काकरोच जनता पार्टी के प्रमुख दीपके समेत सैकड़ों नेताओंकार्यकर्ताओं को पुलिस ने यत्रतत्र रोक लिया है. किसी की गिरफ़्तारी हुई है तो किसी को केवल हिरासत में लिया गया है. मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर सीजेपी ने 10 अक्तूबर को जंतरमंतर पर प्रदर्शन का ऐलान कर रखा था. इस घोषित प्रदर्शन को असफल करने के लिए सरकार ने बेहद कड़े उपाय किए हैं. बाहर से आने वाली ट्रेन कैंसिल कर दी गई हैं तो पूरे दिल्ली की किलेबंदी में कोई कसर नहीं छोड़ी गई है. बड़ी संख्या में मेट्रो स्टेशन बंद किए गए हैं.

सीजेपी प्रमुख को मुंबई से दिल्ली लैंड करते ही एयरक्राफ्ट से ही हिरासत में ले लिया गया है. सीजेपी नेताओं का कहना है की सरकार इस प्रस्तावित आंदोलन से डर गई है. बौखलाहट में इस तरह की दमनकारी नीति अपनाई जा रही है. आइए, इसी बहाने समझते हैं कि जेन जी के प्रदर्शन से दुनिया में क्या कुछ बदला, कहांकहां उठी आवाज?
जेनजी आंदोलन का मतलब क्या है?
जेनजी आम तौर पर उन लोगों को कहा जाता है जिनका जन्म 1990 के दशक के आखिर से 2010 के दशक की शुरुआत के बीच हुआ. इस पीढ़ी ने इंटरनेट और स्मार्टफोन के साथ जीवन बिताया है. इसलिए खबरें, वीडियो और अपीलें बहुत तेजी से साझा कर सकती है. ऑनलाइन संदेश आंदोलन को शुरू करने या लोगों को जुटाने में मदद कर सकते हैं. फिर भी किसी विरोध की ताकत सिर्फ हैशटैग से तय नहीं होती. असली असर इस बात पर निर्भर करता है कि मांगें कितनी व्यापक हैं, कितने लोग उनसे जुड़ते हैं और सरकार तथा संस्थाएं उनका जवाब कैसे देती हैं. भारत समेत दुनिया के अनेक हिस्सों में जेनजी के आंदोलनों का व्यापक असर हुआ है.
दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन की तस्वीर. फोटो: PTI
बांग्लादेश: छात्र मांग से देशव्यापी आंदोलन तक
2024 में बांग्लादेश में सरकारी नौकरियों के कोटा नियमों को लेकर छात्र आंदोलन शुरू हुआ. प्रदर्शन बढ़ने के साथ उसमें सरकार के कामकाज और राजनीतिक जवाबदेही से जुड़े सवाल भी शामिल हुए. आंदोलन ने देशव्यापी रूप लिया. अगस्त 2024 में प्रधानमंत्री शेख हसीना ने पद छोड़ दिया और देश छोड़कर चली गईं. कार्यवाहक सरकार बनी. फिर चुनाव हुए और अब वहाँ फिर से लोकतान्त्रिक सरकार चल रही है.
यह घटनाक्रम दिखाता है कि छात्रों की किसी खास मांग से शुरू हुआ विरोध बड़े राजनीतिक आंदोलन में बदल सकता है. लेकिन इसके साथ हिंसा, जानमाल के नुकसान और अस्थिरता का खतरा भी सामने आया. इसलिए इसे केवल सत्ता परिवर्तन की कहानी के रूप में देखना अधूरा होगा.
बांग्लादेश में भी GenZ ने प्रदर्शन किया था.
