Twisha Sharma Case Bhopal: भोपाल की चर्चित ट्विशा शर्मा मौत मामले में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए आरोपी सास गिरिबाला सिंह की अग्रिम जमानत रद्द कर दी है. मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के जस्टिस देवनारायण मिश्रा ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने मामले के महत्वपूर्ण तथ्यों, WhatsApp चैट्स, गवाहों के बयान और पोस्टमार्टम रिपोर्ट को पर्याप्त गंभीरता से नहीं देखा. कोर्ट ने माना कि दहेज प्रताड़ना, गर्भपात के दबाव और मानसिक उत्पीड़न के आरोप प्रथम दृष्टया गंभीर हैं. मृतका के पिता नवनीधि शर्मा, राज्य सरकार और CBI ने जमानत आदेश को चुनौती दी थी जहां सुनवाई के बाद कोर्ट ने अपना यह फैसला सुनाया है.

हाईकोर्ट के सामने दो याचिकाएं दाखिल की गई थी पहली मध्यप्रदेश सरकार और सीबीआई की ओर से, जबकि दूसरी मृतका के पिता नवनीधि शर्मा की ओर से दायर की गई. दोनों याचिकाओं में मुख्य मांग यह थी कि ट्रायल कोर्ट द्वारा ट्विशा की सास और रिटायर्ड ज्यूडिशियल ऑफिसर गिरिबाला सिंह को दी गई अग्रिम जमानत रद्द की जाए. सुनवाई की शुरुआत में सीबीआई ने आवेदन देकर खुद को पक्षकार बनाए जाने की मांग की.
CBI की ओर से बताया गया कि राज्य सरकार ने जांच दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टैब्लिशमेंट यानी सीबीआई को सौंप दी है और 25 मई 2026 को नई FIR भी दर्ज हो चुकी है. दूसरी ओर से इस पर कोई आपत्ति नहीं की गई, इसलिए कोर्ट ने सीबीआई को मामले में पक्षकार बनाने की अनुमति दे दी. कोर्ट ने फिर दोनों मामलों को एक साथ सुनना उचित माना क्योंकि विवाद एक ही आदेश से पैदा हुआ था. यह आदेश भोपाल के 10वें अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश द्वारा पारित किया गया था, जिसमें गिरिबाला सिंह को अग्रिम जमानत दी गई थी.
ट्विशा शर्मा की शादी 9 दिसंबर 2025 को समर्थ सिंह से हिंदू रीति-रिवाज से हुई थी. 12 मई 2026 को संदिग्ध परिस्थितियों में उसकी मौत हो गई. पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार वह फांसी पर लटकी मिली. शव को एम्स भोपाल ले जाया गया जहां मर्ग कायम हुआ और जांच के बाद एफआईआर दर्ज की गई. इसी बीच गिरिबाला सिंह ने अग्रिम जमानत आवेदन दायर किया जिसे ट्रायल कोर्ट ने मंजूर कर लिया. इसी आदेश को चुनौती देते हुए वर्तमान याचिकाएं दाखिल की गईं.
सीबीआई और राज्य सरकार ने क्या कहा?
सीबीआई और राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि शादी 9 दिसंबर 2025 को हुई थी. मृतका गर्भवती हुई तो पति और सास ने उसके चरित्र पर शक किया. व्हाट्सऐप चैट्स में गर्भपात कराने का दबाव दिखता है. मृतका ने कई बार अपने माता-पिता से कहा कि उसे ससुराल में प्रताड़ित किया जा रहा है. मौत से पहले उसने अपनी मां को फोन कर बताया था कि पति उस पर चिल्ला रहा है. पोस्टमार्टम में फांसी के अलावा शरीर पर छह चोटें मिलीं. AIIMS की क्वेरी रिपोर्ट में कहा गया कि चोटें शव उतारने के दौरान नहीं आईं. आरोप लगाया गया कि CCTV फुटेज से छेड़छाड़ हुई और चुनिंदा क्लिप सोशल मीडिया में लीक की गईं. जांच में सहयोग नहीं किया गया और नोटिस मिलने के बाद भी गिरिबाला सिंह पेश नहीं हुईं.
