अमेरिका में 2026 के मिडटर्म चुनावों में AI चुनावी प्रचार का तरीका बदल रहा है. राजनीतिक पार्टियां और उनसे जुड़े संगठन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से ऐसे वीडियो और विज्ञापन बना रहे हैं, जिनमें विरोधियों को ऐसी बातें कहते या ऐसे काम करते दिखाया जा सकता है, जो उन्होंने असल में नहीं किए. इस बदलाव को समझने के लिए Wesleyan Media Project के रिसर्चर्स ने चुनावी विज्ञापनों का एनालिसिस किया और AdImpact के विज्ञापन खर्च से जुड़े डेटा का इस्तेमाल किया.

रिसर्च में AI से बने 220 चुनावी विज्ञापन सामने आए, जिन पर 13.7 करोड़ डॉलर यानी करीब 1,2001,300 करोड़ रुपये खर्च किए गए. रिपोर्ट के मुताबिक, लगभग 81% विज्ञापन रिपब्लिकन उम्मीदवारों या उनसे जुड़े ग्रुप की ओर से थे, जबकि डेमोक्रेटिक खेमे की हिस्सेदारी करीब 12% थी. इससे पता चलता है कि AI अब चुनावी प्रचार में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हो रहा है. आइए इस ट्रेंड को डिटेल में समझते हैं.
AI से विरोधियों की नकली तस्वीर और वीडियो तैयार
अमेरिका में AI का इस्तेमाल अब सिर्फ चुनावी विज्ञापनों की स्क्रिप्ट लिखने या तस्वीरें बनाने तक सीमित नहीं है. इसके जरिए नेताओं के चेहरे, आवाज और हावभाव की नकल करके ऐसे वीडियो तैयार किए जा रहे हैं, जो देखने में असली लगते हैं. इनमें नेताओं को ऐसी बातें कहते या ऐसे काम करते दिखाया जा रहा है, जो उन्होंने असल में नहीं किए.
न्यूयॉर्क में इसका एक उदाहरण सामने आया. यहां रिपब्लिकन गवर्नर पद के उम्मीदवार ब्रूस ब्लेकमैन के चुनावी कैंपेन ने एक वीडियो तैयार कराया. इसमें न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी और गवर्नर कैथी होचुल को एक पार्क में साथ घूमते और बागवानी करते दिखाया गया. वीडियो में दोनों नेता एक काल्पनिक दवा का प्रचार करते नजर आए, जिसका नाम ‘पॉलिटिकल डिल्यूजन पिल’ यानी राजनीतिक भ्रम की गोली रखा गया था.
वीडियो के जरिए वोटर्स को महंगाई और अपराध को लेकर उनकी चिंताओं पर तंज कसा गया. इसमें कहा गया कि इस दवा के साइड इफेक्ट में जेब का लगातार हल्का होना और ज्यादा टैक्स देना शामिल हो सकता है. देखने में यह वीडियो असली लग सकता था, लेकिन इसे AI की मदद से तैयार किया गया था. विज्ञापन में यह भी नहीं बताया गया था कि वीडियो नकली है और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से बनाया गया है.
80% से ज्यादा विज्ञापन रिपब्लिकन खेमे से
Wesleyan Media Project के रिसर्चर्स ने चुनावी प्रचार में AI के इस्तेमाल को समझने के लिए 220 विज्ञापनों का एनालिसिस किया. इसमें सामने आया कि 80% से ज्यादा विज्ञापन रिपब्लिकन उम्मीदवारों या उनसे जुड़े राजनीतिक संगठनों की ओर से बनाए गए थे. डेमोक्रेटिक खेमे की हिस्सेदारी इसके मुकाबले काफी कम रही.
रिसर्च के मुताबिक, राजनीतिक पार्टियां AI का इस्तेमाल अपने उम्मीदवारों की इमेज मजबूत करने के साथ विरोधियों को निशाना बनाने के लिए भी कर रही हैं. AI की मदद से किसी नेता को दूसरे राजनीतिक चेहरे के साथ दिखाना या उसके विचारों और राजनीतिक रिश्तों को लेकर ऐसी तस्वीर पेश करना आसान हो गया है, जो असलियत से अलग हो सकती है.
ओक्लाहोमा में इसका एक और उदाहरण देखने को मिला. वहां रिपब्लिकन उम्मीदवार के समर्थन में बने एक विज्ञापन में उन्हें पूर्व डेमोक्रेटिक राष्ट्रपति हिलेरी क्लिंटन के साथ गले मिलते और हाथों में हाथ डाले दिखाया गया. वीडियो में ‘क्लिंटन लवर, ट्रंप हेटर’ जैसे शब्द लिखे गए थे. इसका मकसद उम्मीदवार को क्लिंटन के करीब और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विरोधी के तौर पर दिखाना था.
यह वीडियो भी AI से तैयार किया गया था, लेकिन इसमें इसकी जानकारी देने वाला कोई डिस्क्लेमर नहीं था. विज्ञापन ट्रैक करने वाली कंपनी AdImpact के मुताबिक, इस विज्ञापन को ओक्लाहोमा में टेलीविजन पर दिखाने के लिए 2 लाख डॉलर से ज्यादा खर्च किए गए.
कम खर्च में बड़े पैमाने पर प्रचार, लेकिन भरोसे का सवाल
AI ने चुनावी विज्ञापन बनाने का तरीका आसान और तेज कर दिया है. पहले किसी नेता के साथ वीडियो शूट करने, कलाकारों को शामिल करने और अलगअलग लोकेशन पर शूटिंग करने में समय और पैसा खर्च होता था. अब AI टूल की मदद से कम समय में ऐसे वीडियो बनाए जा सकते हैं, जिनमें किसी नेता को किसी भी सिचुएशन में दिखाया जा सकता है.
इससे राजनीतिक पार्टियों को अलगअलग वोटर ग्रुप के लिए कई तरह के विज्ञापन बनाने का मौका मिलता है. किसी इलाके में महंगाई, कहीं अपराध और कहीं प्रवासन जैसे मुद्दों को केंद्र में रखकर प्रचार सामग्री तैयार की जा सकती है. हालांकि, इसका इस्तेमाल गलत जानकारी फैलाने और विरोधियों की इमेज खराब करने के लिए भी हो सकता है.
चुनावी प्रचार में AI का बढ़ता इस्तेमाल ऐसे समय में हो रहा है, जब सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए राजनीतिक मैसेज तेजी से फैलते हैं. किसी नेता का नकली वीडियो असली समझकर शेयर किया जाए, तो वह बड़ी संख्या में वोटर्स तक पहुंच सकता है. इससे वोटर्स के फैसले प्रभावित होने और चुनावी बहस में गलत जानकारी के हावी होने का खतरा बढ़ता है.
इसलिए अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि AI चुनावी प्रचार को कितना सस्ता और असरदार बना रहा है, बल्कि यह भी है कि वोटर्स को असली और नकली कंटेंट के बीच अंतर करने में कैसे मदद मिले. अमेरिका के मिडटर्म चुनावों में सामने आए ये उदाहरण बताते हैं कि AI राजनीतिक प्रचार का अहम हिस्सा बन चुका है. आने वाले समय में चुनावी विज्ञापनों में पारदर्शिता और AI से तैयार कंटेंट की पहचान करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए बड़ी चुनौती हो सकती है.