Akhara Parishad : संतों की सबसे बड़ी संस्था मानी जाने वाली को अब कानूनी पहचान मिल गई है। करीब 72 साल से बिना औपचारिक के चल रही अखाड़ा परिषद का से पहले विधिवत रजिस्ट्रेशन करा दिया गया है। शनिवार को हरिद्वार के नया बड़ा अखाड़े में भगवान श्रीचंद्र की जयंती के मौके पर आयोजित संत सम्मेलन में इसकी औपचारिक घोषणा की गई। परिषद के पंजीकरण के बाद अब इसके कामकाज और चुनाव की प्रक्रिया को भी एक तय ढांचे में लाने का रास्ता साफ हुआ है। परिषद के मुताबिक, इसमें देश के सभी 13 प्रमुख अखाड़ों को शामिल किया गया है और अब हर पांच साल में चुनाव कराए जाएंगे।

1954 की घटना के बाद हुआ था गठन
अखाड़ा परिषद का गठन 1954 के कुंभ के दौरान हुई भगदड़ के बाद किया गया था। उस हादसे में बड़ी संख्या में की जान चली गई थी। इसके बाद शासनप्रशासन और संत समाज के बीच बेहतर तालमेल के लिए अखाड़ा परिषद की भूमिका सामने आई। अब तक परिषद बिना औपचारिक रजिस्ट्रेशन के ही आपसी सहमति और परंपरा के आधार पर काम करती रही। समय के साथ अखाड़ों के बीच मतभेद और गुटबाजी भी सामने आती रही। हाल के वर्षों में स्थिति ऐसी बनी कि परिषद के दो अलगअलग गुटों ने अपनेअपने अध्यक्ष होने का दावा तक किया।
हर पांच साल में होगा चुनाव
हरिद्वार कुंभ से पहले परिषद का पंजीकरण कराना संत समाज की ओर से अहम कदम माना जा रहा है। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष श्रीमहंत रविंद्रपुरी महाराज ने बताया कि परिषद का विधिवत पंजीकरण हो चुका है और इसमें सभी 13 अखाड़ों को जगह दी गई है। उन्होंने कहा कि अब परिषद के चुनाव हर पांच साल में तय प्रक्रिया के तहत कराए जाएंगे। इससे संस्था के कामकाज और नेतृत्व को लेकर एक औपचारिक व्यवस्था तैयार होगी।
ये भी पढ़ें:
गुटबाजी खत्म करने की उम्मीद
परिषद के राष्ट्रीय मीडिया संयोजक करौली शंकर महादेव ने कहा कि पंजीकरण के बाद अखाड़ों के बीच चल रहे मतभेदों को दूर करने में मदद मिलेगी। उनका कहना है कि अब सभी अखाड़े एक ही बैनर के तहत मिलकर काम कर सकेंगे। हरिद्वार कुंभ से पहले अखाड़ा परिषद को कानूनी स्वरूप मिलने के बाद संत समाज में भी इसे लेकर चर्चा तेज है। अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि नई व्यवस्था के तहत परिषद के चुनाव और कामकाज किस तरह आगे बढ़ते हैं।
ये भी पढ़ें: