अपनी रचना के 150 साल पूरा कर चुका राष्ट्रगीत “वंदे मातरम्” एक बार फिर से विवादों के केंद्र में है. आजादी के संघर्ष के दौरान मुस्लिम लीग और उसके समर्थकों के कड़े विरोध के बीच कांग्रेस ने 1937 में गीत के केवल प्रारंभिक दो अंतरों के गायन का निर्णय किया था. आजादी के बाद हाल तक भी यही क्रम जारी रहा. हालांकि इन दो अंतरों के गायन को लेकर भी विवाद और असहमति के स्वर कभी पूरी तौर पर थमे नहीं. अगस्त 2026 में विवाद तब और तीव्र हुआ जब केन्द्र ने आधिकारिक कार्यक्रमों के लिए वन्दे मातरम् के सभी छह अंतरों के गायन/वादन का प्रोटोकॉल अनिवार्य किया. यह विवाद 15 अगस्त को दिल्ली में कांग्रेस मुख्यालय में वंदे मातरम् के गायन के समय दो अंतरों के बाद असहज सोनिया गांधी की खिन्न मुद्रा के बाद और गरमाया. तुरंत ही भाजपा के हमले तेज हुए.

दूसरी ओर शुरुआत में इस मसले में असमंजस में दिख रही कांग्रेस की कार्यसमिति ने 19 अगस्त को अपना स्टैंड साफ किया कि उसके पार्टी कार्यक्रमों में केवल पहले दो अंतरे ही गाए जाएंगे. तय है कि यह विवाद आसानी से थमेगा नहीं. क्यों है वन्देमातरम् को लेकर विवाद? समझने के लिए इतिहास के पन्ने पलटते हैं.
वो गीत जो हर होठ पर था
बांग्ला साहित्य के शिखर पुरुष बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 7 नवंबर 1875 को वंदे मातरम् गीत की रचना की थी. 1882 में यह गीत सन्यासी विद्रोह पर आधारित उनके उपन्यास “आनंदमठ” का हिस्सा बना. उपन्यास में सन्यासी ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंकते हैं. वंदे मातरम् गीत में मातृभूमि को मां दुर्गा के रूप में चित्रित किया गया है. निश्चित रूप से गीत की रचना का उद्देश्य भारतीयों में मातृभूमि के प्रति प्रेम और विदेशी शासन के खिलाफ संघर्ष की भावना जगाना था. पूरा गीत मातृभूमि की महिमा का बखान करता है.
कांग्रेस मुख्यालय में वंदे मातरम् पर विवाद.
1896 के कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में रवीन्द्रनाथ टैगोर के स्वर में पहली बार गीत की सार्वजनिक प्रस्तुति के साथ इसकी लोकप्रियता काफी बढ़ी. 1905 में बंगाल विभाजन के तीव्र विरोध के बीच इस गीत के बोल हर आंदोलनकारी की जुबान पर थे. अंग्रेजी राज के विरोध के प्रतीक के तौर पर उभरे इस गीत के गायन पर ब्रिटिश हुकूमत 1907 में पाबंदी लगा दी.
13 साल की चुप्पी बाद मुस्लिम लीग ने किया विरोध
दिलचस्प है कि वंदे मातरम् के गायन और प्रसार के प्रारंभिक 13 वर्षों में मुस्लिम लीग को इसमें कुछ आपत्तिजनक प्रतीत नहीं हुआ. लेकिन लीग के 1909 अमृतसर अधिवेशन में ‘वंदे मातरम्’ को सांप्रदायिक और इस्लाम विरोधी करार देते हुए इसका खुलकर विरोध किया गया.
लीग ने इसे इस्लाम की मान्यताओं के खिलाफ बताया और कहा कि इस्लाम में अल्लाह के अलावा किसी अन्य के प्रति भक्ति या उपासना का कोई स्थान नहीं है. लीग के इस रुख ने कांग्रेस के लिए परेशानी पैदा की. अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के लिए हिंदुओं मुसलमानों की एकजुटता जरूरी थी. एक ओर आजादी के लिए जूझ रहे हिन्दू आंदोलनकारी ” वंदे मातरम् ” को राष्ट्रभक्ति के पवित्र मंत्र जैसे दोहराते थे , दूसरी लीग मुसलमानों को गीत के खिलाफ उकसाने में लगी हुई थी.
वंदे मातरम् के रचयिता बंकिम चंद्र.
