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‘हम दो, हमारा एक’ की राह पर भारत? घटती जन्मदर क्या आने वाले समय का बड़ा संकट है​

एक समय था, जब देश में बढ़ती आबादी को सबसे बड़ी चुनौती माना जाता था. स्कूलों से लेकर सरकारी अभियानों तक हर जगह परिवार नियोजन का संदेश दिया जाता था. हालांकि, समय के साथ तस्वीर बदल गई है. अब धीरे धीरे एक नई चिंता सामने आ रही है. देश में बच्चों के जन्म की रफ्तार […]

एक समय था, जब देश में बढ़ती आबादी को सबसे बड़ी चुनौती माना जाता था. स्कूलों से लेकर सरकारी अभियानों तक हर जगह परिवार नियोजन का संदेश दिया जाता था. हालांकि, समय के साथ तस्वीर बदल गई है. अब धीरे धीरे एक नई चिंता सामने आ रही है. देश में बच्चों के जन्म की रफ्तार लगातार कम हो रही है. हाल के वर्षों में आए आंकड़े बताते हैं कि भारत की कुल प्रजनन दर 2.1 के रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे आ चुकी है. इसका मतलब यह है कि आने वाले वर्षों में आबादी की वृद्धि धीमी पड़ सकती है और लंबे समय में इसका असर समाज और अर्थव्यवस्था दोनों पर पड़ सकता है.

आखिर क्यों घट रही है जन्मदर?
इसके पीछे कोई एक कारण नहीं है. समाज में तेजी से हुए बदलावों ने लोगों की प्राथमिकताएं भी बदल दी हैं.

करियर और देर से शादियां
आज युवाओं के सामने पढ़ाई, नौकरी और आर्थिक स्थिरता जैसी कई चुनौतियां हैं. पहले जहां कम उम्र में विवाह हो जाते थे, वहीं अब अधिकतर लोग 30 वर्ष या उसके बाद शादी कर रहे हैं. ऐसे में मातापिता बनने का फैसला भी टलता जाता है और कई बार उम्र बढ़ने के साथ स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतें सामने आने लगती हैं.

बच्चों की परवरिश का बढ़ता खर्च
अच्छी शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षित भविष्य देने की चिंता हर मातापिता को होती है. लेकिन बढ़ती महंगाई के बीच दो बच्चों की जिम्मेदारी उठाना बहुत से परिवारों के लिए आसान नहीं रह गया है. इसी वजह से कई दंपती एक ही बच्चे तक सीमित रहना पसंद कर रहे हैं और कुछ लोग मातापिता बनने का फैसला भी टाल रहे हैं.

संयुक्त परिवारों का कम होना
कुछ दशक पहले तक घर में दादादादी, चाचाचाची और अन्य रिश्तेदार साथ रहते थे. बच्चों की परवरिश में सबकी भागीदारी होती थी. अब अधिकतर परिवार छोटे हो गए हैं. पतिपत्नी दोनों नौकरी करते हैं और बच्चों की देखभाल की चिंता कई बार उन्हें दूसरा बच्चा पैदा करने से रोकती है.

स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं
डॉक्टरों का कहना है कि तनाव, अनियमित जीवनशैली, खराब खानपान और शारीरिक गतिविधियों की कमी का असर प्रजनन क्षमता पर भी पड़ रहा है. यही वजह है कि कई दंपतियों को मातापिता बनने के लिए इलाज और आईवीएफ जैसी तकनीकों का सहारा लेना पड़ रहा है.

क्या कम आबादी हमेशा अच्छी बात है?
पहली नजर में यह लग सकता है कि कम आबादी का मतलब कम भीड़ और संसाधनों पर कम दबाव होगा, लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी है.अगर बच्चों की संख्या लगातार कम होती रही, तो आने वाले दशकों में बुजुर्गों की आबादी तेजी से बढ़ेगी. काम करने वाले युवाओं की संख्या घटेगी और बुजुर्गों की देखभाल का बोझ बढ़ेगा. जापान, दक्षिण कोरिया और चीन जैसे देश पहले से इस चुनौती का सामना कर रहे हैं.

भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा आबादी मानी जाती है. यही युवा देश की अर्थव्यवस्था को गति देते हैं. यदि भविष्य में काम करने वाली आबादी कम होती गई, तो विकास की रफ्तार पर भी असर पड़ सकता है. सामाजिक स्तर पर भी इसका प्रभाव दिखाई दे सकता है. छोटे परिवारों में बच्चे अक्सर अकेले बड़े होते हैं. रिश्तों का दायरा सिमटता जाता है. भाईबहन, चाचाचाची, मामामौसी जैसे रिश्ते धीरेधीरे कम होते जाते हैं और परिवारों की वह रौनक भी फीकी पड़ने लगती है, जो भारतीय समाज की पहचान रही है.

