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Heat Wave: यूरोप में 35 डिग्री पर क्यों हो रही मौतें? 10 बड़ी वजह, फ्रांस से ब्रिटेन तक गर्मी से बेहाल

यूरोप के कई देश इन दिनों गर्मी की चपेट में हैं. फ्रांस में गर्मी से सात मौतें हुई हैं. इटली ने दोपहर के समय बाहर काम करने पर रोक लगा दी है. ब्रिटेन और फ्रांस ने लोगों को धूप और गर्मी से बचने की सलाह दी है. यूरोप के कई शहरों में तापमान 35 डिग्री सेल्सियस के आसपास पहुंच गया है. मई महीने में गर्मी का बीते वर्षों का रिकार्ड टूट गया है. रात का तापमान भी 20 डिग्री के आसपास दर्ज किया गया है. भारत जैसे देशों में 35 डिग्री आम बात है या यूं कहें कि मई महीने में यह सामान्य तापमान माना जाएगा.

Heat Wave: यूरोप में 35 डिग्री पर क्यों हो रही मौतें? 10 बड़ी वजह, फ्रांस से ब्रिटेन तक गर्मी से बेहाल
Heat Wave: यूरोप में 35 डिग्री पर क्यों हो रही मौतें? 10 बड़ी वजह, फ्रांस से ब्रिटेन तक गर्मी से बेहाल

फ्रांस या ब्रिटेन में 35 डिग्री तापमान सिर्फ एक संख्या नहीं है. यह वहां के घरों की बनावट, कम एसी, शरीर की कम आदत, गर्म रातें, नमी, और सामाजिक परिस्थितियों के साथ मिलकर खतरनाक बन रहा है. जलवायु बदल रही है, इसलिए यूरोप में भी गर्मी अब नई चुनौती है. सही चेतावनी, बेहतर शहरी योजना और लोगों की जागरूकता से इन मौतों को काफी हद तक रोका जा सकता है.आइए, यूरोप में पड़ रही तीखी गर्मी के बहाने जानते हैं कि 35 डिग्री सेल्सियस तापमान से आखिर क्यों हो रही हैं मौतें?

1. शरीर की आदत

मानव शरीर मौसम के अनुसार ढलता है. जिन देशों में गर्मी लंबे समय तक रहती है, वहां लोग धीरे-धीरे गर्मी सहने के तरीके सीख लेते हैं. शरीर भी पसीना निकालने, नमक संतुलन रखने और तापमान नियंत्रित करने में बेहतर हो जाता है. यूरोप के कई हिस्सों में गर्मी का मौसम छोटा होता है. बहुत से लोगों का शरीर लंबे समय तक तेज गर्मी झेलने का अभ्यास नहीं करता. इसलिए 35 डिग्री सेल्सियस तापमान वहां असामान्य बन गया है.

यूरोप में एसी की जरूरत ही नहीं मानी गई, इसलिए कई घरों में एसी नहीं लगा होता. फोटो: Getty Images

2. घर और शहर ठंडे मौसम के लिए बने हैं

फ्रांस और ब्रिटेन में कई पुराने घर बने हुए हैं. इनका डिजाइन ठंड से बचाने के लिए किया गया है. दीवारें मोटी हैं. खिड़कियां ऐसी होती हैं कि गर्मी बाहर निकले, इसका इंतजाम न के बराबर होता है. जब बाहर तेज गर्मी होती है, तो ये घर हीट ट्रैप बन जाते हैं यानी गर्मी अंदर फंस जाती है. रात में भी घर जल्दी ठंडा नहीं हो पाता. कई लोगों को लगता है कि घर के अंदर सुरक्षित होंगे, लेकिन कई बार अंदर की गर्मी ज्यादा खतरनाक हो जाती है.

3. एयर कंडीशनर का कम उपयोग

भारत में बहुत जगहों पर एसी नहीं होता, लेकिन शहरों में एसी आम हो गया है. यूरोप में लंबे समय तक एसी की जरूरत ही नहीं मानी गई. कई घरों में एसी नहीं लगा होता. अगर लगा भी हो, तो हर कमरे में नहीं होता. बिजली महंगी होने से लोग चलाने में भी हिचकते हैं. नतीजा यह कि हीटवेव में सुरक्षित ठंडा वातावरण बनाना मुश्किल हो रहा है.

यूरोप के कई हिस्सों में गर्मी का मौसम छोटा होता है. फोटो: Getty Images

4. हीटवेव का असर केवल तापमान नहीं, अवधि भी है

35 डिग्री सेल्सियस तापमान एक दिन के लिए हो, तो संभालना आसान हो सकता है. लेकिन हीटवेव में कई दिन तक लगातार गर्मी रहती है. इस साल यही हो रहा है. खास बात यह है कि रातें भी गर्म रह रही हैं. शरीर को रात में ठंडक नहीं मिलती. बार-बार नींद टूटती है. दिल और दिमाग पर दबाव बढ़ता है. यही वजह है कि कई दिन की गर्मी ज्यादा नुकसान करती है और लोगों की सेहत इसी वजह से बिगड़ रही है.

