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Hiroshima Day 2026: क्या हिरोशिमा में परमाणु बम गिरने के बाद जापान ने सरेंडर किया था? यह है पूरी कहानी​

हर वर्ष 6 अगस्त को हिरोशिमा दिवस मनाया जाता है. यह दिन मानव इतिहास की एक बहुत दुखद घटना की याद दिलाता है. 6 अगस्त 1945 को अमेरिका ने जापान के शहर हिरोशिमा पर परमाणु बम गिराया था. तीन दिन बाद, 9 अगस्त को नागासाकी पर दूसरा परमाणु बम गिराया गया. इन हमलों के कुछ […]

हर वर्ष 6 अगस्त को हिरोशिमा दिवस मनाया जाता है. यह दिन मानव इतिहास की एक बहुत दुखद घटना की याद दिलाता है. 6 अगस्त 1945 को अमेरिका ने जापान के शहर हिरोशिमा पर परमाणु बम गिराया था. तीन दिन बाद, 9 अगस्त को नागासाकी पर दूसरा परमाणु बम गिराया गया. इन हमलों के कुछ ही दिनों बाद जापान ने द्वितीय विश्व युद्ध में आत्मसमर्पण करने का निर्णय लिया.

इसलिए आम तौर पर कहा जाता है कि हिरोशिमा और नागासाकी के परमाणु बमों ने जापान को सरेंडर के लिए मजबूर किया. आइए, इस हिरोशिमा दिवस पर जानते हैं कि आखिर जापान के सरेंडर करने की असली कहानी क्या है?

द्वितीय विश्व युद्ध का अंतिम दौर

1945 तक जर्मनी हार चुका था. यूरोप में युद्ध समाप्त हो गया था, लेकिन एशिया और प्रशांत क्षेत्र में जापान अमेरिका, ब्रिटेन, चीन और उनके सहयोगियों से लड़ रहा था. जापान की सैन्य स्थिति बहुत खराब थी. उसकी नौसेना कमजोर हो चुकी थी. उसके कई शहरों पर भारी हवाई हमले हो चुके थे. भोजन, ईंधन और कच्चे माल की कमी बढ़ रही थी. अमेरिका ने समुद्री नाकेबंदी भी कर रखी थी. फिर भी जापान की सरकार तुरंत हार मानने के लिए तैयार नहीं थी. सेना के कुछ प्रभावशाली अधिकारी आखिरी दम तक लड़ना चाहते थे. उन्हें लगता था कि अगर अमेरिका जापान की मुख्य भूमि पर हमला करेगा, तो उसे बहुत भारी नुकसान उठाना पड़ेगा. शायद तब अमेरिका बेहतर शर्तों पर बातचीत करेगा.

अमेरिका ने हिरोशिमा के बाद नागासाकी पर परमाणु बम गिराया था. फोटो: Getty Images

पॉट्सडैम घोषणा और जापान की दुविधा

26 जुलाई 1945 को अमेरिका, ब्रिटेन और चीन ने जापान के सामने पॉट्सडैम घोषणा रखी. इसमें जापान से बिना शर्त आत्मसमर्पण की मांग की गई. यह भी कहा गया कि जापान ने इनकार किया, तो उसे तुरंत और पूर्ण विनाश का सामना करना पड़ेगा. जापान ने इस घोषणा को स्वीकार नहीं किया. जापानी नेतृत्व के भीतर मतभेद थे. कुछ लोग युद्ध समाप्त करना चाहते थे. कुछ लोग सोवियत संघ के माध्यम से शांति की बातचीत कराना चाहते थे. उस समय सोवियत संघ और जापान के बीच औपचारिक रूप से युद्ध नहीं चल रहा था. जापान को उम्मीद थी कि सोवियत नेता जोसेफ स्टालिन अमेरिका और जापान के बीच मध्यस्थ बन सकते हैं. और यही उम्मीद जापान की बड़ी रणनीतिक भूल साबित हुई.

हमले के बाद तबाही का मंजर. फोटो: Getty Images

हिरोशिमा पर पहला परमाणु बम

6 अगस्त 1945 की सुबह अमेरिका के बी29 विमान, एनोला गे, ने हिरोशिमा पर लिटिल बॉय नाम का परमाणु बम गिराया. कुछ ही क्षणों में शहर का बड़ा हिस्सा नष्ट हो गया. बहुत बड़ी संख्या में लोग तत्काल मारे गए. कई लोग जलने, चोटों और विकिरण के असर से बाद में मरे. उस वर्ष के अंत तक मृतकों की संख्या लगभग 1.40 लाख तक पहुंचने का अनुमान लगाया जाता है. सटीक संख्या बताना कठिन है, क्योंकि रिकॉर्ड नष्ट हो गए थे और बहुत से लोग बाद में बीमारी से भी मरे. हिरोशिमा एक सैन्य महत्व वाला शहर भी था. वहां सेना के केंद्र और सैन्य आपूर्ति से जुड़े ठिकाने थे. लेकिन शहर में बड़ी संख्या में आम नागरिक भी रहते थे. बच्चों, बुजुर्गों, महिलाओं और कामगारों ने इस हमले की सबसे बड़ी कीमत चुकाई.

क्या हिरोशिमा के बाद जापान तुरंत झुक गया?