1937 में कांग्रेस ने दो अंतरे किए स्वीकार
ब्रिटिश राज में 1937 में प्रांतीय चुनावों के बाद कांग्रेस कई प्रांतों में सत्ता में आई. मुस्लिम लीग का कांग्रेस सरकारों की अनेक नीतियों से विरोध था. वन्देमातरम् का गायन भी उनमें से एक था. मुस्लिम लीग की बुनियाद मजहबी उत्तेजना पर टिकी थी. उसे ऐसे मुद्दों की तलाश थी, जो मुसलमानों को उत्तेजित कर सकें. अक्टूबर 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने मौलाना अबुल कलाम आज़ाद,पंडित जवाहरलाल नेहरू,सुभाष चंद्र बोस और आचार्य नरेंद्र देव की चार सदस्यीय समिति को इसके समाधान की जिम्मेदारी सौंपी.
उपसमिति से इस विषय में रवीन्द्रनाथ ठाकुर से भी सलाह लेने को भी कहा गया था. उप समिति ने वंदे मातरम् के केवल पहले दो अंतरों का निर्णय किया. इस निर्णय का 28 अक्तूबर 1937 को कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में समर्थन किया गया. इस बैठक में महात्मा गांधी,जवाहरलाल नेहरू,सरदार वल्लभभाई पटेल, सुभाष चंद्र बोस,डॉ. राजेंद्र प्रसाद,मौलाना अबुल कलाम आज़ाद,सरोजिनी नायडू,आचार्य जे.बी. कृपलानी,भूलाभाई देसाई,जमनालाल बजाज, आचार्य नरेंद्र देव और गोविंद बल्लभ पंत आदि शामिल थे.
वंदेमातरम् को लेकर शुरू हुआ विवाद थम नहीं रहा.
लीग को पूरी पाबंदी से कम कुछ नहीं कुबूल
कांग्रेस कार्यसमिति के वन्देमातरम् के केवल प्रथम दो पद के गायन का फैसला भी मुस्लिम लीग को संतुष्ट नहीं कर सका. मोहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग का साफ कहना था कि सार्वजनिकराष्ट्रीय जीवन में वन्दे मातरम् को कतई स्थान नहीं दिया जाना चाहिये. 1938 के हरीपुरा कांग्रेस अधिवेशन में गीत के शुरुआती दो पद्य गाए गए. लेकिन इस हल से गीत के समर्थक या विरोधी कोई संतुष्ट नहीं था.17 मार्च 1938 को जिन्ना ने नेहरू को लिखा कि ‘वंदे मातरम्’ गीत पूर्ण रूप से त्याग दिया जाए.
सिर्फ दो पद्यों के गायन को गीत समर्थकों ने मुस्लिम तुष्टिकरण का परिणाम बताया. गीत के विरोधियों का कहना था कि यह गीत जिस किताब “आनंद मठ” से लिया गया है, वह मुस्लिम विरोधी है. दूसरी ओर बंकिम साहित्य पर काम करने वाले इस आरोप को पूरी तौर पर खारिज करते हैं. उनका कहना है कि बंकिम साहित्य में मुसलमानों के प्रति कहीं विरोध नहीं है. उन्होंने तो वंदेमातरम की रचना के साल भर पहले लिखा था कि बंगाल हिंदू और मुसलमानों दोनों का है.
संविधान सभा ने वंदेमातरम् को राष्ट्रगान समान दिया सम्मान
संविधान सभा में 22 जुलाई 1947 को सरोजिनी नायडू ने राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रगान चयन का सवाल उठाया. सेठ गोविंद दास भी इसे लेकर मुखर थे. 5 नवम्बर 1948 को उन्होंने इस पर सवाल किया. “जन गण मन” को राष्ट्र गान तय किए जाने की जानकारी मिलने पर दास ने 15 नवम्बर 1948 को विरोध में संशोधन पेश किया, लेकिन उस पर विचार नहीं हुआ. 30 जुलाई 1949 को दास की अगली कोशिश भी नाकाम रही. अलगअलग अवसरों पर कई सदस्यों ने यह मुद्दा उठाया.
