प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने तीन देशों की यात्रा के अंतिम पड़ाव न्यूजीलैंड पहुंचे हैं. यह उनका पीएम के रूप में पहला दौरा है. इससे पहले साल 1986 में पीएम के रूप में राजीव गांधी और साल 1968 में इंदिरा गांधी ने न्यूजीलैंड का आधिकारिक दौरा किया था. 5354 लाख की आबादी वाले इस देश में भारतीय मूल के लोगों की संख्या सिर्फ पांचछह फीसदी है लेकिन उनका प्रभाव तगड़ा है. पीएम मोदी के दौरे के बहाने आइए समझते हैं कि भारतीयों का दबदबा न्यूजीलैंड के हर क्षेत्र में क्यों और कैसे है?

न्यूजीलैंड की कुल आबादी में भले ही भारतीय मूल के लोग संख्या कम है, लेकिन देश के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक जीवन में भारतीयों की मौजूदगी काफी मजबूत दिखती है. संसद से लेकर कारोबार तक, शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य सेवाओं तक और तकनीक से लेकर संस्कृति तक, भारतीय मूल के लोग अहम भूमिका निभा रहे हैं. यह प्रभाव केवल संख्या से नहीं बना है. इसके पीछे मेहनत, शिक्षा, उद्यमिता, परिवारकेंद्रित सोच और समाज के साथ जुड़ने की इच्छा है. भारतीय समुदाय ने न्यूजीलैंड को केवल अपना नया घर नहीं माना. उसने देश की प्रगति में साझेदार बनने का प्रयास भी किया है.
मेहनत और शिक्षा ने बनाई पहचान
न्यूजीलैंड आने वाले भारतीयों में बड़ी संख्या शिक्षित लोगों की रही है. कई लोग आईटी, इंजीनियरिंग, स्वास्थ्य, वित्त, शिक्षा और प्रबंधन जैसे क्षेत्रों से जुड़े हैं. कुछ लोग पढ़ाई के लिए न्यूजीलैंड आए. पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने वहीं काम शुरू किया. धीरेधीरे वे स्थानीय समाज का हिस्सा बन गए. भारतीय परिवार शिक्षा को बहुत महत्व देते हैं. बच्चों की पढ़ाई, कौशल और बेहतर भविष्य पर खास ध्यान दिया जाता है. यही कारण है कि भारतीय मूल के युवा विश्वविद्यालयों, तकनीकी संस्थानों और पेशेवर क्षेत्रों में अच्छा प्रदर्शन करते हैं. कई भारतीय डॉक्टर, नर्स, फार्मासिस्ट, शिक्षक, इंजीनियर और तकनीकी विशेषज्ञ बनकर काम कर रहे हैं. इससे न्यूजीलैंड को कुशल मानव संसाधन मिला है. खासकर उन क्षेत्रों में, जहां विशेषज्ञों की कमी रहती है.
न्यूजीलैंड में हर साल 80 हजार भारतीय तो सिर्फ घूमने के लिए पहुंचते हैं. फोटो: Pixabay
स्वास्थ्य सेवाओं में अहम भूमिका
न्यूजीलैंड की स्वास्थ्य व्यवस्था में भारतीय मूल के पेशेवरों का योगदान बहुत महत्वपूर्ण है. देश के कई अस्पतालों, क्लीनिकों और वृद्ध देखभाल केंद्रों में भारतीय डॉक्टर, नर्स और हेल्थ वर्कर काम कर रहे हैं. दूरदराज के इलाकों में भी भारतीय डॉक्टरों ने सेवाएं दी हैं. ऐसे क्षेत्रों में चिकित्सा सुविधाएं सीमित हो सकती हैं. वहां काम करना आसान नहीं होता. फिर भी कई भारतीय पेशेवरों ने इन इलाकों को चुना. उन्होंने स्थानीय लोगों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने में मदद की. कोविड महामारी के दौरान भी भारतीय मूल के स्वास्थ्य कर्मियों की भूमिका सराहनीय रही. उन्होंने अस्पतालों, जांच केंद्रों और देखभाल सेवाओं में लगातार काम किया. यह योगदान केवल नौकरी का हिस्सा नहीं था. यह समाज के प्रति जिम्मेदारी का उदाहरण भी था.