श्रीलंका: आर्थिक संकट के खिलाफ जन आक्रोश
श्रीलंका में 2022 का विरोध गंभीर आर्थिक संकट के बीच बढ़ा. ईंधन, दवाओं और जरूरी सामान की कमी से आम लोगों की जिंदगी कठिन हो गई थी. बिजली कटौती और महंगाई ने भी लोगों का गुस्सा बढ़ाया. प्रदर्शनकारियों ने सरकार से जवाब मांगा. इस आंदोलन को अरगलय के नाम से जाना गया. जुलाई 2022 में राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे देश छोड़कर भाग गए और बाद में पद से इस्तीफा दिया. राष्ट्रपति भवन तक पर आम आदमी का कब्जा देखा गया. इस आंदोलन में युवा सक्रिय थे, लेकिन इसमें केवल जेनजी ही नहीं, समाज के कई वर्ग शामिल थे. श्रीलंका का अनुभव बताता है कि जब बुनियादी जरूरतों का संकट गहराता है, तो विरोध व्यापक रूप ले सकता है. सत्ता में बदलाव के बाद भी आर्थिक सुधार आसान या तुरंत नहीं होते.
श्रीलंका में प्रदर्शन की फाइल फोटो.
नेपाल: डिजिटल पाबंदी से उठे व्यापक सवाल
नेपाल में 2025 में युवाओं के विरोध को लेकर अनेक रिपोर्ट्स सामने आईं. इनके अनुसार, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर रोक के बाद प्रदर्शन शुरू हुआ. फिर भ्रष्टाचार, भाईभतीजावाद और युवाओं के रोजगार जैसे मुद्दे भी आंदोलन से जुड़ गए. विरोध के दौरान हिंसा और मौतों की खबरें आईं. प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली ने इस्तीफा दिया.
नेपाल में कार्यवाहक सरकार की देखरेख में नए सिरे से चुनाव हुए और अब तक के इतिहास में सबसे युवा प्रधानमंत्री के रूप में बालेन शाह को लोगों ने हाथोंहाथ लिया. यहां भी एक बात ध्यान रखने योग्य है. किसी आंदोलन की शुरुआत एक फैसले से हो सकती है, लेकिन उसका विस्तार कई पुरानी शिकायतों से जुड़ता है. सरकार का कदम वापस लेना या नेतृत्व बदलना अपने आप में सभी समस्याओं का समाधान नहीं होता.
नई दिल्ली में सीजेपी के प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया. फोटो:पीटीआई
केन्या और इंडोनेशिया: नीतियों पर दबाव
केन्या में 2024 के वित्त विधेयक के खिलाफ बड़े प्रदर्शन हुए. युवाओं ने प्रस्तावित टैक्स और उनके आम लोगों पर असर को लेकर सवाल उठाए. विरोध के बाद राष्ट्रपति विलियम रुटो ने विवादित विधेयक वापस लेने की घोषणा की. यह सरकार बदलने का मामला नहीं था. फिर भी प्रदर्शन ने नीति पर दबाव बनाया. इंडोनेशिया में 2025 के विरोध को लेकर सांसदों के भत्तों, विशेषाधिकारों और आर्थिक फैसलों पर असंतोष की खबरें आईं. इन उदाहरणों से पता चलता है कि हर आंदोलन का लक्ष्य सरकार गिराना नहीं होता. कभी प्रदर्शन किसी कानून को रोकने, फैसले पर पुनर्विचार कराने या सार्वजनिक बहस शुरू करने का माध्यम बनता है.
फ्रांस में प्रदर्शन कर रहे छात्रों की कई मांगे हैं.
फ्रांस में शिक्षा व्यवस्था में परिवर्तन को लेकर युवा सड़कों पर
फ्रांस में चल रहे छात्रों के प्रदर्शन की वजह शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी चिंताएं हैं. छात्रों का कहना है कि कई स्कूलों में शिक्षकों की कमी है, कक्षाएं जरूरत से ज्यादा भरी हैं और इमारतों की हालत खराब है. वे बेहतर सुविधाओं, अधिक संसाधनों और अनुपस्थित शिक्षकों की जगह तुरंत विकल्प देने की मांग कर रहे हैं.
रिपोर्टों के अनुसार, विरोध पेरिस के आसपास से शुरू होकर दूसरे शहरों तक फैला. अधिकतर प्रदर्शन शिक्षा सुधार पर केंद्रित रहे, हालांकि कुछ जगहों पर पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प तथा तोड़फोड़ की खबरें भी आईं. सरकार ने छात्रों से बातचीत और सुधारों पर विचार करने की बात कही है.
सीजेपी के प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया.