संविधान सभा में केवल अंतिम दिन वंदेमातरम् का गायन हुआ. संविधान सभा के अध्यक्ष डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने 24 जनवरी 1950 को जन गण मन को राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार करने की घोषणा की थी. इस अवसर पर उन्होंने कहा था, “शब्द और संगीत से बनी रचना जिसे ‘जन गण मन’ के नाम से जाना जाता है, भारत का राष्ट्रीय गान होगा. सरकार चाहे तो मौका आने पर इसके शब्दों में परिवर्तन कर सकती है. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाने वाले गीत ‘ वंदेमातरम् ‘ को ‘जन गण मन’ के बराबर का दर्जा मिलेगा. मुझे उम्मीद है कि सदस्य इससे संतुष्ट होंगे.”
वन्देमातरम् के पूर्ण गायन का गृहमंत्रालय का निर्देश
आजादी के बाद भी मुस्लिम समाज के चंद लोगों की ओर से वंदेमातरम् के विरोध के छिटपुट स्वर सुनाई देते रहे हैं. पर इस गीत रचना के 150 वर्ष पूर्ण होने पर मोदी सरकार के बड़े फैसले से यह विवाद फिर सरगर्म हुआ. संसद ने Prevention of Insults to National Honour Act, 2026 पारित किया और राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद यह 6 अगस्त 2026 को कानून का दर्जा हासिल कर चुका है. इसने 1971 के अधिनियम की धारा 3 में National Song—Vande Mataram को भी शामिल कर दिया है. परिणाम स्वरूप अब यदि कोई राष्ट्रगान या राष्ट्रगीत के गायन को रोकता है, अथवा ऐसे गायन में लगी सभा में व्यवधान डालता है, तो वह कानूनन अपराध है, जिसके लिए तीन वर्ष तक का कारावास या जुर्माना या दोनों हो सकते हैं. लेकिन वंदेमातरम् के छह अंतरों के पूर्ण गायन की अनिवार्यता अधिनियम नहीं अपितु गृह मंत्रालय के उस प्रोटोकॉल/निर्देश से संबंधित है, जिसमें आधिकारिक अवसरों पर वंदेमातरम् के सभी छह अंतरों वाले निर्धारित आधिकारिक संस्करण के गायन/वादन का प्रावधान किया गया है.
अब विवाद हुआ और तेज
15 अगस्त 2026 को लाल किले से स्वतंत्रता दिवस समारोह में पहली बार पूर्ण वन्दे मातरम् का प्रस्तुतीकरण हुआ. इसी दिन कांग्रेस मुख्यालय में वंदेमातरम् के गायन के दो अंतरों बाद सोनिया गांधी असहज दिखीं. खिन्न मुद्रा में पहले कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और फिर पीछे बुलाये गए सेवादल के एक पदाधिकारी से वे कुछ कहती दिखाई दीं. भाजपा की ओर से विरोध के सुर उठने पर शुरुआत में कांग्रेस प्रवक्ता साफ बोलने से कतरा रहे थे. लेकिन कांग्रेस कार्यसमिति ने 19 अगस्त को निर्णय किया कि वह अपने कार्यक्रमों में 1937 से चल रही परंपरा के अनुसार केवल पहले दो अंतरों का गायन करेगी.
इसके बाद भाजपा के हमले और तेज हो गए. गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस के फैसले को राष्ट्र विरोधी कहा. भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन ने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने वन्दे मातरम् के अपमान को संस्थागत रूप दे दिया है. नबीन ने इस फैसले को पुरानी मुस्लिम लीग के रुख से जोड़ते हुए कांग्रेस पर हमला किया. प्रधानमंत्री मोदी पहले ही दिसंबर 2025 में संसद में वन्दे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ पर चर्चा के दौरान कांग्रेस के 1937 के फैसले को मुस्लिम लीग के दबाव और तुष्टीकरण की राजनीति से जोड़कर आलोचना कर चुके हैं. उन्होंने कहा था कि कांग्रेस ने वन्दे मातरम् को तोड़ दिया और बाद में यही प्रवृत्ति देश के विभाजन तक पहुंची.
कांग्रेस के अपने तर्क हैं. पलटवार में वह आजादी के आंदोलन में संघ परिवार की भूमिका पर सवाल कर रही है. पार्टी का कहना है कि कांग्रेस उस गीत की ऐतिहासिक वाहक रही है और 1937 का निर्णय किसी के सामने आत्मसमर्पण नहीं था, बल्कि राष्ट्रीय आंदोलन को व्यापक और समावेशी बनाए रखने का निर्णय था. तय है कि वंदेमातरम् को लेकर शुरू हुआ यह विवाद देश की राजनीति को आने वाले दिनों में और गर्म करेगा.