5. नमी और फील लाइक तापमान

केवल थर्मामीटर वाला तापमान पूरी कहानी नहीं बताता. नमी बढ़ जाए, तो पसीना ठीक से सूखता नहीं. शरीर की ठंडक कम हो जाती है. इससे महसूस होने वाली गर्मी काफी बढ़ जाती है. कुछ यूरोपीय शहरों में गर्म हवा के साथ नमी भी बढ़ जाती है. ऐसे में 35 डिग्री तापमान शरीर पर 40 डिग्री जैसा असर कर सकता है.

कुछ यूरोपीय शहरों में गर्म हवा के साथ नमी भी बढ़ जाती है. फोटो: Getty Images

6. बुजुर्ग और बीमार लोगों पर ज्यादा खतरा

हीटवेव में सबसे बड़ा खतरा बुजुर्गों को होता है. छोटे बच्चों को भी दिक्कत होती है. जिन लोगों को दिल की बीमारी, सांस की समस्या, डायबिटीज, किडनी की दिक्कत या हाई बीपी है, वे भी जल्दी प्रभावित होते हैं. कुछ दवाएं शरीर में पानी की कमी बढ़ा सकती हैं या पसीना कम कर सकती हैं. इसलिए यूरोप में मौतों का बड़ा हिस्सा कमजोर समूहों में देखा जाता है.

7. अकेलापन और मदद देर से मिलना

कई यूरोपीय देशों में बहुत से बुजुर्ग अकेले रहते हैं. परिवार पास नहीं होता. पड़ोसी भी हर दिन हाल नहीं पूछते. हीट स्ट्रोक या डिहाइड्रेशन धीरे-धीरे बढ़ता है. अगर समय पर कोई देख न पाए, तो हालत बिगड़ सकती है. यह सामाजिक स्थिति भी मौतों का जोखिम बढ़ाती है.

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हीटवेव के कारण मौतों का आंकड़ा बढ़ा है. फोटो: Getty Images

8. शहरों में अर्बन हीट आइलैंड का प्रभाव

बड़े शहरों में कंक्रीट, डामर और इमारतें गर्मी पकड़ लेती हैं. पेड़ कम हों, तो तापमान और बढ़ जाता है. इसे अर्बन हीट आइलैंड कहते हैं. लंदन, पेरिस जैसे शहरों में रात के समय भी गर्मी बनी रह सकती है. इससे शरीर को आराम नहीं मिलता. बीमारी का खतरा बढ़ता है.

9. चेतावनी प्रणाली और व्यवहार की कमी

भारत में कई लोग जानते हैं कि गर्मी में क्या करना है. जैसे छांव में रहना, पानी-ओआरएस लेना, दोपहर में काम कम करना. यूरोप में लोग अक्सर इसे सामान्य गर्मी समझकर बाहर निकल जाते हैं. कई बार वे धूप में ज्यादा समय बिताते हैं. शराब या कैफीन भी पानी की कमी बढ़ा सकती है. अगर सरकारी चेतावनी का पालन न हो, तो नुकसान बढ़ता है.

ब्रिटेन और फ्रांस ने लोगों को धूप और गर्मी से बचने की सलाह दी है. फोटो: Getty Images

10. मौतें कैसे होती हैं?

गर्मी में शरीर पसीने से ठंडा होता है, लेकिन जब गर्मी ज्यादा हो और शरीर ठंडा न कर पाए, तो तापमान बढ़ता जाता है. पहले डिहाइड्रेशन होता है. फिर चक्कर, कमजोरी, उल्टी, तेज धड़कन जैसी दिक्कतें आती हैं. अगर समय पर शरीर ठंडा न किया जाए, तो हीट स्ट्रोक हो सकता है. यह एक मेडिकल इमरजेंसी है. इसमें बेहोशी, भ्रम, बहुत तेज बुखार जैसी स्थिति बन सकती है. इलाज देर से हो, तो जान भी जा सकती है.

हीटवेव से बचाव मुश्किल नहीं

  • पानी बार-बार पिएं. प्यास का इंतजार न करें.
  • धूप में 12 से 4 बजे के बीच बाहर कम रहें.
  • हल्के रंग के ढीले कपड़े पहनें.
  • घर को दिन में पर्दे से छायादार रखें.
  • रात में हवा ठंडी हो तो वेंटिलेशन का ध्यान रखें.
  • बुजुर्गों, बच्चों और बीमार लोगों का खास ध्यान रखें.
  • सिरदर्द, चक्कर, तेज कमजोरी, उल्टी, भ्रम हो तो तुरंत मदद लें.

समस्या तापमान नहीं, तैयारी की कमी है

फ्रांस या ब्रिटेन में 35 डिग्री तापमान सिर्फ एक संख्या नहीं है. यह वहां के घरों की बनावट, कम एसी, शरीर की कम आदत, गर्म रातें, नमी, और सामाजिक परिस्थितियों के साथ मिलकर खतरनाक बन रहा है. जलवायु बदल रही है, इसलिए यूरोप में भी गर्मी अब नई चुनौती है. सही चेतावनी, बेहतर शहरी योजना और लोगों की जागरूकता से इन मौतों को काफी हद तक रोका जा सकता है.

khabarmonkey@gmail.com

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