WhatsApp चैट्स का दिया हवाला
मृतका के पिता की ओर से सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा पेश हुए। उन्होंने कोर्ट में WhatsApp चैट्स का हवाला दिया. उन्होंने कहा कि ट्विशा लगातार अपने परिवार को बता रही थी कि पति और ससुराल वाले उसे ड्रग एडिक्ट मानते हैं, जबकि असली वजह यह थी कि उसका पति उसे छोड़ चुका था और वह मानसिक तनाव में थी. चैट्स में ट्विशा ने लिखा था कि ससुराल वाले उसे न खुश रहने दे रहे हैं और न रोने दे रहे हैं. उसने खुद को बुरी तरह फंसी हुई बताया था. उसने यह भी कहा था कि पति उसके गर्भ में पल रहे बच्चे पर शक करता था और कहता था कि गर्भपात कराने के बाद ही उसे घर में रहने दिया जाएगा. ट्विशा ने अपने परिवार से उसे मायके ले जाने की गुहार भी लगाई थी.
बार-बार ट्विशा के पिता भेजते थे पैसा
पिता की ओर से यह भी कहा गया कि ससुराल वाले ट्विशा का आर्थिक रूप से भी सहयोग नहीं कर रहे थे इसलिए पिता को बार-बार पैसे भेजने पड़ते थे. आरोप लगाया गया कि परिवार को पंचनामा और इनक्वेस्ट की सही जानकारी नहीं दी गई. जमानत मिलने के बाद गिरिबाला सिंह ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मृतका की छवि खराब करने की कोशिश की और कई आरोप लगाए.
याचिकाकर्ता ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने केस डायरी में मौजूद सामग्री पर विचार नहीं किया बल्कि केवल बचाव पक्ष के दस्तावेजों पर भरोसा किया. यह भी आरोप लगाया गया कि CCTV फुटेज से छेड़छाड़ की गई. सवाल उठाया गया कि यदि ट्विशा में जान बचने की संभावना थी तो उसे नजदीकी अस्पताल ले जाने के बजाय सीधे एम्स क्यों ले जाया गया. साथ ही जिस दिन एफआईआर दर्ज हुई उसी दिन जमानत भी दे दी गई जबकि जांच शुरुआती चरण में थी.
याचिकाकर्ता ने कई सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का उदाहरण दिया. एक महत्वपूर्ण तर्क यह दिया गया कि गिरिबाला सिंह खुद रिटायर्ड ज्यूडिशियल ऑफिसर हैं और उन्होंने साइबर क्राइम, साइबर फॉरेंसिक, डिजिटल सिग्नेचर टेक्नोलॉजी तथा क्राइम सीन मैनेजमेंट की विशेष ट्रेनिंग ली हुई है. आरोप लगाया गया कि उन्होंने इन्हीं कौशलों का उपयोग करके घटनास्थल से छेड़छाड़ की. इसलिए ट्रायल कोर्ट को सबूतों की गंभीरता समझनी चाहिए थी.
कोर्ट में मृतका के पिता की तरफ से क्या तर्क दिए गए?
सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा ने कोर्ट को बताया कि WhatsApp चैट्स से साफ है कि मृतका मानसिक दबाव में थी. पति बच्चे को अपना मानने से इनकार करता था. ससुराल वाले गर्भपात के बाद ही घर में रखने की बात कहते थे. मृतका को रोने तक नहीं दिया जाता था. पिता को इनक्वेस्ट की सूचना नहीं दी गई. जमानत मिलने के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मृतका की छवि खराब करने की कोशिश की गई. ट्रायल कोर्ट ने केवल बचाव पक्ष के दस्तावेजों पर भरोसा किया और केस डायरी की सामग्री नहीं देखी. आरोपी रिटायर्ड ज्यूडिशियल ऑफिसर हैं और साइबर फॉरेंसिक की ट्रेनिंग होने के कारण सबूतों से छेड़छाड़ संभव है.
बचाव पक्ष ने क्या दी दलीलें?