हिरोशिमा पर हमले के बाद जापान ने तुरंत आत्मसमर्पण नहीं किया. यह बात अक्सर सार्वजनिक चर्चा में छूट जाती है. जापानी सरकार को शुरुआत में पूरी जानकारी नहीं मिली. संचार व्यवस्था टूट गई थी. शहर नष्ट हो चुका था. कुछ नेताओं को यह समझने में समय लगा कि यह साधारण बमबारी नहीं, बल्कि एक नया और अत्यंत शक्तिशाली हथियार था. फिर भी जापान की सर्वोच्च युद्ध परिषद में तुरंत सहमति नहीं बनी. कुछ सैन्य नेता मानते थे कि अमेरिका के पास शायद केवल एक या दो ऐसे बम होंगे. वे युद्ध जारी रखने के पक्ष में थे. इससे साफ है कि हिरोशिमा अकेले और तुरंत आत्मसमर्पण का कारण नहीं बना था. उसने जापानी नेतृत्व को गहरे संकट में जरूर डाल दिया था.

सोवियत संघ का युद्ध में प्रवेश

8 अगस्त 1945 को सोवियत संघ ने जापान के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी. 9 अगस्त को सोवियत सेना ने मंचूरिया में जापानी नियंत्रित क्षेत्रों पर बड़ा हमला शुरू कर दिया. यह घटना जापान के लिए बहुत बड़ा झटका थी. जापान जिस सोवियत संघ को मध्यस्थ बनाना चाहता था, वही अब उसका शत्रु बन गया था. मंचूरिया में जापान की क्वांटुंग सेना तैनात थी. कभी इसे जापान की शक्तिशाली सेनाओं में गिना जाता था. लेकिन 1945 तक वह कमजोर हो चुकी थी. सोवियत सेना ने तेजी से बढ़त बनाई. सोवियत हमले का मतलब था कि जापान अब केवल अमेरिका और ब्रिटेन से नहीं लड़ रहा था. उसे उत्तर दिशा से भी एक विशाल सैन्य शक्ति का सामना करना था. साथ ही, जापानी नेतृत्व को डर था कि सोवियत संघ जापान के कुछ हिस्सों पर कब्जा कर सकता है. कई इतिहासकार मानते हैं कि सोवियत संघ के युद्ध में उतरने की वजह से जापानी नेतृत्व की शांतियोजना पूरी तरह ध्वस्त हो गई.

9 अगस्त 1945 को अमेरिका ने नागासाकी पर दूसरा परमाणु बम गिराया. इसका नाम फैटमैन था. इस हमले में भी हजारों लोग तुरंत मारे गए और बहुत से लोग बाद में घायल होने तथा विकिरण के कारण मरे. नागासाकी मूल लक्ष्य नहीं था. उस दिन पहला लक्ष्य कोकुरा था, लेकिन वहां मौसम और धुएं की स्थिति के कारण विमान नागासाकी की ओर मुड़ गया. यह तथ्य युद्ध की भयावहता को और गहरा करता है. हजारों लोगों का जीवन कुछ मिनटों के सैन्य निर्णयों और परिस्थितियों में बदल गया. नागासाकी पर बम गिरने के दिन ही सोवियत हमला भी तेज हो चुका था. इसलिए जापानी नेतृत्व के सामने दो बड़े संकट एक साथ थे.

सम्राट हिरोहितो की भूमिका महत्वपूर्ण

जापान के निर्णय में सम्राट हिरोहितो की भूमिका महत्वपूर्ण थी. जापान की सर्वोच्च युद्ध परिषद के सदस्य आत्मसमर्पण की शर्तों पर बंटे हुए थे. कुछ लोग युद्ध जारी रखना चाहते थे. कुछ लोग शांति चाहते थे. अंततः सम्राट ने हस्तक्षेप किया. उन्होंने युद्ध समाप्त करने के पक्ष में राय दी. 14 अगस्त 1945 को जापान ने मित्र राष्ट्रों की शर्तें स्वीकार करने का निर्णय लिया. 15 अगस्त को सम्राट का रेडियो संदेश प्रसारित हुआ. उसमें उन्होंने जापानी जनता को बताया कि युद्ध समाप्त किया जा रहा है. बहुत से लोगों ने पहली बार सम्राट की आवाज रेडियो पर सुनी. औपचारिक आत्मसमर्पण 2 सितंबर 1945 को टोक्यो खाड़ी में अमेरिकी युद्धपोत यूएसएस मिसौरी पर हुआ.

फिर असली कहानी क्या है?

हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराए जाने के बाद जापान ने आत्मसमर्पण किया था. लेकिन केवल अमेरिकी परमाणु बमों के हमले की वजह से जापान ने सरेंडर नहीं किया. जापान पहले से ही सैन्य, आर्थिक और राजनीतिक संकट में था. उसके शहर नष्ट हो रहे थे. नाकेबंदी से संसाधन खत्म हो रहे थे. मित्र राष्ट्रों की सैन्य शक्ति बढ़ती जा रही थी. हिरोशिमा और नागासाकी के परमाणु हमलों ने विनाश की एक नई और डरावनी आशंका सामने थी. सोवियत संघ के युद्ध में आने से जापान की कूटनीतिक उम्मीद टूट गई. इन दोनों घटनाओं ने साथ मिलकर आत्मसमर्पण का रास्ता तेज किया. इतिहासकारों में इस बात पर बहस जारी है कि कौनसा कारण अधिक निर्णायक था. कुछ परमाणु बमों को सबसे बड़ा कारण मानते हैं. कुछ सोवियत आक्रमण को अधिक महत्वपूर्ण बताते हैं. कई इतिहासकार दोनों को जुड़ा हुआ निर्णायक दबाव मानते हैं.

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संपादकीय टीम

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