न्यूजीलैंड में भारतीयों से मिलने पीएम मोदी. फोटो: X/narendramodi
अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रहा भारतीय कारोबार
भारतीय समुदाय न्यूजीलैंड की अर्थव्यवस्था में भी सक्रिय है. छोटे कारोबारों से लेकर बड़े उद्यमों तक, भारतीय मूल के लोग कई क्षेत्रों में काम कर रहे हैं. किराना स्टोर, रेस्टोरेंट, परिवहन, निर्माण, रियल एस्टेट, आईटी सेवाएं और आयातनिर्यात जैसे क्षेत्रों में भारतीय उद्यमी दिखाई देते हैं. भारतीय दुकानदारों और छोटे व्यवसायों ने कई स्थानीय इलाकों की जरूरतें पूरी की हैं. वे लंबे समय तक काम करते हैं. ग्राहकों से सीधे जुड़ते हैं. स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति देते हैं. कई व्यवसाय रोजगार भी पैदा करते हैं. भारतीय रेस्टोरेंटों ने न्यूजीलैंड के खानपान में नई विविधता जोड़ी है. आज भारतीय भोजन देश के लोकप्रिय व्यंजनों में शामिल है. करी, बिरयानी, समोसा, डोसा और चाय जैसे स्वाद आम लोगों तक पहुंच चुके हैं. इससे केवल भोजन संस्कृति नहीं बदली. पर्यटन, हॉस्पिटैलिटी और छोटे कारोबारों को भी फायदा हुआ.
भारतीयों ने दी प्रस्तुति. फोटो: X/narendramodi
तकनीक और नवाचार में भारतीयों की भागीदारी
न्यूजीलैंड की अर्थव्यवस्था में तकनीक का महत्व तेजी से बढ़ रहा है. इस क्षेत्र में भारतीय मूल के पेशेवरों की भागीदारी मजबूत है. वे सॉफ्टवेयर, डेटा, साइबर सुरक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल सेवाओं से जुड़े हैं. कई भारतीय युवा स्टार्टअप्स में काम कर रहे हैं. कुछ अपने नए कारोबार शुरू कर रहे हैं. वे डिजिटल समस्याओं के समाधान तैयार कर रहे हैं. इससे कंपनियों की कार्यक्षमता बढ़ती है. नए रोजगार बनते हैं. देश की डिजिटल क्षमता मजबूत होती है. भारतीय आईटी विशेषज्ञों का अनुभव वैश्विक स्तर का होता है. कई लोग भारत, अमेरिका, यूरोप या एशिया के बड़े प्रोजेक्ट्स पर काम कर चुके होते हैं. वे यह अनुभव न्यूजीलैंड की कंपनियों और संस्थाओं तक लेकर आते हैं. इससे देश को अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में मदद मिलती है.
संसद और राजनीति में बढ़ती आवाज
भारतीय मूल के लोगों की राजनीतिक भागीदारी भी बढ़ी है. प्रियंका राधाकृष्णन, डॉ. परमजीत कौर जैसे लोगों ने भारत का झंडा बुलंद किया है. न्यूजीलैंड की संसद और स्थानीय निकायों में भारतीय समुदाय से जुड़े प्रतिनिधि मौजूद रहे हैं. यह लोकतंत्र के लिए सकारात्मक संकेत है. राजनीति में भारतीय मूल के नेताओं की मौजूदगी से प्रवासी समुदायों की आवाज मजबूत होती है. वे शिक्षा, रोजगार, सुरक्षा, आव्रजन, कारोबार और सामाजिक समानता जैसे मुद्दों को सामने ला सकते हैं. हालांकि, वे केवल भारतीय समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं करते. वे पूरे देश और अपने निर्वाचन क्षेत्र के लोगों के लिए काम करते हैं. भारतीय मूल के प्रतिनिधियों ने यह संदेश दिया है कि प्रवासी नागरिक भी सार्वजनिक जीवन में सक्रिय भूमिका निभा सकते हैं. लोकतंत्र में भागीदारी जरूरी है. मतदान, स्थानीय बैठकों में शामिल होना और सामाजिक संगठनों से जुड़ना भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा है.