वहीं, बचाव पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नित्या रामकृष्णन पेश हुईं. उन्होंने कहा कि ट्विशा ने आत्महत्या की और उसके बाद तुरंत उसे एम्स ले जाया गया. उन्होंने दावा किया कि मृतका के परिवार को समय पर सूचना दी गई थी और वे मौके पर मौजूद थे. पुलिस ने उसी दिन फंदा, लैपटॉप कीबोर्ड, मोबाइल फोन और डीवीआर जब्त कर लिए थे. इसलिए यह कहना गलत है कि आरोपी जांच में सहयोग नहीं कर रही थी. बचाव पक्ष ने कहा कि WhatsApp चैट्स में आरोप मुख्य रूप से पति समर्थ सिंह के खिलाफ हैं, गिरिबाला सिंह के खिलाफ नहीं. कई फोटो और पत्र भी पेश किए गए जिनमें ट्विशा ने लिखा था कि उसकी सास उसका ख्याल रखती हैं.
किन-किन सुप्रीम कोर्ट फैसलों का हवाला दिया गया?
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बचाव पक्ष ने Savitri Agarwal बनाम State of Maharashtra का उदाहरण देते हुए कहा कि पहले से दी गई जमानत रद्द करने के लिए बहुत मजबूत और असाधारण परिस्थितियां जरूरी होती हैं जो यहां मौजूद नहीं हैं. बचाव पक्ष के वकील एनोश जॉर्ज ने Sanjay Avasthi बनाम Vijay Jain तथा गुजरात और कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसलों का हवाला दिया. उन्होंने कहा कि यदि जमानत की शर्तों का उल्लंघन हुआ है तो पहले उसी अदालत में जाना चाहिए जिसने जमानत दी थी सीधे हाईकोर्ट में नहीं.
वहीं, याचिकाकर्ताओं और सीबीआई ने कई बड़े फैसलों का हवाला दिया
- Dr. Naresh Kumar Mangla v. Anita Agarwal- इसमें कहा गया कि यदि जमानत आदेश गैरकानूनी मनमाना या महत्वपूर्ण तथ्यों को नजरअंदाज कर दिया गया हो तो ऊपरी अदालत उसे रद्द कर सकती है.Sushila Aggarwal v. State (NCT of Delhi)- अदालत को अग्रिम जमानत देते समय अपराध की गंभीरता जांच पर प्रभाव और सबूतों से छेड़छाड़ की संभावना देखनी चाहिए.
- Samunder Singh v. State of Rajasthan- दहेज मृत्यु के मामलों में अग्रिम जमानत देते समय विशेष सावधानी जरूरी बताई गई.
- Vipin Kumar Dhir v. State of Punjab- यदि जमानत आदेश में महत्वपूर्ण तथ्यों की अनदेखी हो या समाज पर गलत प्रभाव पड़ता हो, तो उच्च अदालत हस्तक्षेप कर सकती है.
- सीबीआई ने State v. Anil Sharma और P. Krishna Mohan Reddy के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे मामलों में कस्टोडियल इंटरोगेशन यानी हिरासत में पूछताछ जरूरी हो सकती है खासकर जब जांच प्रारंभिक अवस्था में हो और आरोपी प्रभावशाली हो.
एडवोकेट जनरल ने यह भी कहा कि एआईआईएमएस की क्वेरी रिपोर्ट के अनुसार मृतका की चोटें शव को फंदे से उतारने या अस्पताल ले जाने के दौरान नहीं लगी थीं. उन्होंने गवाह रेखारानी शर्मा के बयान का उल्लेख किया, जिसमें दहेज की मांग और तानों की बात कही गई थी. आरोप लगाया गया कि ससुराल वालों को शादी में मिला दहेज अपने स्तर से कम लगा. यह भी कहा गया कि ट्विशा के शेयर अपने नाम कराने का दबाव था. गर्भ को किसी दूसरे व्यक्ति का बच्चा बताते हुए जबरन गर्भपात कराया गया.
सीबीआई की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बेहद सख्त रुख अपनाया. उन्होंने कहा कि जिस तरीके से अग्रिम जमानत ली गई, उससे ही संदेह पैदा होता है कि ट्रायल कोर्ट ने आवश्यक तथ्यों पर विचार नहीं किया. उन्होंने कहा कि एक 33 वर्षीय महिला की मौत के बाद भी आरोपी में कोई पछतावा नहीं दिखा और वह लगातार प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मृतका पर आरोप लगा रही है. उन्होंने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट ने अभियोजन पक्ष के एक भी गवाह के बयान पर विचार नहीं किया और पूरी तरह बचाव पक्ष की सामग्री पर भरोसा किया.
