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UPI पेमेंट्स से खत्म हो जाती है पूरी सैलरी, बिना मन मारे कैसे बचाएं पैसे?​

मौजूदा समय में ज्यादातर लोग UPI का इस्तेमाल करते हैं. ग्रोसरी हो, सब्जी, रिक्शे का किराया हो या फिर चाय का पेमेंट सब कुछ महज चंद सेकंड में हो जाता है. लेकिन कहीं न कहीं इसका असर आपकी जेब पर भी पड़ता है. हाल ही में एक लड़की ने सोशल मीडिया पर अपने UPI स्पेंड […]

मौजूदा समय में ज्यादातर लोग UPI का इस्तेमाल करते हैं. ग्रोसरी हो, सब्जी, रिक्शे का किराया हो या फिर चाय का पेमेंट सब कुछ महज चंद सेकंड में हो जाता है. लेकिन कहीं न कहीं इसका असर आपकी जेब पर भी पड़ता है. हाल ही में एक लड़की ने सोशल मीडिया पर अपने UPI स्पेंड समरी शेयर की. जिसमें उसने बताया कि कैसे वो अपने अपने बढ़े हुए खर्चों को देखकर परेशान है. वीडियो में दिखाया गया कि कैसे छोटीछोटी ऑनलाइन UPI पेमेंट्स मिलकर महीने के आखिर में पूरी सैलरी को खत्म कर देती हैं.

पहली तारीख का वो मैसेज जिसे देख कर आत्मा प्रसन्न हो जाती है वो है सैलरी क्रेडिटेड टू योर अकाउंट. ये वो दिन होता है, जिसका आप पूरे महीने बेसब्री से इंतजार करते हैं. कुछ दिन तो अच्छे बीतते हैं लेकिन 1520 तारीख आते आते बैलेंस देखकर आपके मन में भी सवाल आता है कि पैसे गए कहां?.

छोटेछोटे डिजिटल पेमेंट

बड़े खर्चों का तो हिसाब आपको मोटा मोटा पता ही होता है. बड़ा हिस्सा आमतौर पर किराए, ईएमआई, स्कूल फीस, राशन और दूसरे बड़े खर्चों में जाता है. लेकिन आपके बैंक बैलेंस को चुपचाप हल्का करने वाला एक दूसरा खर्च भी है छोटेछोटे डिजिटल पेमेंट.

छोटे खर्चों का बड़ा खेल

सुबह ऑफिस जाते वक्त कैब के 180 रुपये, दोपहर की कॉफी 120 रुपये, शाम को फूड डिलीवरी के 350 रुपये, रास्ते में क्विक कॉमर्स से 250 रुपये का सामान, ऑनलाइन शॉपिंग में 699 रुपये और महीने में चल रहे चारपांच सब्सक्रिप्शन. इनमें से कोई भी खर्च अकेले बड़ा नहीं लगता. समस्या तब शुरू होती है जब यही छोटा खर्च रोज दोहराया जाता है.

100 रुपये खर्च करने में दर्द क्यों नहीं होता?

कैश में 500 रुपये का नोट देने पर जेब हल्की होने का एहसास होता है. डिजिटल पेमेंट में वही पैसा स्क्रीन पर सिर्फ कुछ सेकंड में चला जाता है. UPI ने भुगतान को इतना आसान बनाया है कि खर्च करने और पैसे निकलने के बीच का मेंटल ब्रेक लगभग खत्म हो गया है.

नेशनल पेमेंट्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया के आंकड़े बताते हैं अगस्त 2026 में भारत में UPI पर करीब 24.51 अरब ट्रांजैक्शन हुए. औसत निकालें तो हर दिन करीब 81.7 करोड़ ट्रांजैक्शन. महीने में इन डिजिटल भुगतानों की कुल वैल्यू करीब 29.82 लाख करोड़ रुपये रही. ये सारा पैसा पैसा निजी खर्च नहीं है, लेकिन इसे देखकर पता चलता है कि डिजिटल पेमेंट अब रोजमर्रा की जिंदगी का कितना बड़ा हिस्सा बन चुका है.