दुनिया में उठी आवाजों के साझा मुद्दे
देश अलग हैं, लेकिन कई शिकायतें मिलतीजुलती हैं. युवाओं ने रोजगार की कमी, महंगाई, भ्रष्टाचार और अवसरों की असमानता पर सवाल उठाए. कुछ जगहों पर इंटरनेट या अभिव्यक्ति की आजादी पर पाबंदियों ने नाराजगी बढ़ाई. कई आंदोलनों में सरकार से पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग भी सुनाई दी. सोशल मीडिया ने संदेशों को तेजी से फैलाया. उसने प्रदर्शनकारियों को अपनी बात दुनिया तक पहुंचाने का मौका दिया. साथ ही, गलत सूचना और भ्रामक दावों के फैलने का जोखिम भी बढ़ा. इसलिए वायरल पोस्ट को पूरी खबर मानने के बजाय कई विश्वसनीय स्रोतों से जांचना जरूरी है.
भारत में सीजेपी का आरोप क्या है?
भारत में सीजेपी ने 10 अक्टूबर 2026 को जंतरमंतर पर प्रदर्शन का ऐलान किया था. संगठन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहा था. सीजेपी ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण में कथित अनियमितताओं का आरोप लगाया. सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दिपके ने आरोप लगाया कि सरकार जेनजी से डरती है और प्रदर्शनकारियों की आवाजाही रोकने के लिए पाबंदियां लगा रही है. पार्टी नेता सौरव दास ने हालात की तुलना आपातकाल से की. यह भी कहा गया कि दिल्ली पुलिस ने प्रस्तावित प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी थी. ध्यान रहे सीजेपी के आंदोलन के बाद केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा हुआ था. उस इस्तीफे के बाद सीजेपी का मनोबल भी बढ़ हुआ है.
सीजेपी प्रमुख अभिजीत दीपके ने जारी किया वीडियो
IMPORTANT
Until Abhijeet Dipke, Saurav Das and Ashutosh Ranka are in detention, CJPs Organization InCharge Ajinkya Shinde will lead this protest at Jantar Mantar.
Abhijeet had prerecorded this video last night in anticipation of a potential arrest. @AjinkyaCJP https://t.co/WSQ69mKfTV
— Cockroach Janta Party – CJP October 10, 2026
क्या सरकारें सचमुच डर गईं?
किसी प्रदर्शन से सरकार या प्रशासन के फैसलों पर दबाव पड़ सकता है. लेकिन सरकार डर गई एक राजनीतिक दावा है. इसे साबित करने के लिए ठोस प्रमाण चाहिए. सुरक्षा बढ़ाना अपने आप में डर का प्रमाण नहीं है. उसी तरह, सुरक्षा के नाम पर जरूरत से ज्यादा रोक लगाना भी सवालों से परे नहीं है. लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध और सार्वजनिक व्यवस्था, दोनों अहम हैं. प्रशासन को लोगों की सुरक्षा का ध्यान रखना चाहिए. साथ ही, प्रदर्शनकारियों की बात सुनने और नियमों को स्पष्ट रखने की जिम्मेदारी भी निभानी चाहिए. किसी भी कार्रवाई का आकलन उसके कारण, दायरे और असर के आधार पर होना चाहिए.
बदलाव की असली कसौटी क्या है?
जेनजी आंदोलनों ने कई देशों में राजनीतिक चर्चा को बदला है. कुछ जगहों पर सरकारें बदलीं. कुछ जगहों पर कानून या फैसले वापस लिए गए. कहीं युवाओं की मांगों को सार्वजनिक बहस में जगह मिली. लेकिन स्थायी बदलाव केवल सड़क पर भीड़ जुटने से नहीं आता. बदलाव के लिए साफ मांगें, शांतिपूर्ण भागीदारी, भरोसेमंद जानकारी और जवाबदेह संस्थाएं जरूरी हैं.
युवाओं की आवाज को सुनना सरकारों के लिए चुनौती भी है और लोकतंत्र को मजबूत करने का मौका भी. दुनिया के हालिया आंदोलनों का संदेश यही है कि नई पीढ़ी केवल भविष्य की बात नहीं कर रही. वह वर्तमान के फैसलों में अपनी हिस्सेदारी भी चाहती है.