UPI से पेमेंट करना आज करोड़ों लोगों की आदत बन चुका है. लेकिन अब UPI ट्रांजैक्शन पर MDR यानी मरचेंट डिस्काउंट रेट लगाने की चर्चा तेज है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि असली सवाल यह नहीं है कि पेमेंट कंपनियों को कमाई कैसे होगी, बल्कि यह है कि MDR का खर्च आखिर कौन उठाएगा. अगर यह बोझ व्यापारियों पर पड़ा तो इसका असर ग्राहकों, छोटे कारोबार और डिजिटल पेमेंट के बढ़ते इस्तेमाल पर भी पड़ सकता है.

UPI पर MDR वह फीस होती है जो डिजिटल पेमेंट प्रोसेस करने के बदले व्यापारियों से ली जाती है. माना जा रहा है कि बैंक और पेमेंट कंपनियां इस पूरे खर्च को खुद नहीं उठाएंगी. ऐसे में यह अतिरिक्त लागत सीधे कारोबारियों पर आ सकती है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि शुरुआत में कई व्यापारी इस खर्च को खुद झेल सकते हैं, लेकिन लंबे समय तक ऐसा करना आसान नहीं होगा.
ग्राहकों पर क्या होगा असर
इससे ग्राहकों को मिलने वाली छूट और ऑफर कम हो सकते हैं. कई कारोबारी अपने बढ़े हुए खर्च की भरपाई के लिए सामान और सेवाओं की कीमतें भी बढ़ा सकते हैं. सबसे ज्यादा असर छोटे व्यापारियों, किराना दुकानों और उन कारोबारियों पर पड़ने की आशंका है जिन्होंने हाल के वर्षों में UPI को तेजी से अपनाया है. कम कीमत वाले लेनदेन पर भी MDR लगने से कई छोटे व्यापारी डिजिटल पेमेंट लेने से बच सकते हैं.
अगर व्यापारी UPI से पेमेंट लेना कम कर देते हैं या ग्राहकों से अतिरिक्त चार्ज लेने लगते हैं, तो लोगों का डिजिटल पेमेंट इस्तेमाल करने का उत्साह भी घट सकता है. इससे देश में डिजिटल पेमेंट अपनाने की रफ्तार पर असर पड़ सकता है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि UPI सिर्फ एक पेमेंट सिस्टम नहीं, बल्कि भारत का बड़ा डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर है. इसलिए ऐसा समाधान निकालना जरूरी है, जिससे बैंक और पेमेंट कंपनियों को निवेश का मौका मिलता रहे, लेकिन व्यापारियों और ग्राहकों पर अतिरिक्त बोझ भी न पड़े.