दुनिया के कई देश इस चुनौती का सामना कर रहे हैं
भारत अकेला ऐसा देश नहीं है, जहां जन्मदर में गिरावट देखी जा रही है. जापान, दक्षिण कोरिया, चीन और कई यूरोपीय देशों में यह समस्या पहले से मौजूद है. जापान में बड़ी संख्या में बुजुर्ग आबादी है और युवाओं की कमी के कारण उद्योगों और सेवा क्षेत्र में कर्मचारियों की कमी महसूस की जा रही है. दक्षिण कोरिया में सरकार बच्चों के जन्म को बढ़ावा देने के लिए कई तरह की आर्थिक सहायता और प्रोत्साहन योजनाएं चला रही है. चीन ने भी एक समय एक बच्चे की नीति अपनाई थी, लेकिन अब वहां सरकार लोगों को ज्यादा बच्चे पैदा करने के लिए प्रेरित कर रही है. इन देशों का अनुभव बताता है कि एक बार जन्मदर बहुत नीचे चली जाए, तो उसे दोबारा बढ़ाना आसान नहीं होता.

अर्थव्यवस्था और सामाजिक सुरक्षा पर भी पड़ सकता है असर
किसी भी देश की अर्थव्यवस्था उसकी कामकाजी आबादी पर निर्भर करती है. जब युवा कम होंगे और बुजुर्गों की संख्या बढ़ेगी तो स्वास्थ्य सेवाओं, पेंशन और सामाजिक सुरक्षा पर दबाव बढ़ेगा. कम कामकाजी लोगों पर ज्यादा जिम्मेदारियां आ जाएंगी. यही वजह है कि दुनिया के कई देश इस विषय को केवल जनसंख्या का नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिरता और भविष्य की समृद्धि से जुड़ा मुद्दा मानते हैं.

समाधान क्या हो सकता है?
इस चुनौती का समाधान केवल लोगों को ज्यादा बच्चे पैदा करने की सलाह देने में नहीं है. जरूरत ऐसी व्यवस्था बनाने की है, जिसमें परिवार बनाना लोगों के लिए बोझ न लगे.

सरकार को मातृत्व और पितृत्व अवकाश, सस्ती और अच्छी चाइल्ड केयर सुविधाएं, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं और कामकाजी मातापिता के लिए सहयोगी नीतियों पर ध्यान देना होगा. साथ ही रोजगार और आवास से जुड़ी ऐसी नीतियां भी जरूरी हैं, जो युवा दंपतियों को परिवार बढ़ाने के लिए आत्मविश्वास दे सकें.

समाज को भी यह समझना होगा कि परिवार केवल आर्थिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सामाजिक पूंजी भी है. बच्चों का पालनपोषण केवल मातापिता की नहीं, बल्कि पूरे समाज की साझा जिम्मेदारी है.

जन्मदर में गिरावट का मतलब यह नहीं है कि देश तुरंत किसी संकट में पहुंच गया है. भारत के पास अभी भी दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी में से एक है और यह हमारे लिए एक बड़ा अवसर है. लेकिन अगर मौजूदा रुझान लंबे समय तक जारी रहते हैं, तो आने वाले दशकों में इसके प्रभाव दिखाई दे सकते हैं. इसलिए जरूरत घबराने की नहीं, बल्कि समय रहते इस विषय पर गंभीर चर्चा करने और परिवारों के लिए अनुकूल माहौल बनाने की है.

परिवार केवल समाज की एक इकाई नहीं होते, बल्कि वही आने वाले भारत की नींव भी तैयार करते हैं. बदलती जीवनशैली और आर्थिक चुनौतियों के बीच ऐसा संतुलन बनाना जरूरी है, जिससे युवाओं के सपने भी पूरे हों और परिवार तथा समाज की निरंतरता भी बनी रहे. आखिर किसी भी देश की सबसे बड़ी ताकत केवल उसकी अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि उसके लोग और उनके परिवार ही होते हैं.

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संपादकीय टीम

खबर मंकी की अनुभवी एडिटोरियल डेस्क। हमारे लेखक और संपादक दिन-रात निष्पक्ष, सटीक और तीव्र समाचार आप तक पहुँचाने के लिए काम करते हैं।

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