विलेन एक खर्च नहीं, खर्चों की लाइन है

अगर आपकी सैलरी सैलरी 60 हजार रुपये है. रोज ऑफिस आनेजाने में कैब या ऑटो पर औसतन 150 रुपये ज्यादा खर्च हो गए तो महीने में करीब 3,000 रुपये. हफ्ते में दो बार 400 रुपये की फूड डिलीवरी यानी करीब 3,200 रुपये. महीने में दोतीन ऑनलाइन शॉपिंग ऑर्डर 2,000 रुपये. कॉफीस्नैक्स पर 2,000 रुपये और अलगअलग डिजिटल सब्सक्रिप्शन पर 1,000 रुपये. इन्हीं छोटे छोटे खर्चों से में करीब 1112 हजार रुपये निकल जाते हैं, और कमाल की बात ये कि इनमें से ज्यादातर खर्च किसी को बड़े खर्चे नहीं लगते.

चुपके से अकाउंट खाली करते सब्सक्रिप्शन

ओटीटी, म्यूजिक, क्लाउड स्टोरेज, ऐप्स, गेमिंग या दूसरी डिजिटल सर्विसेज़ के छोटेछोटे मंथली चार्ज अकाउंट से अपने आप कटते रहते हैं.

फिक्कीईवाई रिपोर्ट कहती है साल 2025 में भारत में डिजिटल सब्सक्रिप्शन से होने वाला रेवेन्यू 60% बढ़कर 16,300 करोड़ रुपये पहुंच गया. पेड वीडियो सब्सक्रिप्शन की संख्या भी बढ़कर करीब 21.6 करोड़ हो गई. यानि हर महीने बस 149 रुपये वाली सोच का एक बड़ा मार्केट है.

ऑनलाइन शॉपिंग में जरूरत और इच्छा की सीमा धुंधली

ईकॉमर्स ने खरीदारी आसान की है जब जो चाहे ऑनलाइन उपलब्ध है. इंडिया ब्रांड इक्विटी फाउंडेशन के हिसाब से भारत का ईकॉमर्स बाजार 2024 में करीब 125 अरब डॉलर का था और 2030 तक करीब 345 अरब डॉलर पहुंचने का अनुमान है. क्विक कॉमर्स भी तेजी से बढ़ रहा है. पहले कुछ खरीदने के लिए घर से निकलना पड़ता था. अब एक एप खोलने पर ये सारी मेहनत बच रही है. इसलिए जरूरत पड़ने पर खरीदने वाली ही नहीं अच्छा लग रहा है बस ले लेते हैं वाली खरीदारी बढ़ी है.

कैसे बचाएं पैसे

सॉल्यूशन हर बार मन मारना नहीं है, जरूरत है कुछ ऐसा करें कि खर्चा सामने दिखाई दे. ट्रायल के लिए एक महीने के लिए हर UPI, कार्ड और ऑनलाइन पेमेंट को चार हिस्सों में रखिए ज़रूरत, सहूलियत, एंटरटेनमेंट और अचानक वाली शॉपिंग. फिर मंथ लास्ट में देखिए कि असली झटका कहां लगा.

कई लोगों को जवाब किराने की बड़ी खरीदारी में नहीं, बल्कि उन दर्जनों पेमेंट में मिलेगा जिनमें हर बार 100, 200 या 500 रुपये गए थे. क्योंकि सैलरी अक्सर एक बड़े खर्च से खत्म नहीं होती. वो आपके कई बार छोटेछोटे या कोई बात नहीं जैसे खर्चों से खत्म होती है. इसीलिए जरूरी फाइनेंशियल स्किल पैसा कमाना नहीं, ये जानना है कि पैसा चुपचाप कहां जा रहा है.

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संपादकीय टीम

खबर मंकी की अनुभवी एडिटोरियल डेस्क। हमारे लेखक और संपादक दिन-रात निष्पक्ष, सटीक और तीव्र समाचार आप तक पहुँचाने के लिए काम करते हैं।

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