पीएम मोदी और न्यूजीलैंड के पीएम लक्सन. फोटो: X/narendramodi
संस्कृति के जरिए बढ़ रही सामाजिक एकता
भारतीय समुदाय ने न्यूजीलैंड की सांस्कृतिक पहचान को भी समृद्ध किया है. दिवाली, होली, ईद, बैसाखी, गरबा, छठ पूजा और अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम अब कई शहरों में बड़े स्तर पर आयोजित होते हैं. इनमें केवल भारतीय नहीं, बल्कि अलगअलग पृष्ठभूमि के लोग भी शामिल होते हैं. दिवाली उत्सव विशेष रूप से लोकप्रिय है. रोशनी, संगीत, नृत्य और भारतीय भोजन लोगों को आकर्षित करते हैं. ऐसे आयोजन समाजों के बीच दूरी कम करते हैं. लोग एकदूसरे की परंपराओं को समझते हैं. भारतीय भाषाएं, संगीत, योग, शास्त्रीय नृत्य और बॉलीवुड का भी प्रभाव बढ़ा है. बच्चों को हिंदी, पंजाबी, गुजराती, तमिल और अन्य भाषाएं सिखाने के लिए सामुदायिक प्रयास किए जाते हैं. इससे नई पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ी रहती है. भारत में बेहद पॉपुलर क्रिकेट की दुनिया में भारतीय मूल के क्रिकेटर रचिन रवींद्र, ईश सोढ़ी, आदित्य अशोक जैसे खिलाड़ी न्यूजीलैंड क्रिकेट टीम के हीरो हैं.
परिवार और समुदाय की ताकत
भारतीय समुदाय की एक बड़ी ताकत उसकी आपसी सहायता की भावना है. नए आने वाले लोगों को रहने, नौकरी, पढ़ाई और सामाजिक जीवन से जुड़ी जानकारी मिलती है. कई सामुदायिक संगठन इस काम में मदद करते हैं. मंदिर, गुरुद्वारे, सांस्कृतिक केंद्र और सामाजिक संस्थाएं केवल धार्मिक स्थल नहीं हैं. वे लोगों को जोड़ने का काम भी करते हैं. यहां भोजन सेवा, जरूरतमंदों की मदद, भाषा कक्षाएं और सामुदायिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं. भारतीय समुदाय में बुजुर्गों का सम्मान और परिवार का महत्व भी बड़ी भूमिका निभाता है. यह सोच सामाजिक स्थिरता देती है. बच्चे, युवा और बुजुर्ग एकदूसरे के साथ जुड़े रहते हैं. इससे समुदाय के भीतर सहयोग की भावना बनी रहती है.
संक्षेप में कहा जाए तो न्यूजीलैंड में भारतीयों की आबादी भले ही कम है, लेकिन उनका योगदान व्यापक है. उन्होंने स्वास्थ्य, शिक्षा, कारोबार, तकनीक, राजनीति और संस्कृति जैसे क्षेत्रों में प्रभाव छोड़ा है. उनकी सफलता का आधार मेहनत, शिक्षा, अनुशासन और समाज के प्रति जिम्मेदारी है. भारतीय समुदाय ने न्यूजीलैंड की प्रगति में भागीदारी की है. उसने नई नौकरियां दी हैं. सेवाएं बेहतर की हैं. सांस्कृतिक विविधता बढ़ाई है. लोकतांत्रिक भागीदारी को मजबूत किया है, इसलिए न्यूजीलैंड में भारतीयों का प्रभाव केवल जनसंख्या के प्रतिशत से नहीं मापा जा सकता. इसे उनके काम, योगदान और सकारात्मक भूमिका से समझना चाहिए.