के सरगने ने ईमानदारी को अपने काले कारोबार की बुनियाद बना रखा है- यह बात एक क्रिमिनल को महिमामंडित करने वाली लगती है.

संभव है यह तत्व कहानी को रोचक बनाने की कोशिश हो. क्योंकि किसी कहानी में जब कोई किरदार सपने और ईमानदारी को अपनी लाइफ की फिलॉस्फी बना ले तो उसकी शख्सियत का जादू अलग रंग बिखेरने लगता है. फिल्म या वेब सीरीज उसके कंधे पर टिक जाती है और एक्टिंग किसी प्रोजेक्ट की यूएसपी कहलाती है. कुछ ऐसा है मटका किंग का बृज भट्टी. इंतजार रहेगा इसके दूसरे सीजन का. लेखकों की टीम में नागराज मंजुले, आशीष आर्यन, अभय कोराने ने देश काल और परिवेश की भाषा पकड़ने में कामयाबी हासिल की है. कुछ सीन को छोड़कर संवाद अच्छे लगे हैं.

khabarmonkey@gmail.com

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