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की किन बातों पर सवाल उठाए?
हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने केवल यह मान लिया कि शिकायतें पति के खिलाफ हैं. व्हाट्सऐप चैट्स और गवाहों के बयान पूरी तरह नहीं देखे. पोस्टमार्टम में मिली चोटों को गंभीरता से नहीं लिया. यह नहीं देखा कि मृतका की मौत शादी के कुछ ही महीनों बाद हुई. जांच के शुरुआती चरण में जल्दबाजी में राहत दे दी,
कोर्ट ने अंतिम फैसला क्या दिया?
हाईकोर्ट ने कहा कि केस डायरी में सास और बेटे दोनों के खिलाफ प्रताड़ना के आरोप हैं. गर्भपात को लेकर दबाव और दहेज मांग के आरोप प्रथम दृष्टया गंभीर हैं. जांच अभी शुरुआती चरण में है. आरोपी के प्रभावशाली होने और जांच में सहयोग न करने की शिकायत भी सामने आई. इसी आधार पर 15 मई 2026 को ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई अग्रिम जमानत को रद्द कर दिया गया.
सभी पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश का विश्लेषण किया। हाईकोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने यह सोचकर जमानत दी थी कि केवल सात साल के भीतर हुई मौत के आधार पर जमानत खारिज नहीं की जा सकती, ट्रायल कोर्ट ने यह भी माना था कि गिरिबाला सिंह मृतका के खाते में पैसे भेजती थीं और व्हाट्सऐप चैट्स में मुख्य शिकायत पति के खिलाफ थी. उम्र 63 वर्ष होने और भोपाल की निवासी होने के कारण फरार होने की संभावना भी कम मानी गई थी.
ट्विशा के शरीर पर कई चोटों के निशान
लेकिन हाईकोर्ट ने कहा कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में फांसी के अलावा छह अन्य चोटें भी पाई गईं. इनमें चार चोटें बाएं हाथ पर, एक अंगुली पर और एक सिर पर थी. क्वेरी रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया कि ये चोटें शव को नीचे उतारते समय नहीं लगीं. कोर्ट ने माना कि गर्भावस्था और उसके समाप्त होने को लेकर दोनों पक्षों के अलग-अलग दावे हैं. लेकिन गवाहों के बयान बताते हैं कि सास और पति गर्भपात का दबाव बना रहे थे. कोर्ट ने कहा कि 13, 14 और 15 मई को दर्ज बयानों में लगातार यही आरोप दोहराए गए हैं. कोर्ट ने यह भी माना कि ट्रायल कोर्ट ने व्हाट्सऐप चैट्स और गवाहों के बयानों का समुचित मूल्यांकन नहीं किया.
गिरिबाला जांच एजेंसी के साथ सहयोग नहीं कर रही थीं
हाईकोर्ट ने यह भी नोट किया कि जमानत मिलने के बाद भी गिरिबाला सिंह जांच एजेंसी के साथ सहयोग नहीं कर रही थीं. कई नोटिसों के बावजूद वे पेश नहीं हुईं. पैसे के लेनदेन को लेकर कोर्ट ने कहा कि अधिकांश ट्रांजैक्शन शादी या विदेश यात्रा के समय के हैं, इसलिए केवल पैसे भेजने के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि दहेज की मांग नहीं थी. अंत में हाईकोर्ट ने कहा कि मामले के तथ्यों, आरोपों, पोस्टमार्टम रिपोर्ट, गवाहों के बयान, व्हाट्सऐप चैट्स और जांच में असहयोग को देखते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा 15 मई 2026 को दिया गया अग्रिम जमानत आदेश टिकाऊ नहीं है. इसलिए भोपाल की 10वीं अतिरिक्त सत्र अदालत द्वारा गिरिबाला सिंह को दी गई अग्रिम जमानत रद्द की जाती है. दोनों याचिकाएं मंजूर कर ली गईं और लंबित आवेदन भी समाप्त कर दिए गए.





